अगर आपका मन सिर्फ एक दिन होली खेलकर नहीं मानता तो आइए वृंदावन, मथुरा, बरसाना, गोकुल की गलियों में, जहां के प्राचीन रीति-रिवाज और परंपराएं पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों को अपने रंग और हुड़दंग में एकसार कर लेती हैं। ‘राधे-राधे’ की गूंज और आज बिरज में होली… जैसे फाल्गुनी गीतों के बीच लट्ठमार होली, लड्डू होली, रंगों की होली, रंगभरनी, फूलों की होली और विधवाओं की होली खेली जाती है। इन सबकी अपनी-अपनी विशेषता है-
फूलों की होली
जितनी प्रसिद्ध बरसाना की मार लट्ठमार होली है उतनी ही खास वृंदावन के फूलों की होली भी है। होली से पहले एकादशी को वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में फूलों की अनोखी होली खेली जाती है। इसमें पारंपरिक सूखे गुलाल या गीले रंगों की बजाय फूलों से होली खेली जाती है, विशेषकर गुलाब और गेंदे से। इस दिन फूलों से लदे कई ट्रक मथुरा-वृंदावन आते हैं। इस होली के लिए शाम के 4 बजने का भक्तों को बेसब्री से इंतजार होता है। 4 बजे मंदिर के द्वार खुलते ही फूलों की अनोखी होली शुरू हो जाती है। बांके बिहारी मंदिर के पुजारी भक्तों पर फूलों की वर्षा करते हैं। लेकिन फूलों की होली केवल 15-20 मिनट ही खेली जाती है। सारा वातावरण 15-20 मिनट में ही गुलाब और गेंदों की भीनी-भीनी मनमोहक खुशबू से महक उठता है। बहुत कम समय होने के बावजूद भक्त पूरे उल्लास और उमंग के साथ अपने प्रभु से होली खेलते हैं। फूलों की होली के लिए समय का पाबंद होना आवश्यक है।
रंगभरनी

मंदिरों की नगरी, वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अत्यंत हर्षोल्लास और धूमधाम से रंगभरनी एकादशी मनाई जाती है। इसके साथ ही पूरे नगर में होली की शुरूआत हो जाती है। इस समय यहां विश्व भर से कृष्ण भक्त एकत्र होते हैं। ‘होली खेल रहे नंदलाल, वृंदावन की कुंज गलिन में…’ रंगभरनी एकादशी पर कुछ ऐसे ही गीतों से समां बांधते हैं कृष्ण प्रेमी।
एकादशी के दूसरे दिन मार लट्ठमार और फूलों की होली खेली जाती है। बांके बिहारी मंदिर ही वृंदावन में होली का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां होली के एक दिन पहले भक्तों के लिए मंदिर के द्वार खोल दिए जाते हैं और भक्त भगवान् के साथ होली खेलते हैं। पुजारी भक्तों पर रंग और पवित्र जल फेंकते हैं।
लड्डू होली
लट्ठमार होली से पहले श्रीजी मंदिर, बरसाना में परंपरागत रूप से लड्डू की होली खेली जाती है। मंदिर परिसर में भक्त एकत्र होते हैं, रसिया गायन की परंपरा चलती है और एक-दूसरे पर लड्डुओं की बौछार होती है। परंपरा है कि होली का निमंत्रण देने नंदगांव से पंडा आता है। निमंत्रण स्वीकारोक्ति के बाद लोग मंदिर में नाच-गाकर लड्डुओं की बरसात करते हैं, इन्हें प्रसाद रूप में पाने के लिए भी बड़ी संख्या में भक्त जुटते हैं।
विधवाओं की होली

इन सबके अतिरिक्त वृंदावन की एक और होली है जो पिछले कुछ वर्षों से सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही है और वह है विधवा माताओं की होली। इन विधवाओं के जीवन में रंग भरने का सराहनीय काम किया एक प्रसिद्ध समाज सेवी संस्था ने। विधवा होते ही जिनके परिवार ने भी इनका त्याग कर दिया था, किसी भी शुभ या मांगलिक अवसरों पर उनकी परछाई को भी दूर रखा जाता था, ऐसी परित्यक्त और वृंदावन की गलियों में भीख मांगकर गुजारा करने वाली ये महिलाएं अब समाज की मुख्यधारा में शामिल हो चुकी हैं। वृंदावन के मंदिरों में कृष्ण भक्ति में जीवन गुजारती इन विधवा माताओं को वृंदावन के गोपीनाथ मंदिर में रंग खेलते और लोकगीतों पर नाचते-गाते देखना सुखद लगता है।
तो होली के हर रंग और प्रसंग को देखने-जानने की आपकी भी इच्छा है तो आइए ब्रज की नगरी जहां रंग, प्रेम और भक्ति के संग दिखेंगे होली के कई रंग।
