गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है-

‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’

अर्थात- ईश्वर के अनेकों रूप हैं और उनकी कथाएं अनंत हैं। यह कथन एकदम सत्य है। ईश्वर अनंत है और भगवान विष्णु का एक नाम अनंत भी है।

भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी कहा जाता है।

जब युधिष्ठिर ने इन्द्रप्रस्थ बनवाया तो उन्होंने राजसूर्य यज्ञ किया, उन्होंने सभी को आमंत्रित किया था। इन्द्रप्रस्थ ऐसा बना था कि जल के स्थान पर थल और थल के स्थान पर जल दिखाई देता था। दुर्योधन उस स्थान का सही से परीक्षण नहीं कर पाया इस पर द्रोपदी ने कहा ‘अंधे का पुत्र अंधा ही होता है।’ यह बात दुर्योधन को बहुत बुरी लगी। उसने छल-कपट की नीति अपनाकर युधिष्ठिर को द्रुत-क्रीड़ा में हराया। युधिष्ठिर अपना राजपाट सब हार गए। वे पांडव और द्रोपदी सहित वन चले गए। युधिष्ठिïर अत्यंत दुखी थे जब भगवान कृष्ण उनसे मिलने गए। तब भगवान ने उन्हें अनंत चतुर्दशी की कथा सुनाई और उन्हें ढाढ़स बंधाया। प्राचीनकाल में सुमंत नाम का एक उदार हृदय का तपस्वी ब्राह्मïण था जिसका नाम सुमंत था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उसकी एक परमसुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी जिसका नाम सुशीला था। कुछ समय बाद दीक्षा की मृत्यु हो गई, पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने दुशीला नाम की कर्कशा स्त्री से विवाह कर लिया। वह सुशीला को अत्यंत ताड़ना देती, ब्राह्मïण सुमंत ने कुछ दहेज देने की बात कही तो उसने दामाद को कुछ ईंट और पत्थर के टुकड़े दिए। कौंडिन्य ऋषि अपनी पत्नी सुशीला को लेकर आश्रम की ओर चल दिए परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे। सुशीला ने देखा वहां पर बहुत सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर पूजा कर रही थीं। सुशीला के पूछने पर उन्होंने उसे अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं उसी व्रत का अनुष्ठïन किया और ऋषि कौंडिन्य के पास आई। उसने चौदह गांठों वाला डोर हाथ में बांधा। वह संपन्न रहने लगे। एक बार कौंडिन्य ऋषि ने सुशीला के हाथ में डोरा बंधा हुआ देखा, उन्होंने डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी। धन के मद में चूर ऋषि ने उसका डोर तोड़ कर अग्नि में डाल दिया। उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई।

जब उन्होंने सुशीला से इसका कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा जलाने की बात कही। पश्चाताप करते हुए ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए कई दिनों तक वन में भटकते रहे। निराश होकर एक दिन वे भूमि पर गिर पड़े। तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले हे ‘कौंडिन्य। तुमने मेरा तिरस्कार किया, उसी से तुम्हें इतना कष्टï भोगना पड़ा। तुम दु:खी हुए। तुमने पश्चाताप किया और मैं तुमसे प्रसन्न हूं। अब तुम घर पर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो। चौदह वर्ष व्रत करने से तुम्हारा दु:ख दूर हो जाएगा क्योंकि तुमने चौदह गांठे तोड़ी हैं।’ चौदह वर्ष व्रत करने से उसके सारे क्लेश मिट गए। श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया जिसके प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्घ में विजयी हुए। व्रत को करते वक्त ऊं अनंताय नम: का जाप करना चाहिए।

अनंत चतुर्दशी को अनंत चौदस के नाम से जाना जाता है। इस दिन पूजा करने के बाद अनंत सूत्र बांधते हैं। इसकी खास वजह यह है कि अनंत सूत्र में 14 गांठें बंधी होती हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा होती है इसी दिन गणेश विसर्जन होता है। ये चौदह गांठें हरि द्वारा उत्पन्न चौदह लोकों (तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल, भू, भुव:, स्व:, जन, तप, सत्य, मह) की रचना के प्रतीक हैं। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को यदि चौदह वर्षों तक किया जाए तो व्रती को विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

भगवान सत्यनारायण की तरह ही अनंतदेव भी भगवान विष्णु को ही कहते हैं। इसलिए अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान सत्यनारायण की व्रत कथा भी सुनी जाती है। इसकी पूजा का विधान ये है कि जातक स्नान कर कोरा वस्त्र धारण करें। ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल पर कलश की स्थापना करें। कलश पर अष्टïदल कमल की तरह बने बर्तन में कुश से बने अनंत की स्थापना करें। कलश पर अष्टïदल कमल की तरह बने बर्तन में कुश से बने अनंत की स्थापना करें। अन्यथा भगवान विष्णु का कोई चित्र रखें। पूजा स्थल पर बैठकर एक डोरी या धागे में कुमकुम, केसर, हल्दी से अनंत सूत्र बनाते हैं इसमें 14 गांठें होती है इसे भगवान विष्णु पर चढ़ा देते हैं। विष्णु भगवान को प्रसन्न करने के लिए मंत्र जाप करते हैं- 

अनंत संसार महासमुद्रेमग्रं समभ्युद्घर वासुदेव।

अनंत रूपे विनियोजस्व हानंतसूताय नमोनमस्ते॥

पूजन के बाद अनंतसूत्र बांधते हैं। पुरुष दाएं हाथ पर और स्त्रियां बाएं हाथ पर अनंत सूत्र बांधती हैं।

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