Chhath puja 2023
Chhath Puja 2023

उगते सूरज ही नहीं ढलते सूरज की पूजा का विधान है आस्था का महापर्व छठ पूजा

ये जाति समुदायों को भी जोड़ने वाला महापर्व हैं,और इस त्योहार में हर किसी का महत्व है। जितना उगते सूर्य का महत्व है,उतना ही ढलते सूरज का महत्व है।

Chhath Puja 2023: छठ पूजा ही एक ऐसा त्योहार है जिसमें लोग उगते सूर्य की पूजा अर्घ्य के साथ डूबते सूर्य की पूजा और अर्घ्य देते हैं। चार दिवसीय ये त्यौहार बिहार और उत्तरप्रदेश का महापर्व है, लेकिन अब तो इसे हर प्रांत के लोग मनाने लगे हैं। यहां तक कि अब इस पर्व की विदेशों में भी धूम है। बिहार वासियों के लिए तो ये त्यौहार मतलब अब घर जाने का वक़्त आ गया है, क्योंकि मां जो छठ कर रही है।

घर से दूर चाहे कहीं भी बच्चे और परिवार हैं, वो छठ में घर जरूर आते हैं। बिहार वासियों के लिए छठ एक भावना है,और “प्रकृति” को “थैंक्यू” कहने का अवसर है। ये त्योहार धार्मिक दृष्टकोण के साथ साथ वैज्ञानिक महत्व भी रखता है।चार दिवसीय इस त्यौहार की शुरुआत लगभग इसके शुरू होने से एक महीने पहले शुरू हो जाती है,और दीवाली आते आते इसकी तैयारी अंतिम चरण पर होती है।

दरअसल, ये महापर्व कार्तिक माह के चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक मनाई जाती है। अंग्रेजी महीने में कभी ये अक्टूबर या नवंबर माह में आता है।

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उगते और ढलते सूरज का महत्व

इस पूजा में पारम्परिक प्रसाद बनाएं जाते हैं जिसे “ठेकुआ” कहा जाता है। इस पूजा में माता छठी और सूर्य भगवान की पूजा की जाती है। लोक गीत गाएं जाते हैं। बिहार में छठ गीत में सबसे लोकप्रिय गीत बिहार की “लोकगायिका” शारदा सिन्हा के गीतों को खूब पसंद किया जाता है। इस त्यौहार को बिहार के हर हिन्दू समुदाय के लोग करते हैं। जितना उगते सूर्य का महत्व है, उतना ही ढलते सूरज का महत्व है। ये व्रत सिर्फ महिलाएं ही नहीं पुरुष भी पूरे श्रद्धा भाव से करते हैं।

चलिए जानते हैं चार दिनों का ये महापर्व कैसे किया जाता है, क्या हैं इसके नियम?

नहाय खाय

Chhath Puja 2023
Paran Prasad

छठ सबसे कठिन व्रतों में से एक है। जिसमें पहले दिन यानि चतुर्थी तिथि को व्रती नहाय खाय से पूजा का संकल्प लेते हैं और इसे पूरा करते हैं।

“नहाय खाय” से तात्पर्य इस दिन व्रती किसी पवित्र नदी में स्नान करते हैं। उसके बाद दैनिक पूजा पाठ के बाद नहाय खाय का प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे बिहार में ” कद्दू भात” भी कहा जाता है। इस प्रसाद में “कद्दू” जिसे “लौकी “भी कहा जाता है विशेषकर इसके ही व्यंजन बनाएं जाते हैं। जैसे, सब्जी, कद्दू दाल, बचका, कद्दू का रायता इत्यादि बासमती चावल के साथ बनाया जाता है। इस प्रसाद को व्रती के ग्रहण करने के बाद सभी लोग खाते है।

खरना

Kharna
Kharna

छठ महापर्व का दूसरा दिन होता है “खरना” जो पंचमी तिथि होती है। व्रती सुबह स्नान कर “सूर्य भगवान” और “माता छठी” की उपासना कर पूरे दिन व्रती सुबह से निर्जल उपवास रखकर “खरना” का प्रसाद बनाते हैं। फिर संध्या समय केले के पत्ते पर रोटी और खीर का भोग लगाते हैं,और इसी प्रसाद को ग्रहण करते हैं। इसके बाद से छठ का निर्जल उपवास शुरू हो जाता है।

संध्या अर्घ्य

Sandhya Ardhya
Sandhya Ardhya

छठ महापर्व का तीसरा दिन होता है संध्या अर्घ्य जो षष्ठी तिथि को होता है। इस दिन घर के सारे लोग व्रती के साथ मिलकर छठ का महाप्रसाद जिसे ” ठेकुआ” कहा जाता है वो बनाते हैं। फिर इसे बांस से बने “सूप या टोकरी” में फल, फूल, ईख, नारियल, चीनी के सांचे, गुड़ चावल से बने लड्डू, पिरकिया के साथ सजाया जाता है। फिर इसे टोकरी में बांधकर इसे माथे पर रखकर सारे लोग किसी नदी या तालाब की ओर प्रस्थान करते हैं। वहां व्रती पानी में कुछ देर कष्ट कर हाथ पर इन प्रसाद से भरे सूपों के समक्ष “डूबते सूर्य” को पूरे परिवार के साथ अर्घ्य देते हैं। इस पूरे दिन व्रती निर्जल और निराहार रहते हैं। इसके साथ ही छठ का ये तीसरा दिन संपन्न होता है।

पारण

छठ महापर्व का अंतिम दिन यानि “सप्तमी” तिथि होता है। इस दिन ब्रह्ममुहुर्त में ही सारे लोग उठकर घाट जाने की तैयारी करते हैं। फिर वहां नदी में व्रती हाथ में फूलों और फलों से सजे सूप को रखकर सूर्य भगवान का ध्यान करते हैं। फिर सारे लोग उगते सूर्य को पूरी श्रद्धा के साथ अर्घ्य देते हैं। माता छठी और सूर्य की अराधना के साथ छठ का ये आखिरी दिन समाप्त होता है। फिर व्रती इसी प्रसाद को सभी लोगों में वितरित कर उनकी मंगल कामना का आशीर्वाद देती हैं। व्रती इसी प्रसाद को ग्रहण  कर अपने निर्जल व्रत को तोड़ती है, जिसे “पारण” करना कहा जाता है। 

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छठ पूजा से जुड़े अन्य रोचक तथ्य:

छठ पूजा में महिलाएं क्यों लगाती हैं पीला सिंदूर?

इस दिन सभी सुहागनों को माथे से नाक तक नारंगी रंग के सिंदूर में भी देखा जाता है। ये सिंदूर अधिकतर बिहार और उत्तरप्रदेश की विवाहिता ही लगाती हैं। छठ में महिलाएं अपने संतान और सौभाग्य के लिए माता छठी और सूर्य भगवान से प्रार्थना करती हैं। और ऐसा माना जाता है जितनी लंबा सिंदूर होगा उतना ज्यादा पति की आयु भी होंगी।इसलिए महिलाएं नाक से माथे तक लंबे सिंदूर लगाती हैं।

कौन हैं छठी मईया?

Chhathi Maiya
Chhathi Maiya

बहुत लोगों के मन में सवाल रहता है कि ये छठी मां कौन है? दरअसल छठी मां देवी का छठा रूप मां “कात्यानी” हैं,और इन्हीं की अराधना छठ में भगवान सूर्य के साथ की जाती है। षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानस पुत्री कहा जाता है। इनकी अराधना से सुनी गोद भी भर जाती है। इन्हीं को माता “कात्यायनी” और “छठी मैया “भी कहा जाता है।

छठ महापर्व में इन नियमों का ध्यान रखें

*छठ पूजा में भोजन सात्विक ही घर पर बनाना चाहिए।

*लहसुन प्याज पूरी तरह वर्जित ही रखें।

*मांस मदिरा का सेवन ना करें इससे अपशकुन होता है।

*छठ के दिनों में पूरी तरह ब्रह्मचर्य का पालन करें।

*व्रत के दिनों में जमीन पर ही सोएं।

*व्रत के ये चार दिन पूरे श्रद्धा के साथ निभाएं। मन में कोई द्वेष या बुरे विचार ना रखें।

*घर के सभी सदस्य इन नियमों का पालन करें नहीं तो छठ की पूजा का फल नहीं मिलता।