Summary: CBSE की नई पहल: दादा-दादी से जुड़ेंगे बच्चे, घटेगा स्क्रीन टाइम
सीबीएसई ने स्कूलों में दादा-दादी और नाना-नानी को औपचारिक रूप से जोड़ने की पहल शुरू की है, ताकि बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम कम हो सके।
CBSE New Initiative: बच्चों की दुनिया तेजी से मोबाइल और स्क्रीन के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। इसी चिंता को देखते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने एक नई और सराहनीय पहल शुरू की है। बोर्ड ने अपने सभी संबद्ध स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे बच्चों के दादा-दादी और नाना-नानी को स्कूल की गतिविधियों से औपचारिक रूप से जोड़ें। इसका उद्देश्य बच्चों को डिजिटल लत से दूर कर पारिवारिक मूल्यों और वास्तविक रिश्तों के करीब लाना है।
यह कदम आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 की सिफारिशों के अनुरूप उठाया गया है, जिसमें बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम पर चिंता जताई गई थी।
बदलती क्लासरूम संस्कृति
दिल्ली सहित देशभर के सीबीएसई स्कूलों में इस फैसले का असर साफ दिखाई देगा। महानगरों में अधिकतर माता-पिता कामकाजी हैं और बच्चे खाली समय मोबाइल पर बिताते हैं। ऐसे में दादा-दादी की स्कूल में मौजूदगी बच्चों के लिए भावनात्मक सहारा बनेगी। अब स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और अन्य राष्ट्रीय पर्वों पर दादा-दादी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाएगा। इसके अलावा ‘ग्रैंडपेरेंट्स वॉकथॉन’ जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जहां बुजुर्गों और बच्चों की भागीदारी साथ-साथ दिखेगी।
सिर्फ पढ़ाई नहीं, संस्कार भी
इस योजना के तहत स्कूलों में कई नई गतिविधियां शुरू की जाएंगी। कहानी सत्र में दादा-दादी अपने जीवन के अनुभव और लोक कथाएं सुनाएंगे। बच्चों को पारंपरिक खेल जैसे कंचे, गिट्टे, लट्टू और खो-खो के बारे में बताया जाएगा।
इसके साथ ही आर्ट और क्राफ्ट वर्कशॉप में मिट्टी के बर्तन बनाना, सिलाई-कढ़ाई और पारंपरिक हस्तशिल्प सिखाया जाएगा। दादी के घरेलू नुस्खे और पौष्टिक भोजन की जानकारी भी दी जाएगी। इस तरह बच्चे सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों से भी सीखेंगे।
एक पहल, दो बड़े फायदे
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, जब बच्चे अपने दादा-दादी के साथ समय बिताते हैं तो उनका मानसिक संतुलन बेहतर होता है। मोबाइल गेम और सोशल मीडिया से मिलने वाला अस्थायी आनंद कम होकर प्राकृतिक खुशी में बदलता है।
बच्चों को इससे दो फायदे होंगे। पहला, स्क्रीन की लत कम होगी। दूसरा, रिश्तों की अहमियत समझ आएगी। वहीं बुजुर्गों को भी अकेलेपन से राहत मिलेगी। बड़े शहरों में अकेलापन बुजुर्गों के लिए बड़ी समस्या है। यह पहल उन्हें सामाजिक जुड़ाव देगी।
व्यवहार को समझने का अवसर
अब तक स्कूलों में अधिकतर माता-पिता ही जाते थे। लेकिन इस पहल से दादा-दादी को भी बच्चों के स्कूल जीवन को देखने और समझने का मौका मिलेगा। वे बच्चों के व्यवहार और रुचियों को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। कई बुजुर्गों का कहना है कि इससे उन्हें अपने बचपन की यादें ताजा करने का अवसर मिलेगा। साथ ही बच्चों के साथ बिताया गया समय दोनों पीढ़ियों के रिश्ते को और मजबूत करेगा।
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल लत केवल आंखों को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि बच्चों की भावनात्मक समझ को भी कमजोर करती है। बढ़ते स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, नींद की कमी और परिवार से दूरी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे में बुजुर्गों के साथ समय बिताना बच्चों में धैर्य और संवेदनशीलता विकसित करेगा। भारतीय संस्कृति में संयुक्त परिवार की परंपरा को मजबूत करने का यह एक सकारात्मक कदम है।
स्क्रीन टाइम को संतुलित करना जरूरी
कोविड-19 के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई के कारण बच्चों का स्क्रीन टाइम बहुत बढ़ गया था। अब परिस्थितियां सामान्य हैं, इसलिए स्क्रीन के उपयोग को संतुलित करना जरूरी है। स्कूलों की भूमिका यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि स्कूल बच्चों को दादा-दादी से जोड़ने के लिए नियमित गतिविधियां आयोजित करेंगे, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से मोबाइल से दूर रहेंगे।
नई रूपरेखा और आगे की राह
कई स्कूलों ने ‘विरासत दिवस’ और ‘ग्रैंडपेरेंट्स डे’ मनाने की योजना बना ली है। कुछ स्कूलों में ट्रायल के तौर पर जब दादा-दादी को बुलाया गया, तो बच्चों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखा गया। इसके अलावा स्कूल होमवर्क के साथ ऐसे टास्क भी दे सकते हैं, जिनमें बच्चों को हर हफ्ते अपने दादा-दादी के साथ कोई गतिविधि करनी हो और उसकी जानकारी स्कूल में साझा करनी हो। इससे बच्चों और बुजुर्गों के बीच नियमित संवाद बना रहेगा।
परिवार ही पहली पाठशाला
भारतीय परंपरा में परिवार को पहली पाठशाला माना गया है। बच्चों को जीवन के मूल्य, संस्कार और धैर्य परिवार से ही मिलते हैं। सीबीएसई की यह पहल केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव की शुरुआत है। अगर यह प्रयास सफल होता है, तो आने वाली पीढ़ी तकनीक में आगे होने के साथ-साथ भावनात्मक रूप से भी समृद्ध होगी। दादी की कहानी और दादाजी का साथ बच्चों को जीवन की असली सीख देगा।

