Connect children with Indian traditions and beliefs
Connect children with Indian traditions and beliefs

Indian Traditions for Children: दिवाली, गोवर्धन पूजा और भाई-दूज बच्चों के लिए सिर्फ रोशनी और मिठाई का त्यौहार नहीं, बल्कि परंपराओं, संस्कारों और अपनापन सिखाने का अवसर है। जब हम उन्हें छोटी-छोटी जिम्मेदारियों और कहानियों से जोड़ते हैं, तभी यह पर्व उनके दिलों में हमेशा के लिए बस जाता है।

त्योहारों का असली जादू रोशनी, मिठाई या पटाखों में नहीं छिपा होता, बल्कि उन पलों में बसता है जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर घर को सजाता है, कहानियां सुनाता है और परंपराओं की विरासत अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है। दीपावली का पर्व उसी जादू का प्रतीक है। यह केवल घरों को रोशन करने का अवसर नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने और रिश्तों में गर्माहट भरने का मौसम है। आज के बच्चे जिस तेज रफ्तार दुनिया में बड़े हो रहे हैं, वहां त्यौहार उनके लिए अक्सर छुट्टियों का नाम भर रह जाते हैं। मोबाइल स्क्रीन और व्यस्त दिनचर्या के बीच परंपराओं की गहराई कहीं खोने लगती है। लेकिन सोचिए, अगर वही बच्चे अपने हाथों से दीये जलाएं, दादी से रामायण के किस्से सुनें, मां के साथ गुझिया बनाते हुए आटे से खेलें, या पापा के साथ मंदिर की आरती में शामिल हों तो उनके दिलों में यह त्यौहार सिर्फ एक दिन की खुशी नहीं, बल्कि जिंदगी भर की याद बन जाएगा। दिवाली का मतलब है हर कोने में उजाला, हर रिश्ते में अपनापन और हर बच्चे के मन में संस्कार की लौ जलाना। यही वह समय है जब हम उन्हें केवल त्यौहार नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखा सकते हैं।

सवाल यही है कि कैसे हम बच्चों को दिवाली की परंपराओं से जोड़ें, ताकि यह त्यौहार उनके लिए केवल मिठास ही नहीं, बल्कि सीख और संवेदनाओं का भी उत्सव बन जाए।

अगर जरा पीछे लौटकर देखें तो 90 के दशक की दिवाली कुछ और ही रंग लेकर आती थी। मोहल्ले में हर घर के आंगन में चुना-पुताई की खुशबू, खिड़कियों से झांकती रोशनी और बच्चों की खिलखिलाहट त्यौहार को जादुई बना देती थी। दादी-नानी की कहानियां, पापा के साथ बाजार जाकर पटाखे खरीदना, मां के हाथों से बनी गुझिया और काजू कतली ये सब बच्चों को न सिर्फ त्यौहार का मजा देते थे बल्कि परिवार का गहरा अपनापन भी सिखाते थे। आज के बच्चों को वही माहौल शायद न मिले, लेकिन उस आत्मीयता और जुड़ाव को हम छोटे-छोटे तरीकों से जरूर लौटा सकते हैं।

दिवाली का असली आनंद अकेले में नहीं, बल्कि मिल-बांटकर मनाने में है। बच्चों को पड़ोस में बनी मिठाइयां देने के लिए साथ ले जाएं। यह छोटा-सा काम उन्हें सिखाएगा कि त्यौहार दूसरों के साथ बांटने से ही पूरे होते हैं।
परिवार के बुजुर्गों को भी इसमें शामिल कीजिए। जब दादा-दादी अपनी बचपन की दिवाली के किस्से सुनाते हैं तो बच्चों को लगता है कि यह सिर्फ उनका त्यौहार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से बहता आ रहा अनुभव है।

दिवाली की परंपराओं को बच्चों से जोड़ते समय उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाना भी जरूरी है। घर की सफाई केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता बनाए रखने का उपाय भी है। तेल के दीये जलाने से वातावरण में हल्की गर्माहट और सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है।
मिठाइयों और ड्राई फ्रूट्स का बांटना सिर्फ स्वाद की खुशी नहीं, बल्कि सर्दी में शरीर को ताकत देने का एक वैज्ञानिक तरीका है। जब बच्चे जानेंगे कि ये परंपराएं केवल धार्मिक नहीं बल्कि वैज्ञानिक कारणों से भी जुड़ी हैं, तो उनमें इन्हें निभाने का उत्साह और बढ़ेगा।

Diwali for families living abroad
Diwali for families living abroad

विदेश में बसे भारतीय परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि अपने बच्चों को भारतीय परंपराओं से कैसे जोड़ा जाए। इसका आसान उपाय है टेक्नोलॉजी। वीडियो कॉल पर परिवार के साथ पूजा में बच्चों को जोड़ना उन्हें यह अहसास कराता है कि दूरी केवल भौगोलिक है, भावनात्मक नहीं। वहीं, स्कूल में दिवाली पर एक छोटासा प्रेजेंटेशन या मिठाई बांटना बच्चों के लिए गर्व का क्षण बन सकता है। जब वे अपनी संस्कृति अपने विदेशी दोस्तों को समझाते हैं, तो उनके मन में अपनी जड़ों के लिए सम्मान और गहराता है।

Involve children in worship and faith
Involve children in worship and faith

लक्ष्मी-गणेश की पूजा केवल परंपरा नहीं, बल्कि समृद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक है। बच्चों को पूजा में शामिल करना बेहद जरूरी है। अगर वे मंत्र नहीं जानते तो भी उन्हें फूल चढ़ाने, दीया रखने या प्रसाद बांटने जैसे काम सौंपें। जब वे महसूस करेंगे कि उनकी छोटी-सी भूमिका भी पूजा का हिस्सा है, तो उनके भीतर श्रद्धा खुद-ब-खुद जन्म लेगी। कहानियों का जादू यहां सबसे ज्यादा
असर करता है। जब आप उन्हें राम के अयोध्या लौटने की कथा, समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी के प्रकट होने या नरक चतुर्दशी के महत्व की बातें कहानी की तरह सुनाएंगे, तो वे न सिर्फ सुनेंगे
बल्कि कल्पना में जी भी लेंगे।

आज के बच्चे सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बनना चाहते हैं। उन्हें दीये सजाने, रंगोली बनाने या घर सजाने में क्रिएटिव स्पेस दें। यह उनके लिए त्यौहार को ‘अपना’ बनाने का रास्ता बनेगा।
डिजिटल दौर में दिवाली को ‘डिजिटल डिटॉक्स’ का मौका भी बनाया जा सकता है। एक शाम परिवार तय करे कि सब मिलकर बिना मोबाइल और टीवी के केवल दीयों की रौशनी और बातचीत में समय बिताएंगे। बच्चों के लिए यह अनुभव जीवनभर यादगार रहेगा।
त्यौहार का असली मजा तब और बढ़ जाता है जब उसे दूसरों के साथ बांटा जाए। बच्चों को किसी अनाथालय या जरूरतमंद परिवार के पास मिठाई और कपड़े पहुंचाने ले जाएं। यह अनुभव उन्हें त्यौहार का असली अर्थ सहानुभूति और करुणा सिखाएगा।

दिवाली बच्चों को जिम्मेदारी देना सिखाती है। उन्हें पूजा की थाली सजाने दें, अपने पैसों से कुछ सिक्के दान करने दें या फिर अपनी बनाई हुई रंगोली का हिस्सा दिखाने का मौका दें। ये छोटे-छोटे काम उन्हें त्यौहार से जोड़ते हैं और यह अहसास दिलाते हैं कि उनकी भी एक महत्वपूर्ण भूमिका है।
दिवाली का संदेश सिर्फ बाहर की रोशनी तक सीमित नहीं, बल्कि भीतर के अंधकार को मिटाने में है। जब हम बच्चों को यह सिखाते हैं कि त्यौहार केवल पटाखों की आवाज या मिठाइयों की मिठास नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में उजाला फैलाने का अवसर है, तभी हम उन्हें इस पर्व की असली
आत्मा से जोड़ पाते हैं।


राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...