nanhi gogo nahi badi
nanhi gogo nahi badi

नन्ही गोगो जब से नीटू को पढ़ाने लगी है, वह देखते ही देखते अपनी और दूसरों की नजरों में भी बड़ी हो गई है। सब उसकी ओर प्रशंसा भरी नजरों से देखते हैं, जैसे कहना चाहते हों, ‘यह है नन्ही गोगो, जिसका दिल इतना बड़ा है कि उस पर बहुत प्यार आता है।’ नन्ही गोगो सोचती, ‘लोग मेरी इतनी तारीफ करते हैं तो मुझे भी खुद को इस तारीफ के लायक बनाना होगा। मैं कोई ऐसा काम नहीं करूँगी कि लोग कहें—देखो, नन्ही गोगो वैसे तो अच्छी है, पर…!’

इसलिए नन्ही गोगो ने अपनी छोटी-बड़ी ऐसी सभी आदतें सुधारनी शुरू की हैं, जिनको लेकर मम्मी-पापा और दूसरे लोग टोका-टाकी करते थे। पहले वह छोटी-छोटी चीजों को लेकर जिद ठान लेती थी। दूध पीने को लेकर मम्मी को बड़ा तंग करती थी। उसके माँगने पर मम्मी ने चाकलेट या आइसक्रीम नहीं लाकर दी तो कहती थी, “ना जी ना, मैं खाना नहीं खाऊँगी।”

मम्मी किसी छोटी-सी बात पर डाँटतीं तो गोगो का मुँह कुप्पी जैसा फूल जाता था। कभी उसकी पसंद की सब्जी न बनी होती तो खाने की हड़ताल। कहती, “ना जी ना, मुझे भूख नहीं है मम्मी!” जबकि मम्मी समझ जातीं कि आज नन्ही गोगो का बैंगन का भुरता खाने का मन था। मैंने भुरता नहीं बनाया, इसीलिए वह खाना नहीं खा रही है।

नन्ही गोगो को भी अपनी इन कमजोरियों का पता था। वह इन्हें बड़ी शान की चीज समझती थी। पर अब वह अपनी आदतें सुधारने लगी। वह सोचती, ‘घर में जो कुछ बना है, वही प्यार से खाना चाहिए। आखिर मम्मी सबकी पसंद की चीजें एक साथ तो नहीं बना सकतीं न! फिर यह भी देखना चाहिए कि मम्मी भी तो बीमार पड़ सकती हैं। उनका शरीर भी तो थकता होगा न! क्या मैं खाली अपनी चिंता करती रहूँ और मम्मी के बारे में बिल्कुल न सोचूँ? बल्कि मुझे तो मम्मी की थोड़ी-थोड़ी मदद करनी चाहिए। अब मैं समझदार जो हो गई हूँ!’

इसी तरह नन्ही गोगो ने तय किया कि अब वह अपनी कपड़ों और किताबों की अलमारी खुद अच्छी तरह साफ किया करेगी। बस्ता और बाकी चीजें सही जगह रखेगी। पहले तो घर में घुसते ही वह बस्ता कहीं फेंकती थी, जूते कहीं फेंकती थी और पूरे घर में अफरा-तफरी मचा देती थी। फिर सुबह स्कूल जाते समय चीजें नहीं मिलती थीं, तो गोगो का रोना बुरी तरह से चालू हो जाता था।

मम्मी कुछ दिनों से देख रही थीं कि गोगो बिल्कुल बदल गई है। जब से उसने नन्हे नीटू को पढ़ाना शुरू किया था, तब से गोगो जैसे खुद-ब-खुद बड़ी होती जा रही थी। उसका बात-बात पर रोना और जिद करना तो एकदम खत्म ही हो गया था। अब तो मम्मी जब भी खाली होतीं, गोगो दौड़कर मम्मी के गले में बाँहें डाल देती और कहती, “देखो-देखो मम्मी, नीटू कितना शरारती है। आज क्या हुआ कि…!”

और नीटू की शरारत का किस्सा सुनाते-सुनाते गोगो इतना हँसती, इतना हँसती कि गोगो की मम्मी की भी हँसी छूट जाती। वे प्यार से अपनी लाडली बेटी का माथा चूम लेतीं।

गोगो की मम्मी सोचतीं, गोगो अच्छी तो थी, पर नीटू से दोस्ती करके और भी अच्छी हो गई है।

आसपास के बच्चे ही नहीं, उनके मम्मी-पापा भी कहते, ‘देखो, नन्ही गोगो कितनी समझदार है। तुम वैसा ही बनने की कोशिश क्यों नहीं करते?’

इस पर गोगो के मम्मी-पापा को अपनी लाडली बेटी पर बड़ा गर्व महसूस होता।

पर नन्ही गोगो सोचती, ‘मैं और अच्छा बनने की कोशिश करूँगी। मैं तो इससे भी कहीं ज्यादा बड़े काम कर सकती हूँ। तो फिर मैं यहीं क्यों रुकी रहूँ?’

और उसी वक्त नन्हे नीटू का हँसता हुआ चेहरा उसके सामने आ जाता। गोगो सोचती, ‘मैं तो सभी को खुशियाँ बाँटूँगी, क्योंकि खुशियाँ बाँटने से ही तो खुशियाँ मिलती हैं।’

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)