हमारे देश में स्कूल को मंदिर और अध्यापक को भगवान का दर्जा दिया जाता है। अभिभावक स्कूल के भरोसे अपने बच्चे को इस विश्वास के साथ सौंपते हैं कि वहां उसका भविष्य उज्ज्वल बनेगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से सामने आ रहे बाल यौन उत्पीडऩ जैसे मामलों ने अभिभावकों के विश्वास को डगमगा दिया है। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि अधिकतर हादसे स्कूलों में घटित हो रहे हैं। बाल यौन उत्पीडऩ जैसे मामलों ने अभिभावकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या स्कूल में उनका बच्चा सुरक्षित है?

स्कूलों में यौन उत्पीडऩ
कुछ महीने पहले मुंबई के एक उपनगरीय इलाके भांडुप में जूनियर केजी में पढ़ रही 4 साल की बच्ची के साथ उसी के स्कूल के सुपरवाइजर ने शौचालय में दुष्कर्म किया। इस हादसे का उस बच्ची पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि अब वह स्कूल जाने से भी डरती है। वहीं दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र डाबरी में भी कुछ महीने पहले एक स्कूल टीचर ने 10 वर्षीय छात्रा के साथ यही अपराध किया। बाल यौन उत्पीडऩ जैसे शर्मनाक अपराध का प्रकोप केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है। चीन के हुनान प्रांत के बाजिशाओ टाउनशिप में स्कूल के 60 वर्षीय एक शिक्षक ने 18 वर्षीय छात्रा का रेप किया। वहीं बेंगलूर में एक निजी स्कूल में पढ़ा रहे 70 साल के शिक्षक द्वारा 8 साल की छात्रा के साथ हुए यौन उत्पीडऩ का मामला सामने आया। इन हादसों ने अध्यापक शब्द का अर्थ ही बदल दिया है।

शारीरिक संकेतों को समझें
कई बार यौन उत्पीडऩ के शिकार बच्चे डर व धमकी से डर कर अभिभावक को कुछ भी बता नहीं पाते हैं। ऐसे में अभिभावकों के लिए जरूरी है कि वे बच्चों के शारीरिक संकेतों की तरफ ध्यान दें। यौन उत्पीडऩ के शिकार बच्चे के शरीर पर किसी भी प्रकार की चोट या खरोंच, जननांग में दर्द या खुजली होना, इंफैक्शन, बच्चे की चाल में बदलाव या दिक्कत, स्कूल जाने से मना करना व डरना, डरा व सहमा रहना और उदास रहना आदि लक्षण हो सकते हैं। बच्चे में ऐसे लक्षणों के दिखने पर अनदेखा नहीं करना चाहिए। इस बारे में आईएमए के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. के.के. अग्रवाल का कहना है कि बच्चे के साथ हुए यौन उत्पीडऩ के हर मामले को मेडिकल इमरजेंसी समझना चाहिए। सरकारी व निजी अस्पतालों द्वारा पीडि़त का मुफ्त इलाज करना कानूूनी रूप से अनिवार्य है। यौन उत्पीडऩ के शिकार बच्चे को देख रहे डॉक्टर का कर्तव्य है कि वह बच्चे को मेडिकल केयर उपलब्ध कराने के साथ फोरेंसिक सबूत भी एकत्रित करे। पुलिस को अपराध की सूचना भी दें। जरूरत पडऩे पर कोर्ट में गवाही भी दें। भारतीय दंड संहिता की धारा 166 बी के तहत किसी भी डॉक्टर को यौन उत्पीडऩ के शिकार बच्चे की मेडिकल जांच से मना करने पर एक साल की कैद या जुर्माना या दोनों ही हो सकते हैं।

सतर्कता है जरूरी
बच्चों के साथ हो रहे यौन उत्पीडऩ की घटनाएं जिस तरह सामने आ रही है, उन्हें देखते हुए अभिभावकों को जरूरत है सतर्कता बरतने की। आर्यन ऌग्रुप ऑफ हॉस्पिटल की डायरेक्टर डॉ. सुनीता दुबे का कहना है कि यौन उत्पीडऩ के शिकार बच्चों की मानसिक स्थिति बहुत गंभीर होती है। ऐसे में उस पर कोई दबाव डालना या डांटना नहीं चाहिए। अपने बच्चे को इस घिनौने अपराध से बचाने के लिए उसके साथ दोस्त जैसा व्यवहार करें। उससे समय-समय पर स्कूल में क्या हो रहा है और उसके प्रति शिक्षक का कैसा व्यवहार है, ये जानने की कोशिश करें।

कदम पीछे न हटाएं 
हर वर्ष बाल यौन उत्पीडऩ की कई घटनाएं घटित होती हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही के केस दर्ज कराए जाते हैं। लड़की के साथ हुए शारीरिक उत्पीडऩ जैसे मामलों में कई बार अभिभावक समाज और इज्जत के डर के चलते रिपोर्ट दर्ज नहीं कराते हैं। यह सामाजिक डर ही उन अपराधियों के हौसलों को बुलंद बना देता है। यौन उत्पीडऩ या किसी भी प्रकार के उत्पीडऩ को हमारे देश से खत्म करने के लिए जरूरत है कि हम अपराध के सामने अपना सिर न झुकाएं और किसी प्रकार की घटना होने पर रिपोर्ट दर्ज कराएं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 से 19 साल की लड़कियों में से 4.5 फीसदी से ज्यादा यौन उत्पीडऩ की शिकार हैं। वर्ष 2012 में भारत में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज़ एक्ट लागू किया गया, जिसमें 18 साल से कम उम्र वाले को बच्चा माना गया है। बच्चे के प्रति यौन हिंसा के किसी भी तरह के मामले पर यही कानून लागू होता है। इसमें पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट सेक्शन 3, नॉन-पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट सेक्शन 7, सेक्सुअल हैरेसमेंट सेक्शन 11 और बच्चे की पोर्नोग्राफी सेक्शन 13 के अंर्तगत अपराध माना गया है।