pareshan kyun kathalram
pareshan kyun kathalram

सब्जीपुर में अगर आप कटहलराम से नहीं मिले, तो भला क्या मजा आएगा? उनसे मिलिए, जरूर मिलिए और जरा जमकर मिलिए। पर जरा उनके घमंडपने को जान लीजिए। यों तो कटहलराम खुद को शाही खानदान का मानते हैं और दूसरों से दो-चार फुट ऊपर समझते हैं, पर जब से कद्दूमल अपनी अनोखी यात्रा से लौटे हैं और सब्जीपुर में उनकी धूम बढ़ी है, बेचारे कटहलराम के कष्ट का कोई पारावार नहीं है। उनका घमंड और तुनकमिजाजी भी नहीं, डींग हाँकने की आदत भी पहले से ज्यादा बढ़ गई है।

कटहलराम थोड़ा बढ़-चढ़कर डींग हाँकते हैं, यह सबको पता था, पर सभी इसे नजरअंदाज करते थे। पर इससे कटहलराम की आदत कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही थी। वे इसमें नवाबी शान समझते थे। पर यह बात उनके लिए इस कदर मुसीबत बन जाएगी, यह उन्होंने नहीं सोचा था। कल टिंडामल के साथ बातचीत में कटहलराम ने बढ़-चढ़कर अपने गुणों का बखान करते हुए जोश में आकर यह भी कह डाला, “जो लोग मेरा यानी कटहलराम का महत्त्व जानते हैं, मैं तो उन्हीं को समझदार मानता हूँ। सब्जीपुर के बाकी लोग तो यों ही हैं—बुद्धू के बुद्धू! उनके लिए तो कद्दूमल और टिंडामल ही सब कुछ हैं।”

सुनकर टिंडामल को अच्छा नहीं लगा। उनकी नाक फूल गई, जैसे कि गुस्से के समय अकसर फूल जाती है। मगर सामने थे लहीम-शहीम कटहलराम। उनसे सीधे-सीधे भिड़ना भी अच्छा नहीं था। लिहाजा अपने गुस्से को दबाते हुए, थोड़ी नरमी से बोले, “भाई कटहलराम, इसमें क्या शक कि तुम ऊँचे हो, और तुम्हारा खानदान भी खासा भारी-भरकम है। पर भई, तुमने एक बात अच्छी नहीं कही। ऐसा नहीं कि दुनिया में सिर्फ तुम ही तुम हो, कोई और नहीं। भई, समझदार तो इस दुनिया में बहुत भरे पड़े हैं और बड़े लोग भी एक से एक हैं। तुम क्या अपने महाराज बैंगनमल को भूल गए? इतना तो जानते ही हो न कि भैया, वे तो ताज के साथ ही पैदा हुए थे और जिंदगी भर ताज पहने हुए ही दूर से दिप-दिप करते हुए मुसकराते रहते हैं।”

एक पल रुककर टिंडामल ने अपनी बात आगे बढ़ाई। बोले, “मैंने तो यहाँ तक भी सुना है भैया कि सोते वक्त भी वे ताज उतारते नहीं हैं। यानी गहरी नींद और सपने में भी ताज उनके सिर पर मुसकरा रहा होता है। इसीलिए अपने सब्जीपुर की जनता उन्हें आदर से ‘राजा साहब’ कहकर सिर झुकाती है। कभी-कभी वे भी गर्व से भर जाते हैं और जोश में आकर अपने बड़प्पन की डींगें हाँकने लगते हैं। पर एक बात है, उन्होंने कभी किसी को छोटा नहीं समझा। और एक तुम हो कि…!”

हालाँकि टिंडामल ने बड़ी नरमी से बातें कही थीं। मगर कटहलराम ने सुना, तो गुस्से में आग-बबूला हो गए। उनका लहीम-शहीम शरीर मारे गुस्से के काँपने लगा। बड़ी-बड़ी मूँछें फड़कने लगीं। बोले, “बैंगनमल…! कौन बैंगनमल? कहाँ के राजा हैं ये! सब्जीपुर के राजा तो वे हो नहीं सकते, क्योंकि यहाँ का राजा तो मैं हूँ, मैं! जरा मेरे आगे लाकर खड़ा करो न उन्हें। न उन्हें बौना साबित कर दूँ तो मेरा नाम कटहलराम नहीं!”

अभी कटहलराम बढ़-चढ़कर ये बातें कर ही रहे थे कि आलूराम-कचालूराम के साथ टहलते हुए बैंगनमल भी वहाँ आ गए। वे किसी प्यारे से चुटकुले पर जी खोलकर हँस रहे थे। आलूराम-कचालूराम ने भिंडी चाची की जरा छेड़-छाड़ की पुरानी आदत को लेकर एक चुटकुला बनाया था। उसे उन्होंने राजा बैंगनमल को सुनाया, तो वे फड़क गए। बैंगनमल एकदम मगन होकर हँस रहे थे, ‘हा-हा-हा!’ फिर एकाएक उन्होंने इतने जोर का अट्टहास किया कि हवा में उनकी मूँछें फड़कने लगीं।

आलूराम-कचालूराम के साथ राजा बैंगनमल को आते देखा, तो कटहलराम चुप। एकदम चुप। बैंगनमल बोले, “अरे भई, आप लोग बड़े जोश में कुछ बातें कर रहे थे। कहिए-कहिए, क्या बात हुई? जरा हम भी तो जानें!”

इस पर कटहलराम भड़ककर कुछ कहना चाहते थे, लेकिन बैंगनमल के साथ आलूराम-कचालूराम को देखा, तो उन्होंने चुप्पी मार लेना ही ठीक समझा। आलूराम-कचालूराम की विशाल सेना के बारे में सब्जीपुर में सब जानते थे। जब वे अपनी पूरी सेना को बुलाकर किसी पर हमला बोलते, तो सब्जीपुर में तहलका मच जाता।

अब कटहलराम तो चुप, लेकिन टिंडामल थोड़े-थोड़े अकुला रहे थे। उनके चेहरे का भाव पढ़ने में बैंगनमल से गलती नहीं हुई। उन्होंने कहा, “भाई टिंडामल, लगता है, कटहलराम तो थोड़े शरमा गए। तुम ही कहो, क्या किसी जोशीली वीरता का बखान हो रहा था? क्या कहीं किसी युद्ध-मोर्चे पर आप लोगों का प्रस्थान का इरादा है?”

टिंडामल को लगा, मौका अच्छा है, कुछ न कुछ तो कह ही देना चाहिए। सो बोले, “कोई खास बात नहीं, बैंगन राजा! असल में अपने कटहलराम बड़े शूरवीर हैं। सो अपनी और अपने पुरखों की वीरता के बड़े-बड़े किस्से सुना रहे थे। कह रहे थे कि भला सब्जीपुर में मुझसे बढ़कर कौन है, और ये बैंगनमल है क्या चीज! क्या बेचते हैं! भला कहाँ के राजा हैं बैंगन राजा?”

इस पर बैंगनमल जोरों से हँसे। उनकी बड़ी-बड़ी मूँछें हवा में फड़फड़ाने लगीं। “हाँ भई!” बैंगन राजा ने कहा, “राजा तो कटहलराम ही हैं। इनकी बहादुरी का क्या कहना! बड़े पुराने खानदानी सूरमा हैं। मैं तो हमेशा से इन्हीं को बड़ा मानता हूँ।”

बैंगनमल ने कटहलराम के घमंडपने और अकड़ू स्वभाव के बावजूद उनकी बड़ाई ही की थी और मुस्कराकर मामला टालना चाहा था। मगर उनके साथ आए उनके बॉडीगार्ड आलूराम-कचालूराम भला कैसे मान जाते! वे तो गुस्से में थर-थर काँप रहे थे। बोले, “बैंगन राजा, अब हम क्या करते हैं, यह आप हम पर ही छोड़ दीजिए। आप तो बस देखते ही जाइए।”

फौरन आलूराम-कचालूराम ने हवा में लंबी-लंबी उछालें लगाकर जोरों से चिल्लाकर तालियाँ पटपटाते हुए कहा, “सेना, सेना…! सेना आ धम्म!”

आलूराम-कचालूराम की आवाज पूरे सब्जीपुर में हवा के साथ इतने जोरों से गूँजने लगी कि हर ओर एक ही गूँज सुनाई देती, “सेना-सेना…सेना-सेना!”

और लो, अभी पाँच मिनट भी नहीं हुए थे कि धूल के भारी गुबार उठाते और धरती काँपती आलुओं-कचालुओं की एक विशाल सेना चारों दिशाओं से लुढ़कती-पुढ़कती हुई वहाँ आ गई, जहाँ अभी-अभी कटहलराम ने अपनी डींगें हाँकते हुए बैंगन राजा की शान में गुस्ताखी की थी।

आलुओं-कचालुओं की विशाल सेना ने आलूराम-कचालूराम के पास जाकर सिर झुकाकर कहा, “हुक्म आका…हुक्म!” और आलूराम-कचालूराम ने कहा, “बस, कटहलराम को सीधा करना है। इन्होंने हमारे मित्र राजा बैंगनमल का अपमान किया है। बैंगन राजा सीधे हैं, भले हैं। वे चाहे कुछ न कहें, मगर हम कैसे बर्दाश्त कर लेंगे?”

और जब उछलती-कूदती और मार तमाम धमाचौकड़ी मचाती आलुओं-कचालुओं की विशाल सेना ने कटहलराम पर चढ़ाई की, तो उनकी जो हालत हुई, उसका तो कहना ही क्या!

थोड़ी देर में पिटाई से बेदम कटहलराम अकेले खड़े थे, दुखी और उदास। बोले, “मुझे अपनी डींगें हाँकने की सही सजा मिल गई। आलूराम-कचालूराम भैया, अब माफ करो।”

इस पर दोनों भाइयों आलूराम-कचालूराम ने कंधे उचकाकर कहा, “भई कटहलराम, पूरी सजा तो तुम्हें अभी नहीं मिली। पर हमारे बैंगन राजा ने इशारा कर दिया था कि कटहलराम को इतना न पीटना कि इन बेचारों की छुट्टी हो जाए! सो अब तुम्हें छोड़ दिया, मगर आगे से ठीक-ठाक रहना।”

कटहलराम ने बैंगनमल के आगे झुककर धन्यवाद देने में देर नहीं लगाई। और आलुओं-कचालुओं की पूरी सेना लुढ़कते-पुढ़कते और हवा में धूल के गुबार उड़ाती फिर वहीं चली गई, जहाँ से आई थी।

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)