सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा तीन देवों में से एक है और जब उनकी छवि सामने आती है तो उनके चार मुख, चार हाथ, हाथों में किताब, माला, कमडंल व फूल आदि पकड़े हुए आसानी से देखा जा सकता है। जहां अधिकतर हिन्दू देवी-देवताओं में किसी ना किसी प्रकार का हथियार नजर आता है, जैसे भगवान विष्णु के हाथ में चक्र और भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल आदि। लेकिन भगवान ब्रह्मा शायद इन सबसे अलग है। वह सृष्टि के रचयिता हैं और इसलिए संहार या विध्वंस से संबंधित कोई भी वस्तु उनके हाथ में नजर नहीं आती। वह कमल पर विराजते हैं और हंस की सवारी करते हैं। अगर उनके प्रतीकों को बारीकी से समझा जाए तो उनका हर प्रतीक किसी ना किसी चीज को रिप्रेजेंट करता है। हो सकता है कि आपने अभी तक भगवान ब्रह्मा के इन प्रतीकों पर कभी बारीकी से ध्यान ना दिया हो, लेकिन आज हम आपको उनके मुख से लेकर उनके हाथों में मौजूद वस्तुओं के वास्तविक अर्थ के बारे में बता रहे हैं-

चार मुख

ब्रह्मा न केवल निर्माता हैं, बल्कि वे दुनिया की घटनाओं के साक्षी भी हैं। इसलिए उनके बारे में कहा जाता है कि दुनिया के हर कोने को देखने के लिए उनके चार सिर हैं। उनके चार मुखों को चारों वेदों की रचना करने का श्रेय दिया जाता है। सनातन धर्म के अनुसार उनके चार मुख चार वेदों के प्रतीक हैं, अर्थात्- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। चूंकि ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता होने के साथ-साथ ज्ञान के देवता भी माने जाते हैं, इसलिए उनसे जुड़ी हर चीज किसी ना किसी रूप में ज्ञान से संबंधित ही है।

चार हाथ

अगर आपने कभी भगवान ब्रह्मा की तस्वीर को गौर से देखा होगा तो आपको उनके चार हाथ नजर आए होंगे। उनके चार हाथ मानव स्वभाव के चार पहलुओं को दर्शाते हैं-  मन, बुद्धि, अहंकार और वातानुकूलित चेतना। वहीं ब्रह्मा जी अपने एक हाथ में पुस्तक को रखते हैं जो दुनिया में ज्ञान का प्रतीक है। वहीं दूसरे हाथ में मौजूद कमंडल यह दर्शाता है कि पूरा ब्रह्मांड पानी से विकसित हुआ है। इतना ही नहीं, ब्रह्मा जी के पास एक मनके वाली माला है, जिसका उपयोग वह ब्रह्मांड के समय पर नज़र रखने के लिए करते हैं। इसके अलावा उनके हाथ में मौजूद फूल प्रकृति व धरती पर जीवन को प्रतिबिंबित करता है।

सफेद दाढ़ी

ब्रह्मा जी को अक्सर सफेद दाढ़ी में देखा जाता है, जो उनके ऋषि-समान अनुभव को दर्शाता है। अर्थात् यह उनके अथाह ज्ञान का प्रतीक है। कुछ वैदिक यज्ञों में, ब्रह्मा को प्रजापति के रूप में रहने और अनुष्ठान की निगरानी करने के लिए बुलाया जाता है।

कमल

भगवान ब्रह्मा को हमेशा ही कमल के ऊपर बैठा हुआ देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि वह भगवान विष्णु की नाभि से उगने वाले कमल से विकसित हुए हैं। यह एक तरह से मां के गर्भ में एक बच्चे को उसकी नाभि से जोड़ने को भी प्रतीकात्मक रूप में प्रदर्शित करता है। 

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