“अतिथिदेवो भव” भारत में अतिथि सरकार की परम्परा बड़ी पुरानी है। यह अनन्त समय से चली आ रही है। आज के बदलते परिवेश में भी यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। यह महत्त्वपूर्ण सामाजिक व्यवहार है, जो मनुष्य की सामाजिक प्राणी होने का आभास कराता है। यह गुण भारतीय संस्कृति में रक्त के समान रचा-बसा है जो द्वार पर शत्रु के आने पर भी उसके अतिथ्य सत्कार का आ”वान करता है। इसलिए हर भारतीय धर्मग्रंथ में अतिथि के आदर-सम्मान का उल्लख मिलता है। हिन्दूधर्म में इसे शिष्टाचार ही नहीं है, अपितु मुख्यधर्म माना गया है। हिन्दू धर्म और संस्कृति अतिथिपरक है।
तैतिरीय उपनविषद् (1:11:2) की यह उक्ति समस्त जगत पर लागू होती है। ‘अतिथि देवो भव’। अर्थात् अतिथि देवता तुल्य होते हैं या अतिथि को देवता मानने वाले बनो।
भारतीय मनीषियों एवं धर्मग्रंथों ने चिरकाल से ही इसी परम्परा का पालन किया है जो धर्म का ही एक स्वरूप कहा गया है जो हर मनुष्य का कर्तव्य है। थके-हारे अतिथि को मरूभूमि में किसी वृक्ष की ठंडी छांव की भांति प्रतीत होता है अतिथि सत्कार किंतु उससे भी पहले गृहस्वामी का मुस्कानपूर्वक और सुहृदयता से स्वागत करना अतिथि की समस्त थकान को क्षण में ही दूर कर देता है।
कौन होता है अतिथि ?
जो निरंतर चलता है, ठहरता नहीं है वह अतिथि कहलाता है यानि (अत्+इथिन्)। घर पर आया और पहले से अज्ञात व्यक्ति अतिथि कहलाता है।
चिरकालीन परम्परा होते हुए भी मन में जिज्ञासा रहती है कि वास्तव में अतिथि किसे कहा गया है?…. या अतिथि किसे कहा जाए? वैदिक मनीषी भी ऐसी ही असमंजस की स्थिति का सामना करते थे इसलिए महर्षि मनु ने मनुस्मृति (3:102) में इसका आशय स्पष्ट किया है –
एकरात्रं तु निवसन्नतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः।
अनित्यं हि स्थितो यस्मात् तस्मादतिथिरुच्यते।।
अतिथि वह होता है जो एक रात ठहरने वाला हो और जिसके आने तथा ठहरने को कोई निश्चित या नियत तिथि न हो। दूसरे शब्दों में जिसका नाम, गोत्रा, स्थिति ज्ञात न हों और जो अकस्मात् घर आता है, उसे अतिथि कहा जाता है।

ऐसी है अतिथि सत्कार की परम्परा –
- अतिथि सरकार की परम्परा का पालन करते हुए आये हुए अतिथि को विनम्रतापूर्वक स्वागत कर आसन, जल तथा व्यंजन आदि के साथ सत्कारपूर्वक अन्न देना चाहिए। यदि अतिथि को भोजन कराने की शक्ति न हो तो तृण, जमीन, जल और मधुर बचन से ही उसका सत्कार करना चाहिए। गृहस्थ को अतिथि को खिलाकर ही सबसे अंत में भोजन ग्रहण करना चाहिए।
- यदि एक अतिथि सत्कार के बाद कोई दूसरा अतिथि आ जाए तो उसके लिए ताजा भोजन पकाएं। उनके विश्राम, शैय्या, सेवा का प्रबंध करें।
- किंतु यह भी प्रावधान है कि अतिथि के भोजन से पहले घर में रहने वाली नवविवाहित वधुओं, अविवाहित कन्याओं, गर्भिणी स्त्रिायों और रोगियों को भोजन करा देने से गृहस्थ अपयश का भागी नहीं बनता।
- किंतु अतिथि कितने दिन तक सत्कार योग्य होता है? इस बारे में भिन्न-भिन्न मत है किंतु बर्मा देश की लोकोक्ति के अनुसार अतिथि की अवधि केवल सात दिन की होती है। उससे ज्यादा टिकने वाला व्यक्ति अखरने लगता है। एक राजस्थानी लोकोक्ति के अनुसार अतिथि दो दिन तो अतिथि रहता है तीसरे दिन अखरने लगता है। डेनमार्क में आतिथ्य को तीन दिनों का माना गया है।
आतिथ्य का पुण्य
अतिथि सत्कार गृहस्थ का सबसे बड़ा धर्म है क्योंकि जिस व्यक्ति के घर से उसका अतिथि पूजित अर्थात् प्रसन्नचित होकर जाता है वह उसे पुण्य का भागी बनाकर लौटाता है। जबकि निराश होकर गया अतिथि उसका पुण्य ले जाता है और साथ ही अपना पाप कर्म वहीं छोड़ जाता है। जो गृहस्थ प्रसन्नतापूर्वक अतिथि स्वागत-सत्कार करता है वह प्रसन्नचित्त रहता है।
कैसा अतिथि देवतातुल्य ?
वैदिक साहित्य अतिथि को देवतुल्य मानते हैं। किंतु वास्तविक अतिथि उसे कहा जाता है जो बिना किसी प्रयोजन के, बिना बुलाए, किसी भी समय पर, किसी भी स्थान से घर में आता है। उसे ही अतिथि रूपी देवता कहते हैं। जिसके आने का पता हो वह अतिथि नहीं कहलाता।
कौन आतिथ्य योग्य नहीं ?
यद्यपि हमारी संस्कृति में अतिथि सत्कार की जड़े आज भी गहरी है, चाहे उसमें थोड़ा-बहुत अंतर आया हो किंतु इसका तात्पर्य यह नहीं कि हर व्यक्ति आतिथ्य का अधिकारी है।
- धर्मशास्त्रों में कुछ आगन्तुकों को आतिथ्य नहीं देने की बात कही गई है। जैसे कि ऐतरेय आरष्यक में कहा गया है कि केवल सज्जन व्यक्ति ही आतिथ्य के पात्रा हैं। अर्थात् दुर्जन लोगों का आतिथ्य नहीं करना चाहिए।
- महात्मा विदुर ने भी ऐसे मनुष्य का आतिश्य न करने और घर में न ठहरने की बात कही हैं जो अकर्मण्य, बहुत खाने वाले, क्रूर, देशकाल का ज्ञान न रखने वाले और निन्दित वेष धारण करने वाला हो।
- निश्चित तौर पर ऐसे व्यक्ति गृहस्थ को हानि पहुंचा सकते हैं, जिनसे बचने की सलाह भी दी गई है।
- मनु ने ऐसे व्यक्ति को अतिथि नहीं माना है जो आतिथेय के गांव का ही रहने वाला तथा भोजन के लोभ में गांव-गांव जाकर अतिथि रूप धारण करता हो तो वह पापकर्म के समान है, जिसके फलस्वरूप उसे अन्न देने वाले के यहां पशु योनि में जन्म लेना पड़ता है।
- जो अतिथि निर्धारित किए गए शिष्टाचार के नियमों का पालन नहीं करता है वह अपना मान-सम्मान गंवाने के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है।
- ऐतरेय आरण्यक में कहा गया है, ‘केवल सज्जन ही आतिथ्य के पात्र होते हैं।’

अतिथि सत्कार के प्रसंग
राजा शिवि ने अपने शरीर का मांस देकर अतिथि सत्कार का उदाहरण प्रस्तुत किया। वह राजा ययाति का पौत्र तथा राजा उशीनर व रानी दृष्द्वति का पुत्र था। एक बार इन्द्र ने बाज और अग्नि ने कबूतर का रूप धारण कर इनकी परीक्षा ली। तब बाज की भूख को शांत करने के लिए और कबूतर के प्राण बचाने की खातिर उन्होंने कबूतर के वजन के बराबर का अपने शरीर का मांस देने का आग्रह किया किंतु जैसे-जैसे वह अपना मांस काट-काटकर तराजू पर रखते, कबूतर वाला पलड़ा ज्यादा भारी हो जाता, तब उन्होंने अपना पूरा शरीर ही अर्पण कर दिया। उनके समर्पण भाव से प्रसन्न होकर बाज रूपी इन्द्र ने इन्हें मोक्ष का वरदान दिया। रामायण में जब विभीषण को शरण देने का सभी ने विरोध किया तब राम ने इसी कथा का उदाहरण देकर अपने निकटवर्ती लोगों को शांत और शरणागत विभीषण का उद्धार किया।
भारतीय संस्कृति में अतिथि सत्कार के ऐसे असंख्य प्रसंग मिलते हैं जब गृहस्थ ने अतिथि के स्वागत-सत्कार के लिए त्याग किया और परमार्थ एवं पुण्य के भागी बनें।
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