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Ratna manikya - सूर्य का रत्न माणिक्य

Ratna manikya : सूर्य का प्रमुख रत्न माणिक्य है। इस रत्न का प्रयोग अनेक वास्तु- ज्योतिषीय समस्याओं के समाधान व रोगों के निवारण में किया जाता है। क्या है माणिक्य के गुण, कैसे करें असली माणिक्य की पहचान तथा क्या है इसकी रोग व रंग चिकित्सा? विस्तारपूर्वक पढ़ें इस लेख से।

जिस प्रकार प्रत्येक जीव में गुण एवं अवगुण होते हैं, उसी प्रकार रत्नों में भी गुण एवं दोष पाए जाते हैं।

माणिक्य के गुण एवं दोष इस प्रकार हैं-

गुण

● स्निग्ध अर्थात् चिकनाई युक्त होना चाहिए।
● स्वच्छ लालिमा युक्त अर्थात् लाल होना चाहिए।
● दीप्त कांतियुक्त अर्थात् जिससे प्रकाश की किरणें प्रस्फुटित होती हों।
● जल कांतियुक्त अर्थात् जिसके मध्य में जल की आभा दिखती हो।
● अति लोहित अर्थात् लोहे के समान मजबूत हो।
● श्रेष्ठ आकार युक्त अर्थात् जिसका आकार एवं कटाव आकर्षक हो।
● पारदर्शी अर्थात् जो पारदर्शक हो।
● जिसे दूध में डालकर देखें तो गुलाबी रंग का आभास दे।
● साफ जल में डालने पर जिसमें से किरणें दिखाई देने लगती हों।
● जो हाथ में लेकर मु_ी में बंद करने पर कुछ समय बाद गर्मी का आभास देता हो।

इस प्रकार उपरोक्त गुणों से युक्त माणिक्य शीघ्रातिशीघ्र लाभ प्रदायक सिद्ध होता है।

दोष

● जिस माणिक्य में काले धब्बे हों वह धन नाशक होता है। इसी प्रकार जिसमें सफेद धब्बे हों वह संतान की हानि करता है। जिसमें धुएं जैसे धब्बे हों अथवा वह पारदर्शी न हो वह प्राणघातक होता है।
● जिसमें चमक न हो वह सून्न कहलाता है। ऐसा माणिक्य मान-प्रतिष्ठा की हानि करता है।
● जो श्वेत रंग से युक्त हो अर्थात् जिसमें लालिमा न होकर वह दूध का आभास दे वह दूषित कहलाता है।
● आड़ी-तिरछी लकीरों से युक्त माणिक्य आत्मघातक होता है।
● बारीक छोटी-छोटी लकीरों से युक्त माणिक्य गृहस्थ जीवन के लिए अशुभ होता है।
● जिस माणिक्य में दो रंगों का आभास हो वह मानसिक अशांति उत्पन्न करता है।
● जिस माणिक्य में जाला हो वह अशुद्ध होता है। वह जातक से व्यर्थ की भागदौड़ करवाता है।
● जिसमें आर-पार न दिखलाई पड़े अर्थात् जो पारदर्शी न हो वह अशुद्ध होता है।
● जिसके रंग में चमक न हो, अर्थात् मलिन हो वह भी अशुद्ध होता है। शहद के रंग का माणिक्य भी अशुद्ध होता है।
● जिसमें लाल रंग के छींटें दिखलाई पड़े वह भी अशुद्ध होता है।

इसलिए माणिक्य खरीदने से पूर्व उसके गुणों एवं दोषों की जांच-परख अवश्य कर लेनी चाहिए। तभी उसका संपूर्ण लाभ उठाया जा सकता है।

माणिक्य की परीक्षा विधि माणिक्य की शुद्धता की जांच परख करने के लिए अनेकानेक विधियां प्रचलित हैं परंतु पाठकों की ज्ञानवृद्धि हेतु हम आसान व सरल विधियां ही दे रहे हैं ताकि वे स्वयं ही इसकी शुद्धता (असली) की पहचान कर सकें।

● प्रात:काल माणिक्य को सफेद कागज पर अथवा सफेद वस्त्र पर रखकर धूप में रखें और ध्यानपूर्वक देखें कि सूर्य की रश्मियों के प्रभाव से माणिक्य में से लाल रंग की किरणें स्फुटित होती अर्थात् चारों ओर बिखरती दिखलाई पड़ें तो समझना चाहिए कि वह असली है।
● उपरोक्त की भांति यदि माणिक्य को दर्पण पर रखकर धूप में रख दिया जाए और ध्यानपूर्वक देखा जाए कि माणिक्य की लाल किरणें दर्पण के छाया वाले भाग में भी दिखलाई पड़ रही हैं तो समझना चाहिए कि वह माणिक्य उत्तम श्रेणी का है।
● माणिक्य के वजन से सौ गुणा गाय का दूध लें और उसमें माणिक्य को डाल दें फिर ध्यानपूर्वक देखें कि उनमें से माणिक्य की लाल रंग की किरणें दिखाई पड़ रही हैं या नहीं। यदि हां तो समझना चाहिए कि वह उत्तम है अन्यथा नहीं। इसकी व्यावसायिक उपयोगिता बहुत होती है।
माणिक्य और नकली माणिक्य में अंतर-
● असली माणिक्य में यदि दूधक है और उसमें नीलिमा है, साथ ही दूधक चलता हुआ नहीं लगता तो वह यकीनन नकली है।
● यदि आंखों पर रखने पर माणिक्य ठंडेपन का अहसास दे तो वह असली है। इसके विपरीत यदि गर्मी का अहसास दे तो वह नकली है।
● आपेक्षिक गुरुत्व (वजन की दड़क) अनुसार असली माणिक्य का गुरुत्व नकली माणिक्य की अपेक्षा समझना चाहिए।
● असली माणिक्य में बुलबुले नहीं दिखलाई पड़ते यदि बुलबुलों का एहसास हो तो नकली समझना चाहिए।
● असली माणिक्य में चीरा नहीं होता। यदि चीरा हो भी तो यह जानना आवश्यक हो जाता है कि वह शीशे की है या माणिक्य की।
● नकली माणिक्य में कांच की भांति गोल बिंदु होते हैं जो होते तो असली माणिक्य में भी हैं परन्तु इनमें बहुत मामूली अंतर होता है जो ध्यानपूर्वक देखने पर ही समझ आता है।
● असली माणिक्य की परतें सीधी होती हैं जबकि नकली माणिक्य की परतें अर्धवलयाकार होती हैं।
माणिक्य किस उंगली में धारण करें?

माणिक्य सदैव अनामिका उंगली में धारण करना चाहिए क्योंकि यह सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है। इसे अंग्रेजी में रिंग फिंगर कहते हैं।
विशेष-
कुछ प्रबुद्ध पाठकों के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हो सकती है कि यही उंगली ही सूर्य की प्रतिनिधि क्यों हैं? इसका निर्धारण किस प्रकार किया गया होगा?
इसका उत्तर इस प्रकार है-

जिस प्रकार ब्रह्मांड में स्थित ग्रहों में सूर्य सर्वग्रहाधिपति है, सर्वशक्तिमान है, एवं सूर्य जिन भावों का कारक है, उसी प्रकार मानव शरीर भी स्वयं में एक ब्रह्मïांड ही है। यदि नाड़ी तंत्र का अध्ययन किया जाए तो हम पाएंगे कि अनामिका से होकर जाने वाली नाड़ियां हमारी बुद्धि अर्थात् मस्तिष्क के उस भाग से संबंधित हैं जो हमें निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती हैं, इसलिए इसे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते हुए सूर्य का प्रतिनिधि बनाया गया। इसी दृष्टिकोण के आधार पर हस्तरेखा विशेषज्ञों ने सूर्य की रेखा को हथेली में उंगली के नीचे माना है। इससे यह भली-भांति सिद्ध होता है कि हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने वैज्ञानिक आधार पर ही इनका निर्धारण किया था।

माणिक्य द्वारा रंग चिकित्सा

माणिक्य का रंग लाल होता है। यदि हमने माणिक्य धारण किया हुआ हो तो हमारी दृष्टि इस लाल रंग पर सदैव ही रहती है। जिससे हमें लाल रंग के अपेक्षित लाभ स्वत: ही प्राप्त होते रहते हैं। आइए, जानें कि माणिक्य का लाल रंग किस प्रकार हमें चिकित्सा भी प्रदान करता है।

● लाल रंग पराक्रम का प्रतीक है क्योंकि हमारे रक्त का रंग भी लाल है, अत: हमारे पराक्रम में वृद्धि होती रहती है।
● लाल रंग का माणिक्य धारण करने से हमें पूरे दिन स्फूर्ति बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।
● माणिक्य का लाल रंग हमें ऊर्जावान बनाता है।
● माणिक्य की लाली हमारे ओज एवं तेज में वृद्धि करती है।
● माणिक्य का लाल रंग जहां हमारे पराक्रम को बढ़ाता है वहीं सामने वाले का पराक्रम क्षीण करता है।
● माणिक्य का लाल रंग हमारे स्वास्थ्य की रक्षा में भी सहायता प्रदान करता है।
● माणिक्य की लाली हमारे शरीर में चुस्ती, फुर्ती को बढ़ाती है।

माणिक्य द्वारा मनोवैज्ञानिक चिकित्सा

माणिक्य धारण करने से प्राप्त होने वाले मनोवैज्ञानिक लाभ इस प्रकार हैं।

चरित्र का निर्माण- माणिक्य धारण करने से जातक चरित्रवान बनता है। उसके मन में अपने चरित्र के विषय में जागरुकता बढ़ जाती है जिसके परिणामस्वरूप उसके व्यवहार में शनै: शनै: प्रगाढ़ता बढ़ती चली जाती है।
आत्मबल में वृद्धि- माणिक्य धारण करने वाले जातक का आत्मबल और मानसिक बल इतना अधिक हो जाता है कि वह अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दृढ़ संकल्प होकर कार्य करता है और अंतत: सफलता अर्जित करता है।
व्यक्तित्व में, आकर्षण में वृद्धि- माणिक्य धारण करने से जातक की व्यक्तित्व व आकर्षण शक्ति स्वत: ही उत्पन्न होने लगती है जिसके परिणामस्वरूप उसके व्यवहार में आने वाले लोगों का पराक्रम उसके समक्ष आते ही शिथिल होना प्रारंभ कर देता है।
सेवा भावना में वृद्धि- माणिक्य धारण करने से जातक में सहानुभूति, दया और समाज सेवा की भावना जागृत हो जाती है और वह परोपकारी कार्यों की ओर उन्मुख होने लगता है जिससे उसे मान-सम्मान के साथ-साथ उच्च पद और प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है।
दृढ़ निश्चयी बनाता है- माणिक्य धारण करने वाले व्यक्ति दृढ़ निश्चयी हो जाते हैं, इसीलिए वे अपने कार्यों को सफल बनाने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहते हैं।
मनोबल में अपार वृद्धि- माणिक्य धारण करने वाले लोग वाद-विवाद, शास्त्रार्थ में कभी नहीं हारते उनका मनोबल बहुत ऊंचा हो जाता है।
भौतिक सुखों में वृद्धि- माणिक्य धारण करने वाले जातक को धन, भूमि, संपत्ति, वाहन इत्यादि का लाभ मिलता है। जिसके परिणामस्वरूप उसके जीवन में भौतिक सुखों में वृद्धि होने लगती है।
दैवी कृपा की प्राप्ति- माणिक्य धारण करने वाले जातक को दैवीय कृपा भी प्राप्त हो जाती है। जिसके फलस्वरूप उसके शत्रुओं स्वत: नाश हो जाता है।
नेतृत्व क्षमता में वृद्धि- माणिक्य धारण करने वाले जातकों में नेतृत्व करने की क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि होने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप जातक राजनीति में सक्रिय भाग लेकर उच्च पद प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक अभिरुचि में वृद्धि- माणिक्य धारण करने वाले जातक की आध्यात्मिकता रुचि में वृद्धि होती है, जिससे शनै: शनै: उसका भाग्योदय होने लगता है।
गुप्त विद्याओं की प्राप्ति- माणिक्य धारण करने से जातक को गुप्त विद्याओं की प्राप्ति स्वत: ही होने लगती है और उसकी रुचि इस ओर बढ़ती जाती है, जिसके फलस्वरूप वह उच्च कोटि का साधक भी बन सकता है।
महत्त्वाकांक्षा में वृद्धि- माणिक्य धारण करने वाले जातक की महत्त्वाकांक्षाएं बढ़ जाती हैं, जिनके फलस्वरूप वह जीवन में ऊंचे लक्ष्यों को प्राप्त करता है।
विशेष: यदि जन्मपत्री में सूर्य की स्थिति शुभ हो तो उसकी शुभता हेतु माणिक्य धारण करने से उपरोक्त लाभों की प्राप्ति होती है।

माणिक्य द्वारा रोग चिकित्सा

प्रकृति प्रदत्त इन रत्नों का लाभ केवल इन्हें धारण करने पर ही नहीं अपितु अन्य कई अन्य प्रकार से भी प्राप्त किया जा सकता है। प्राचीन काल से ही अनेक रोगों पर माणिक्य के प्रभावों का अध्ययन किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप माणिक्य जिन रोगों में लाभकारी सिद्ध हुआ है उनका वर्णन इस प्रकार है। यूं तो इस पर पूरा ग्रंथ भी अपर्याप्त है, इसलिए हम कुछ प्रचलित प्रयोगों का ही यहां वर्णन करेंगे। जो इस प्रकार हैं-
● वर्तमान समय में छोटी-सी चोट अथवा घाव होने पर तुरंत ही टिटनेस का टीका लगाया जाना आवश्यक माना गया है। प्राचीन काल में इस प्रकार की स्थिति में उस चोट अथवा घाव पर माणिक्य को चार-पांच बार फेर देने मात्र से घाव सड़ता नहीं था और न ही टिटनेस होने का भय रहता था। इसके लिए शुद्ध माणिक्य का ही प्रयोग किया जाता था।
● किसी भी प्रकार के रक्त विकार की स्थिति में माणिक्य की भस्म का सेवन करने से आशातीत लाभ प्राप्त होता है। यह भस्म बाजार में आसानी से उपलब्ध होती है।
● पीलिया एक घातक रोग है इसके उपचार में माणिक्य भस्म का प्रयोग लाभदायक होता है।
● माणिक्य के धोए जल का सेवन करने से खूनी दस्त भी कुछ ही दिनों में ठीक होने लगते हैं।
● नपुंसकता की स्थिति में माणिक्य की भस्म का सेवन अत्यंत चमत्कारी और रामबाण औषधि माना गया है।
● स्मरण शक्ति कमजोर हो अथवा स्मरण शक्ति का विकास करना हो तो माणिक्य के धोए जल का प्रात:काल खाली पेट नित्य सेवन करने से शीघ्र लाभ मिलता है।
● अतिसार होने पर भी माणिक्य का सेवन लाभकारी माना जाता है।
● रोगग्रस्त व्यक्ति के सिरहाने माणिक्य रखने से रोग के कीटाणुओं की रश्मियां नष्ट होने लगती हैं और रोगी को आराम मिलता है।
● शारीरिक दुर्बलता की स्थिति में माणिक्य का सेवन अत्यंत लाभदायक होता है।
● हर्निया रोग में भी माणिक्य लाभ देता है।
● रक्त प्रवाह को सुचारू करने में भी माणिक्य का सेवन उत्तम माना गया है।
● लकवे की बीमारी में माणिक्य की भस्म लाभकारी मानी गई है।
● संग्रहणी में भी माणिक्य का सेवन श्रेष्ठ माना गया है।
● प्रात:काल सूर्य की रश्मियों को माणिक्य में देखने से चेहरे की आभा में निखार आता है।
● उदर संबंधी रोग की स्थिति में साफ पानी में माणिक्य डालकर उसका सेवन करने से कुछ ही दिन में लाभ मिलना शुरू हो जाता है।

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