पालक रानी सचमुच रानी हैं और सब्जीपुर के सबसे पुराने बाशिंदों में से एक हैं। पर बीच में कुछ समय के लिए न जाने क्यों अंतर्धान हो गई थीं पालक रानी और पूरा सब्जीपुर उदास हो गया था।
लोग हैरान होकर कहते थे, “यह क्या हुआ? क्या…? हमें तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा।”
सबसे ज्यादा उदास था बथुआकुमार। वह सबसे अकुलाकर पूछता, “आपने पालक रानी को देखा है? उनके बगैर तो सब्जीपुर की महिमा ही जाती रही।”
बल्कि कुछ लोग तो यह भी कहते कि पालक रानी ही सब्जीपुर की आत्मा थीं। वह नहीं हैं, तो जैसे कुछ भी नहीं है।
ऐसी बहुत सी सब्जियाँ थीं, जिन्होंने बचपन से ही पालक रानी को अपने राजसी अंदाज में देखा था। फिर उनके बच्चों और नाती-पोतों ने भी। जैसे वही सब्जीपुर की पहचान हों।…लेकिन सवाल यह था कि फिर वे चली क्यों गईं?
पीली सरसों का कहना था, “देखना, पालक रानी आएँगी और बहुत जल्दी आएँगी। वे अपने प्यारे सब्जीपुर से दूर रह ही नहीं सकतीं।”
मगर पालक रानी वाकई गईं तो ऐसी गईं कि बिल्कुल नजर नहीं आती थीं। कुछ लोगों का कहना था, “वे पास के एक जंगल में चली गई हैं। उन्हें शहर पसंद नहीं है।”
लौकीदेवी ने लंबी साँस लेकर कहा, “लगता है, पालक रानी इस बात से रूठ गई हैं कि कहाँ तो वे सब सब्जियों की रानी-महारानी थीं और कहाँ अब कोई उन्हें पूछता ही नहीं।”
“मैं नहीं रह सकती ऐसे माहौल में।” पालक रानी कभी-कभी गुस्से में कहा करती थीं। और एक बार तो दुखी होकर उन्होंने यह भी कहा था, “मैं जब चली जाऊँगी तो लोग तरसेंगे। तब एक दिन जानेंगे कि पालक रानी कौन थी और उसने कितना महान काम…?”
और सब्जीपुर के पुराने बुजुर्गों को याद आ रहे थे वे दिन, जब सब्जीपुर में हरियालीपुर का साम्राज्य था।
“अब तो कुछ ही बाशिंदे बचे हैं, जिनमें बस लौकीदेवी, कद्दू राजा और मैं ही हूँ। और अब हम लोगों को ही कोई नहीं पूछता, कोई नहीं। यहाँ तक कि सब्जीपुर के लोगों ने भी भुला दिया।”
“और जाने कौन-कौन सी सब्जियाँ आकर यहाँ बस गईं विदेशों से। ये कल के बच्चे हैं और दुनिया उनके पीछे दीवानी है। हर जगह उनका नाम। हर जगह उनकी पूछ। और देख लो भाई, अब तो सब्जीपुर में भी उनकी तूती बोलने लगी।”
लौकीदेवी दुखी होकर याद कर रही थीं पुरानी बातें। पिछली दफा पालक रानी मिली थीं, तो बहुत दुखी और उदास थीं। और देर तक मन का गहरा दुख बताती रही थीं—
“पहले यह आलू क्या था? आप जानते हैं आलू को? अरे, जब यह पहली दफा आया था सब्जीपुर में, तो इस तरह जमीन पर झुककर सलाम करता था, इस तरह कि अब क्या बताएँ? अब घमंड में चूर होकर सब्जियों का सरदार बना घूमता है, और मुझे नमस्ते तक नहीं करता। अरे, नमस्ते की तो बात क्या, पहचानने से भी इनकार! ऐसा कुफ्र सब्जीपुर में? भैया, मेरी तो आत्मा दुखी होकर रोती है।” पालक रानी ने दुखी होकर बताया था।
“पर…पालक रानी, आपको समय देखकर सोचना चाहिए।” लौकीदेवी ने समझाया और सब्र करने के लिए कहा।
“पहले आप थीं तो बस आपका ही साम्राज्य था। बरसोंबरस चला। पर अब खासकर शहरों में तो आलू के सहारे ही बात बनती है। आपकी पुरानी साख अब कहाँ रही?” टिंडामल ने भी बदले हुए जमाने के बारे में बताकर अपनी सलाह दी।
“आप आलू के साथ थोड़ा मिलकर चलना सीखिए। नहीं तो कौन पूछेगा आपको? यह समय की माँग है।” कटहलराम ने तो सीधे-सीधे कह दिया।
पर पालकदेवी का हृदय वाकई सुलग रहा था। उनके चेहरे पर एक भाव आता था, एक जाता था। लाल-लाल आँखों में गुस्सा!
“वह तो ठीक है, पर पहले आप हम सब की बात तो सुनें।” पीली साड़ी पहनकर आईं सरसों देवी, कुछ प्यार, कुछ व्यंग्य से कह रही थीं।
पालक रानी सब सुन रही थीं, सब समझ रही थीं।
“कैसे भूल जाऊँ मैं, कैसे भूल जाऊँ…?” व्याकुल होकर उन्होंने कहा और धप से सोने के अपने विशाल सिंहासन पर बैठ गईं।
सब लोगों के जाने के बाद पालक रानी थोड़ी देर तक अकेले अपने महल के सामने वाले लाॅन में टहलती रहीं। फिर गीत गाने लगीं। बड़ा दुख भरा था उनका स्वर, जो धीरे-धीरे हवाओं में घुल रहा था—
मैं महलों की रानी थी जी,
मैं महलों की रानी,
रानी क्या, महारानी थी जी
है यह कथा पुरानी।
जितने हैं ये बड़े नामवर
झुकते शाम-सवेरे,
इसी महल के लगा रहे थे
कितने अनगिन फेरे।
मैं सबको देती थी आगे हाथ बढ़ाकर प्यार,
भूलूँ यह अधिकार मैं कैसे, भूलूँ यह अधिकार…?
अचानक उनकी आँखों से आँसुओं की धारा फूट पड़ी और गला भर आया। कुछ रुककर उन्होंने खुद को सँभाला, आँचल से गालों पर ढुलक आए आँसुओं को पोंछा और फिर उसी तरह करुण स्वर में गाने लगीं—
रानी थी, मैं रानी थी, महारानी थी,
इन महलों की रानी थी।
सोने के ये महल-अटारे मेरे थे,
ये नदियाँ, ये झरने प्यारे मेरे थे,
सब्जीपुर में जो भी था, जितने भी थे
ये परजा-जन प्यारे-प्यारे मेरे थे।
भूल गए तुम, कभी तुम्हारी प्यारी रानी थी मैं?
रानी क्या महारानी थी मैं, सबसे बढ़कर दानी थी मैं।
कहते-कहते पालक रानी का मन दुखी और उद्विग्न हो गया। आगे की कथा बड़े करुण स्वरों में ढली हुई थी—
आए फिर बाहर से
कितने ये चालू आलू…
जो थे टालू,
भूल गए तुम पालक रानी की मेहरबानी,
भूल गए, मैं रानी थी, महारानी थी,
उठकर सलाम किया करता था पूरा सब्जीपुर।
हाय-हाय, भीतर ही भीतर घुटती हूँ मैं,
चुप-चुप, बस आँसू पीती हूँ।
गाते-गाते पालक रानी ने अचानक पीछे मुड़कर देखा, तो आलूराम पास खड़े नजर आ गए। और पीछे-पीछे हलकी लाल चादर ओढ़े गोल-मटोल करौंदा बाबू। धीरे-धीरे सब्जीपुर के कुछ और भी बाशिंदे आते जा रहे थे।
आलूराम आज वाकई संजीदा थे। बहुत अधिक संजीदा। बोले, “माफ कीजिए, आपके एकांत में खलल डाल रहा हूँ पालक रानी। पर…आपकी पीड़ा मैं समझ सकता हूँ, आपका गुस्सा भी। वह एकदम सही है, वाजिब है।”
फिर अपनी सफाई देते हुए कहा, “औरों की तो नहीं जानता पालक रानी, पर मैं सच्चे दिल से कह रहा हूँ, मैंने अपने जानते हुए कभी अपमान नहीं किया आपका। हम सबके मन में आपके लिए बड़ी इज्जत है।”
कुछ रुककर उन्होंने आगे कहा, “यह ठीक है कि समय बड़ी तेजी से बदला है। आज वह पहले वाली बात नहीं है। न पुराने रस्मो-रिवाज रहे और न पुराने विश्वास। इतिहास ने बड़ी तेजी से करवट ली है और जो चीज कभी किसी एक जगह थी, आज वह पूरी दुनिया में पहुँच गई। इसलिए कि नई दुनिया में कहीं भी आना-जाना बड़ा आसान हो गया है। पर इसका यह मतलब भी नहीं कि हम पुरानी चीजें एकदम भुला दें। हम जानते हैं कि आप हमारी आदि पुरखन हैं। आदरणीया हैं। यह बात हम कैसे भूल सकते हैं?”
आलू जी ने बड़ी विनय और भावुकता के साथ अपनी बात कही थी। इसीलिए उनकी बातें पालक रानी के मन में उतर गईं। फिर भी वे अभी चुप थीं और विचारमग्न थीं।
“हम वादा करते हैं कि सब्जीपुर में कोई भी सभा हो, आप ही हमारी प्रधान होंगी।” आलू जी ने पालक रानी के घावों पर थोड़ी मरहम लगाते हुए कहा, “पुदीना दीदी कुछ दिनों बाद सब्जीपुर में एक विशाल संगीत सम्मेलन करने जा रही हैं। उसमें भी अध्यक्षता आप ही करेंगी, ताकि लोग नए और पुराने युग का संगम देख सकें।”
“और आप उस सम्मेलन में लाल-पीली बुंदकियों वाली अपनी वही हरी साड़ी पहनकर जाएँ, जिस पर हीरे जगमग-जगमग कर रहे होते हैं।” करौंदा बाबू ने कुछ इस अंदाज से कहा कि पालक रानी की भी हँसी छूट गई।
“आज भी वह राजसी वैभव तो बस आपके पास ही है पालक रानी, जिससे सब्जीपुर का इतिहास जुड़ा हुआ है।”
“लेकिन अब मैं बुढ़िया हो गई। क्या अच्छा लगेगा हीरों वाला हार…?” पालक रानी ने कहा, तो पास खड़े कटहलराम ने होंठ काटते हुए कहा, “न…न, ऐसा न कहिए पालक रानी। वरना हम जैसे आपके प्रशंसकों के चेहरे लटक जाएँगे।”
“और फिर बुढ़ापा सब पर आता है। पर बुढ़ापा किसी-किसी का सौंदर्य और बढ़ा देता है, जैसे कि आप…। माफ कीजिए, आपके चेहरे पर जो नूर है, वह तो मुझे पूरे सब्जीपुर में कहीं नजर नहीं आया।” टमाटरलाल ने मुसकराते हुए कहा।
“और यही नहीं, आप तो गुस्से में भी बहुत सुंदर लगती हैं। गुस्से में आपके हरियाले गालों पर जो एक लाली सी आ जाती है, एकदम टमाटर जैसी, उसका तो कहना ही क्या!” कहकर कद्दूमल हँसे, तो साथ-साथ सभी हँसने लगे।
पालक रानी कुछ शरमा सी गईं। बोलीं, “हटिए, आप लोग तो मुझे बना रहे हैं।”
“अब बना रहे हैं, तो आप भी बन ही जाइए।” कहकर हलकी तलवार कट मूँछों वाले करौंदा बाबू ने एक मुसकी फेंकी, तो पालक रानी हँसने लगीं। साथ ही वहाँ खड़े सभी लोग ठहाका मारकर हँस पड़े।
पूरे सब्जीपुर में हुलास था। हर ओर यही बात हो रही थी, “पालक रानी मान गईं…! अजी, सुना तुमने, पालक रानी मान गईं!”
और इस खबर से सब्जीपुर के नए बाशिंदे हों या पुराने, सभी खुश थे।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
