मानव इतिहास में कृषि व्यवस्था आजतक की सबसे बड़ी क्रांति है, जिसने घुमक्कड़, कंदमूल खाने वाले और मांसाहारी मानव को एक बेहतर भोजन विकल्प दिया और उसके जीवन में अनुशासन कायम किया। इसीलिए दुनिया की हर संस्कृति में फसल के बोने और कटने का बहुत महत्त्व है। उत्तर भारत में इसे लोहड़ी, मकर संक्रांति के रूप में तो दक्षिण में पोंगल के रूप में मनाया जाता है। वहीं मिजोरम में मार्च के पहले हफ्ते में नई फसल के रोपण की खुशी में ‘चपचार कुट’ मनाया जाता है, मिजो भाषा में कुट का अर्थ त्योहार होता है।

कहा जाता है कि इस त्योहार को मनाने की परम्परा साल 1450 से 1700 के बीच से चली आ रही है। यहां पारम्परिक कृषि प्रणाली ‘झूम’ से खेती की जाती है, जिसमें हर तीन से चार सालों में लोग अपने खेत बदलते हैं और फसल कटने के बाद उस खेत की उर्वरता बढ़ाने के लिए उसे कई महीनों के लिए खाली छोड़ देते हैं। इसी समय राज्य में बांस के पेड़ों की भी कटाई की जाती है। इस राज्य में इस पर्व की इतनी मान्यता है कि साल 1981 के बाद से आज तक खुद राज्य सरकार भव्य पैमाने पर इसका आयोजन करती आ रही है। इसे हर साल मार्च के महीने में आयोजित किया जाता है जहां कई रंगा-रंग कार्यक्रम पेश किए जाते हैं। तो आइए जानते हैं क्या है इस बार चपचार कुट में खास –

मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरामथंगा ने इस वर्ष इस पर्व को ऐतिहासिक असम राइफ़ल्स मैदान में आयोजित करने का निर्णय लिया है। जहां पर 5-6 मार्च को इस जश्न में हजारों की संख्या में लोग शामिल होंगे। इस उत्सव का मुख्य उद्देश्य मिजोरम की संस्कृति, कला और इतिहास को बढ़ावा देना है। दो दिनों के इस कार्यक्रम में राज्य के सभी अधिकारियों के साथ अमरीका, चीन, इजराइल, बांग्लादेश, थाईलैंड, म्यांमार, कोरिया, जापान, नेपाल, भूटान के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।

उत्सव में आने वाले सभी पुरूष, महिलाएं और बच्चे मिजो संस्कृति की पारम्परिक पोशाकों में आते हैं। इसके साथ ही वो सर पर पारम्परिक टोपी पहनते हैं जिसे तोते के पंखों से बनाया जाता है। महिलाएं इस अवसर पर मिजो भाषा के आदिवासी गीत गाती हैं और बांस के साथ चेराव नृत्य की प्रस्तुति में हिस्सा लेती हैं तो वहीं पुरूष विभिन्न प्रकार के नृत्यों और यृद्ध कलाओं का प्रदर्शन करते हैं। इस मौके पर राज्य की विभिन्न कलाओं की प्रदर्शनी भी देखने लायक होती है। जहां हस्तशिल्प, कढ़ाई-बुनाई, बांस की विभिन्न कलाकृतियां आपको अपनी तरफ आकर्षित करती हैं।

मिजोरम के कई पकवान आपके स्वाद के लिए यहां मौजूद रहते हैं जिनमें स्थानीय जड़ी-बूटियों, बांस की हरी कोंपलों, गोभी, आलू, चावल से बने ‘बाई’ से लेकर बांस के छोटे-छोटे टुकड़ों को तेल में डीप फ्राई और तरह-तरह के मसालों से बनाया गया स्वादिष्ट बम्बू शूट फ्राई शामिल हैं। इसके अलावा यहां आप मिजोरम के विशिष्ट पेय ‘जू’ का लुत्फ भी ले सकते हैं।

भारत एक ऐसा देश है जहां महज कुछ किलोमीटर के सफर पर ही एक नई बोली मिल जाती है, तो राज्य बदलते ही एक नई भाषा, संस्कृति, भूमण्डल देखने को मिल जाता है। लेकिन इन सब विविधताओं की एकता का नाम ही भारत है। अरूणाचल प्रदेश में सूर्य की पहली किरण से लेकर रात में गुजरात के कच्छ में दमकती रेत का दृश्य इस देश की खूबसूरती बयां करता है।

तो इस मार्च के महीने में लुभावने दृश्यों को देखने के लिए, प्रकृति के और करीब जाने के लिए, नए अद्भुत स्वादों से परिचित होने के लिए, अपने घर को मिजोरम की सुंदर कलाकृतियों से सजाने के लिए, उत्तर पूर्व की संस्कृति को करीब से जानने समझने के लिए पहुंचें मिजोरम के ‘चपचार कुट’ उत्सव में और देखें अतुल्य भारत का एक नया पन्ना।