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Lifestyle Tips : एक तरफ सासू मां………बहू तुम्हारे मामा आने वाले हैं, कुछ बढ़िया सा बना लेना, बच्चे भी साथ आ रहे है, छुटकी को तो मीठा बहुत पसंद है। दूध निकाल लो और एक तरफ खीर भी चढ़ा दो। अरे! बहू मुन्ने ने तो कपड़े गंदे कर दिए है, पहले इसके कपड़े बदलो।

तभी बाबूजी की आवाज आती है………. अरे! बेटा पहले मुझे एक कप चाय बना दो। ये आमतौर पर सभी घरों में देखने का मिलता है। एक औरत और उससे ढेर सारी अपेक्षाएं। उस पर बच्चों की अलग शिकायत कि मां ने बचपन में हमें वक्त नहीं दिया। अब अगर कोई बहू की स्थिति का अंदाजा लगाए, तो साफ तौर पर समझ सकता है कि बहू एक ऐसा पुर्जा है, जो 24 घंटों में से करीबन 18 घंटे बिना कोई छुट्टी लिए काम करती है। इतवार का वो दिन जो बाकी सदस्यों कें लिए मौज मस्ती और आराम करने का दिन समझा जाता है। बहू के लिए वो दिन और भी कठिन हो जाता है। एक तरफ बच्चों की भागदौड़, दूसरी ओर मेहमानों की आवभगत तो तीसरी ओर काम वाली बाई की छुट्टी। ये एक गजब की बात है कि इतवार के दिन काम वाली बाई को भी हम अवकाश दे देते हैं। मगर अपनी मां या बहू के लिए कोई छृट्टी तय नहीं की जाती है। 

कौन संभालेगा रसोई?   

अगर बहू कभी मायके चली जाती है, तो रसोई पूरी तरह से चौपट मिलती हैं। दरअसल, कौन सा सामान किस जगह पर जमाया है, इस सवाल का जवाब केवल बहू के पास होता है। नमक से लेकर चीनी की बर्नी तक, बर्तनों से लेकर दालों तक हर चीज बहू को पता होती है। अब भला बहू को छुट्टी मिले भी तो कैसे।

कौन रखेगा मेहमानों का ख्याल?

अब मेहमानों को भी इतवार को ही आना है और फिर खाना खाए बगैर नहीं जाना है। हम इस बात को भूल जाते हैं कि हम किसी से मिलने और उनसे बातचीत के लिए जा रहे हैं। गाड़ी में बैठते ही मेन्यु डिसाईड करने लगते हैं कि मामी को फोन कर दो हम आ रहे है, तो सांबर डोसा और आलू पूरी तैयार रखें। हैरानी की बात है कि हम खुद को पढ़े-लिखे और समझदार मानते हैं, मगर दूसरों के लिए हमारे मन में कोई सद्भावना नजर नहीं आती है। अगर आप किसी से मिलेने जा भी रहे हैं, तो सबसे पहले वक्त का ख्याल रखें कि कहीं हम खाने के समय या फिर किसी के आराम के समय के दौरान घर पर न पहुंचे। इससे सामने वाले को परेशानी भी झेलनी पड़ती है। साथ ही अगर आप किसी से मिलने निकल रहे हैं, तो पहले ध्यान रखें कि छुट्टी वाला दिन न हो। अक्सर बहुत से लोग दूसरों से मिलने के लिए अवकाश का ही इंतजार करते हैं।

कैसे होगी घर की साफ-सफाई?

कई घरों में इतवार के दिन को ही जाले उतारने से लेकर पंखों को साफ करने तक के लिए चुना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन सभी सदस्य घर पर होंगे, तो मिल बांट कर साफ-सफाई हो जाएगी। ऐसे में घर की बहू का रोल अहम होता है। साफ-सफाई में तो वो बराबर शामिल होती हैं। मगर उसके बाद सभी लोग थक कर सो जाते हैं या कहीं घूमने निकल जाते हैं। मगर बहू के लिए रसोई का द्वार खुला है और वो थकने के बाद भी बच्चों और घर के बाकी कामों को करने के लिए प्रतिबद्ध रहती है।                        

कौन लगाएगा धोबी घाट?

आजकल फुली ऑटोमेटिक मशीनों का दौर है, जिसमें कपड़े डलते ही कुछ देर में धुलकर और सूखकर बाहर आ जाते हैं। मगर उसके बाद उसको अलग-अलग करके धूप में पूरी तरह से सूखने के लिए डालना और फिर उनको प्रेस करके अलग-अलग जगहों पर रखना। इन सभी कामों की जिम्मेदारी भी बहू के कंधों पर होती है। अगर छुट्टी वाले दिन की बात करें, तो उस दिन बहू के पास अनेक कामों के अलावा ढेर सारे कपड़ें भी इकट्ठे हुए मिलते हैं, जिसमें सभी सदस्य सप्ताह भर के कपड़ों को धोने के लिए मशीन में डाल देते हैं। ऐसे में बहू को एक भी छुट्टी नसीब नहीं हो पाती है।

कौन संभालेगा बच्चे?

दिनभर काम में व्यस्त रहने के बावजूद बहू बच्चों की भी बखूबी परवरिश करती हैं। उन्हें सुबह स्कूल भेजने से लेकर दोपहर में स्कूल से वापिस लाने तक और फिर खाना खिलाकर उन्हें पढ़ाने तक हर काम बहू करती है। हालांकि इतवार को बच्चे तो घर पर होते हैं और बाकी सदस्यों की तरह उनका भी अवकाश रहता है। मगर माताएं उनके होमवर्क और स्कूल से मिलने वाले प्रोजेक्ट में उलझी रहती है। 

सोचने का विषय ये है कि जब तक घर में बहू नहीं आती है। तब भी सभी सदस्य अपने काम स्वयं करते हैं। मगर उसके बाद अचानक सारे कार्यों का सामूहिक बोझ बहू के कंधों पर डाल देना पूरी तरह से गलत है। मां बाप अपनी बेटियों को भी बेटों के समान परवरिश देते हैं। लेकिन एक दिन पराए घर जाकर उसी फूल जैसी बेटी को बहू का दर्जा मिल जाता है और फिर कामों की जिम्मेदारियां उसे थमा दी जाती है। खैर निष्कर्ष कुछ भी हो, मगर घर के बाकी सदस्यों की तरह ही परिवार की बहू को भी सप्ताह में एक छुट्टी मिलनी तो बनती हैं।

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