बच्चों के पालन-पोषण को प्राय: अपने आप में चुनौती भरा काम समझा जाता है। अगर बच्चा बहुत ज्यादा आत्म-केंद्रित हो या खुद में खोया रहता हो तो यह चुनौती ज्यादा हो जाती है और मुश्किलें बढऩे लगती हैं। माता-पिता की यह शिकायत बेहद आम है कि उनके बच्चे अपनी ही दुनिया में रहते हैं और उनका बर्ताव लगभग ‘स्वार्थी जैसा है। इससे माता-पिता बहुत चिंतित रहते हैं। अगर आपका बच्चा या बच्ची अपनी ही दुनिया में रहता है और ‘स्वार्थी जैसा है, तो माता-पिता के लिए यह स्थिति चुनौती भरी हो सकती है। ऐसे आत्म-केंद्रित बच्चों को संभालने के लिए इन बातों का ध्यान रखें-

परिदृश्य के मुताबिक करने के लिए प्रोत्साहित करें
जो बच्चे नज़रिए के दायरे से बाहर सोचना नहीं चाहते, उनके मामले में विभिन्न चीजों का हवाला देकर या उनके परिदृश्य में बात करना लाभदायक हो सकता है। यह सब खेल के रूप में किया जा सकता है, जिसमें उन्हें धैर्य रखने और अपनी बारी का इंतज़ार करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। ऐसा बातचीत और चर्चा आदि के रूप में भी किया जा सकता है।

रोल मॉडल
बच्चे अक्सर दूसरों को देखकर सीखते हैं। उनका मस्तिष्क दूसरों से प्रेरित होता है। ऐसे में बतौर माता-पिता हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि जैसा बर्ताव हम बच्चों से चाहते हैं, उसका आदर्श रूप उनके सामने प्रस्तुत करें और ऐसा करके दिखाएं कि दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को किस तरह समझा जाता है।

बड़ी तस्वीर पेश करें
अगर हमेशा अपनी ही बात को मनवाना चाहते हैं, अपने नज़रिए को ही तवज्जो देते हैं तो इसका यही बुनियादी अर्थ है कि किसी चीज के बड़े पहलू को वे देख नहीं पा रहे हैं। इसलिए माता-पिता को ऐसे मामलों में विस्तार से पूरी बात सामने रखनी चाहिए, ताकि उसका हर पहलू बच्चों के सामने खुल जाए और बच्चे फिर इस दिशा में सोचना शुरू करें।

कहानियों- नाटकों की भूमिका
बच्चों के व्यक्तित्व को सुधारने में कहानियों, आख्यानों और ऐसे नाटकों की बड़ी भूमिका हो सकती है, जिनमें बच्चे खुद भाग लें। इससे उन्हें यह समझाने में बड़ी मदद मिल सकती है कि सोच का दायरा केवल खुद तक सीमित न रखने की कितनी जरूरत होती है।

विकास के चरण के बारे में सतर्क रहें
माता-पिता के तौर पर हमारे लिए यह बेहद जरूरी है कि हम विकास के चरणों के बारे में जागरूक रहें, क्योंकि विकास के ठीक पहले के ऑपरेशनल फेज की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि बच्चा अपने आप पर ही ध्यान देता है और केवल अपने बारे में सोचता है। इस चरण के दौरान बच्चों में केवल अपने नज़रिए से ही हर चीज को देखने की आदत पनपने लगती है। यह आमतौर पर 2 से लेकर 7 वर्ष तक के आयु वर्ग के बच्चों की खासियत होती है।

व्यवहार में बदलाव
व्यवहार में किसी भी दूसरे बदलाव की तरह लगातार अपनी बात पर जोर देने के सिद्धांत का पालन किया जाए तो उद्देश्य हासिल करने में बहुत मदद मिल सकती है।

सहानुभूति
संवेदना और सहानुभूति के दृष्टिकोण का विकास करना और बच्चे को इसके लिए (उसके विकास के स्तर के आधार पर) शिक्षित करना महत्वपूर्ण होता है। बच्चे के प्रति सहानुभूति भरा रवैया अपनाना सबसे अच्छा तरीका है, ताकि बच्चा इस व्यवहार को देख सके और इसे अपना सके।

सीखने के मौके बनाना
बच्चों में आत्म-केंद्रित हो जाने की स्थिति से निपटते हुए इस बेहद उपयोगी बात को ध्यान में रखना चाहिए कि उनके लिए सीखने के मौके बनाए जाएं। इसका अर्थ यह है कि माता-पिता को लगातार सक्रिय रूप से ऐसे अवसरों की तलाश में लगे रहना चाहिए ताकि बच्चा सहानुभूतिपूर्ण रवैये को समझने के साथ उसके महत्व का अनुभव कर सके।