Sindoor Khela: नवरात्र का त्योहार देश में उत्साह और उमंग लाता है। देश के प्रत्येक राज्य में नवरात्र का त्योहार अलग-अलग तरह से मनाया जाता है। दुर्गा पूजा का पर्व पश्चिम बंगाल में विशाल तौर पर मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा बहुत प्रसिद्ध है जिसे दूर-दूर से लोग देखने आते हैं। नौ दिन देवी की पूजा- अर्चना की जाती है फिर वो दिन आता है जब मां दुर्गा की विदाई होती है। विजय दशमी के दिन मां दुर्गा को विदा करने से पहले सिंदूर खेला जाता है और ये दिन भक्तों को भावुक भी करता है। इस लेख में जानिए आखिर विजय दशमी को क्यों खेला जाता है सिंदूर और क्या है इसकी मान्यता।
सिंदूर खेला की मान्यता
ऐसी मान्यता है कि नौ दिनों के लिए मां दुर्गा पृथ्वी पर अपने मायके आती हैं इसलिए इन नौ दिनों के लिए उनकी पूजा अर्चना की जाती है। विजय दशमी के दिन देवी अपने मायके से अपने ससुराल जाती हैं। इस दिन सुहागन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके पीछे की मान्यता है कि ऐसा करने से देवी प्रसन्न होती हैं और उनके सुहाग की रक्षा करती हैं।
क्या है धुनुची नृत्य
धार्मिक कथा के अनुसार जब मां दुर्गा, महिषासुर का वध करने जाती हैं तो उनके भक्त धुनुची नृत्य कर देवी की शक्ति बढ़ाते हैं। यही कारण है की हर दुर्गा पूजा की सप्तमी से धुनुची नृत्य शुरू होकर नवमी तक चलता है। धुनुची नृत्य इतना आकर्षक होता है कि कोई भी व्यक्ति एक टक देखते ही रह जाये। धुनुची में नारियल के छिलके को बारीक करके उसमे कपूर डाल कर सुलगाया जाता है। फिर देवी के सामने नृत्य किया जाता है। अठखेलियों से भरा नृत्य सबको बहुत पसंद आता है।

दुर्गा पूजा भोग
विजय दशमी के दिन विसर्जन से पहले देवी की महाआरती की जाती है और देवी को शीतला भोग भी अर्पित किया जाता है । इस भोग में इलिश माछ, पंता भात और कोचर शाक होता है। इस भोग को प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है। विसर्जन का दिन बेहद भारी होता है। मां दुर्गा अपने भक्तों को आशीर्वाद देकर वापस लौट जाती हैं। उनके भक्त उन्हें ऐसे विदा करते हैं जैसे कोई व्यक्ति अपनी बेटी को विदा करता है। ये पल बहुत भावुक कर देने वाला होता है लेकिन बांग्ला में “आसछे बोछोर आबार होबे” कहा जाता है यानी अगले साल फिर ऐसा होगा, देवी फिर आएंगी जो की भक्तों की उम्मीद है।
