उड़ती-उड़ती बात नथिया तक भी पहुँच गई। सांसियों के पूरे मोहल्ले में एक वही सबसे लंबी व निधड़क औरत थी। उसकी लंबाई छ: फुट से कोई दो इंच कम होगी। उसका सांवला रंग था और वह हमेशा काले कपड़े पहनती थी।
जो लोग उसके पास शराब पीने आते उनमें से कई उसके हुस्न की वजह से भी आते। बस शराब पीते और देखते रहते। नथिया उनके साथ मजाक भी करती और झिड़क कर भी रखती। अगर कोई शराबी इधर उधर की शरारत करता तो उसको खूब पीटती।
उससे सब डरते थे।
पुलिस उसको कई बार पकड़ कर ले गई थी। पर वह शराब बेचने से न हटती थी। कहती “मर्द के मुकाबले खड़ा होना आता है। यह …औरत से तभी डरें हैं जब वह भी बराबर की कमाई करे।… वरना तो बस घोड़े के छांटे मारे साले”।
वैसे भी वो हर किसी के साथ पंगा ले बैठती और आखिरकार उसे पीटकर उसके मन को चैन मिलता।
नथिया यहां आने से पहले अम्बाला में रहती थी। तब उसका एक लड़के के साथ याराना हो गया था। वह उसको बहुत अच्छा लगता था। ज्यादा दिन वो एक दूसरे को बाहों में लेते रहे। एक दिन जब नथिया बहक गई तो उसने उस लड़के के कपड़े उतार दिये। पर वह लड़का ठंडा ही रहा। नथिया से रहा न गया और वह गुस्से में आ गई। खूब गंदी गालियां निकाली थीं उसने। पर जब वह लड़का तब भी कुछ करने योग्य न हुआ तो उसने दांतों से उसका गुप्त अंग ही काट डाला। वह रोता रहा। नथिया वहां से भाग इस शहर में आ गई और सुलताना के साथ रहने लगी।
उस लड़के का बाद में पता नहीं क्या हुआ।
सुलताना था भी गबरू। नथिया खुश थी।
कई बच्चे भी पैदा कर दिये थे नथिया ने।
हमेशा कहती “बच्चे पैदा करने का क्या? एक बोतल पीओ और बच्चा बाहर।”
सांहसण का इस सारे इलाके में बोलबाला था। वहां सांसी व अन्य लोग उससे मिल जुलकर रहते।
पूरे इलाके में किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती थी। बोलते थे तो बस सिर्फ सांसी। जब आपस में जब लाठियां खड़कती तो लोग खुले मुंह देखते रहते।
वैसे भी शहर के लोग डरपोक होते हैं।
उस दिन सुलताना अपना तांगा हांकता आ रहा था कि सवारी के साथ तू-तू मैं-मैं हो गई।
सवारी कहे घर छोड़ कर आ।
सुलताना ने काफी समझाया कि एक एक सवारी को घर छोड़ने नहीं जा सकता।
जब बात न बनी तो उसने सुलताना पर तोहमत लगा दी। सुलताना तो जैसे वहीं धंस सा गया। इतनी घनी मूंछें। जवान सुलताना लाचा बांधता था। उस दिन उसने पैर में तिल्ले वाली जूती और सफेद लट्ठे का कुरता पहना हुआ था।
सुलताना को कुछ समझ न आया कि वह औरत सुलताना के पीछे क्यों पड़ गई। सुलताना ने तो कोई बात भी नहीं की थी। न ही आंख उठा कर उसके तरफ देखा था।
बस किसी तरह लोगों ने बीच पड़कर उसे बचा दिया। पर सुलताना जैसे वहीं गड़ गया हो। अपने ही मोहल्ले में अपने ही लोगों के सामने और वह भी सांसियों के मोहल्ले में। उस दिन सारी रात वह करवटें लेता यही सोचता रहा।
कभी उसको लगता वह जरूर कोई कंजरी होगी। शरीफ घर की लड़की तो यू आदमी इकट्ठे नहीं करती। यह तो केवल गश्तियों का काम होता है। उसने कहा ही क्या था? बस अपना तांगा हांकता आ रहा था। गर्मियों के दिन थे। वह दोपहर को सवारी न मिलने पर अड्डे पर ही सो जाता था।
उसे आदत पड़ गई थी दोपहर को सोने की।
वह सोया पड़ा था तो उसे किसी ने आकर जगाया। अब सवारियां आती जा रही थीं। वह तांगा हांकने चल पड़ा। सवारियां छोड़ता हुआ जब सुनहरी बाग पहुंचा तो बस वही अड़दार औरत पसर गई। कहने लगी घर छोड़ कर आ।
बस सुलताना अकड़ गया “कभी एक-एक सवारी को घर छोड़ा जा सकता है…?”
पर वह जिद पर अड़ी रही। लोग इकट्ठे हो गये। जब बात न बनी तो उसने सुलताना पर तोहमत लगा दी। बस यही बात थी जिसके लिए सुलताना धरती में गड़ता जा रहा था। उस दिन जब नथिया साथ की चारपाई से उठ उसकी चारपाई पर आ गई तब भी सुलताना ठंडा पड़ा रहा।
नथिया हैरान थी।
दोनों चुप, एक दूसरे की तरफ पीठ किए पड़े रहे।
सुबह होते ही सुलताना ने पुराना ट्रंक खोला और सम्भाल कर रखा पिस्तौल निकाला। तांगा चलाने से पहले वह ऐसी चीज निकालता था।
एक पल के लिए उसके मन में आया “औरत जात है। छोड़ परे। पर साली औरत जात का कोई धर्म नहीं?… सरे बाजार झूठी तोहमत लगा दी?… वह साली कंजरी ही रह गई छेड़ने के लिये?”
दिलेर तो सुलताना शुरू से ही था। वह इस पिस्तौल से कइयों को मार चुका था। कई वर्ष जेल की सजा भी काट आया था।
आखिर में वह सब कुछ छोड़कर तांगा चलाने लगा था।
नथिया से मिलने के बाद “कमाल हो गया! .. औरत जात और वह भी सुलताना पर तोहमत लगा गई। जो भी हो आज देखा जाएगा। वह सारा वक्त इसी उधेड़ बुन में खड़ा सोचता रहा। आखिर में वह पिस्तौल लेकर ढूंढता हुआ उस औरत के घर पहुंच गया।
दरवाजा खटखटाया तो अन्दर से एक औरत की आवाज आयी? शायद वही थी। अभी कल की तो बात थी। वह भूल कैसे सकता था?
“अंदर आ जा सुलताना।”
उस साली ने उसे कैसे देख लिया? और उसका नाम भी जान गई थी? सुलताना हैरान था।
वह अंदर गया तो सारा घर खाली था। वह गुसलखाने में नहा रही थी। जब वह बाहर निकली तो उसने सिर्फ धोती ही पहनी हुई थी। ऊपर से पूरी नंगी थी।

सुलताना को और भी गुस्सा चढ़ आया। बेशर्म “मेरे को पता था तू जरूर आयेगा। कल तूने तो कुछ कहा ही नहीं था।… बस तेरी जवानी पे लुट गई थी।… इसीलिए कहती थी घर छोड़ आ।… तू माना ही नहीं। अब तू खुद ही आ गया।… आजा और उसने सुलताने को खींच कर चारपाई की ओर धकेला।
सुलताना हैरान होकर कभी अपनी पिस्तौल की ओर देखे तो कभी उसके बदन की ओर। जब उसने सुलताना को स्पर्श किया, उसके शरीर में जैसे करंट सा लगा। कुछ ही देर में वे एक दूसरे से उलझ गये।… जब वह थक गये तो सुलताना ने उसको चूमा तो उसकी मूंछों के बाल उसके मुंह में आ गये। मूंछों के सख्त बाल उसको अब महसूस हुए।
उधर सुलताना सोच रहा था औरत जात भी क्या है कितने चरित्र दिखाये थे कल उसने। सारी रात सोने नहीं दिया। अपनी औरत पास आई तो बदन ठंडा पड़ गया। यह आई तो भड़क उठा।
उसके बाद सुलताना का उसके घर आना जाना शुरू हो गया। धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले में पता चल गया सुलताना तांगे वाला उसके घर आता है। लोग बातें तो करते पर डर के मारे कुछ नहीं कहते।
उड़ती-उड़ती बात नथिया तक भी आ पहुंची।
जब नथिया को पता चला तो पहले वह आग बबूला हुई, पर बाद में उसका दिल कांप गया। पर वह हैरान थी कि सुलताना उसको छोड़ उस कंजरी के पास क्यों भाग गया? उसको लगा कि वह अभी भी जवान तो है। पर क्या था उस गश्ती में?
फिर चुप बैठी कुछ सोचती रही। इसमें सुलताना का क्या दोष?… आदमी तो होते ही मोम हैं।… थोड़ा सा सेंक लगाओ तो पिघल जाएं। वह उस कंजरी को समझायेगी।
बाद में पता नहीं उसको क्या हुआ। अपनी संभाल कर रखी नेपाली खुखरी उठाई और ढूंढ़ती हुई उस औरत के घर पहुंच गयी।

सुलताना शायद वहां अभी ही पहुंचा था। नथिया ने दरवाजा नहीं खटखटाया। उसने अपनी जेब में से खुखरी निकाली और सुराखों से अन्दर लगी कुंडी को ऊपर उठा दिया। दरवाजा खुल गया।
अधनंगे सुलताना को देख नथिया और भी आगबबूला हो गयी। नथिया को गुस्से में देख सुलताना उसकी ओर बढ़ा। इससे पहले कि सुलताना उस पर काबू पाता नथिया ने उस औरत पर जोर से फेंककर खुखरी से वार कर दिया।
फर्श पर खून की धारें बहने लग गईं।
थोड़ी देर तक वह औरत तड़पी और फिर ठंडी हो गई।
यह देखते ही सुलताना की पकड़ ढीली हो गई और नथिया ने अपने आपको सुलताना से छुड़ा उसको जोर से जकड़ अपने आगोश में ले लिया।
