पगड़ी सिख समुदाय की आन, बान और शान मानी जाती है। सिख धर्म के लोग चाहे दुनिया के किसी भी कोने में रहें, लेकिन वह पगड़ी अवश्य पहनते हैं। पगड़ी को पग भी कहकर पुकारा जाता है। यह सिख समुदाय की पहचान होती है। आज हम पग और दाढ़ी देखकर दूर से ही यह समझ जाते हैं कि सामने वाला व्यक्ति सिख समुदाय से संबंधित है। लेकिन क्या आपको पता है कि सिख समुदाय द्वारा यह पग पहनने का चलन कब से शुरू हुआ। यह कब से अस्तित्व में आया। अगर नहीं, तो चलिए आज हम आपको इस लेख में इस बारे में बता रहे हैं-

जानिए अर्थ

पगड़ी या पग को मुख्य रूप से दस्तार भी कहा जाता है। दस्तार शब्द दस्त-ए-यार अर्थात् “भगवान का हाथ” से निकला है। सिख धर्म से जुड़े हेडवियर का एक आइटम है, और सिख संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं, फारसी में, दस्तर शब्द किसी भी प्रकार की पगड़ी को संदर्भित कर सकता है।

पांच के है बेहद महत्वपूर्ण

सिख धर्म में पांच के बेहद महत्वपूर्ण है और इसी के अनुसार दस्तार का एक अलग महत्व है। खालसा सिख पुरुष और महिलाएं, जो हमेशा पांच के रखते हैं। इन्हीं के मे एक है केश। इसलिए, सिख अपने लंबे बालों को कभी नहीं काटते और बिना कटे बालों (केश) को ढकने के लिए पगड़ी पहनते हैं। सिख दस्तार को विशिष्ट सिख पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। सिख धर्म में दस्तार समानता, सम्मान, आत्म-सम्मान, साहस, आध्यात्मिकता और पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है।

शुरूआत से ही रहा है सिख धर्म का हिस्सा

दस्तार पहले गुरु, गुरु नानक के समय से सिख धर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। बता दें कि गुरू नानक देव जी ने गुरु अमर दास को एक विशेष दस्तार के साथ सम्मानित किया जब उन्हें अगला गुरु घोषित किया गया। वहीं, जब गुरु राम दास की मृत्यु हुई, गुरु अर्जन को गुरुशिप के दस्तार से सम्मानित किया गया। शुरूआत में यह भले ही सम्मान से जुड़ा हो, लेकिन औरंगजेब के शासनकाल में यह सिख धर्म के लोगों के लिए अनिवार्य व उनकी पहचान बन गया। बता दें कि औरंगज़ेब के शासन काल में ही शहंशाह ने एक खास आबादी अर्थात् गैर मुस्लिमों, विशेष रूप से सिखों की पहचान के लिए पगड़ी की व्यवस्था शुरू की। बाद में, जब औरंगज़ेब के हाथों सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर को मौत की सजा दी गई, उस समय उनके बेटे और दसवें सिख गुरु गोबिंद जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। खालसा पंथ की स्थापना के साथ ही शासन का विरोध प्रदर्शन करने और सिखों की आज़ादी और समानता का प्रतीक के रूप में पग को चुना। तभी से, सिखों के लिए पग पहनना अनिवार्य हो गया।

अंग्रेजी शासन काल में शुरू हुई दाढ़ी बांधने की परंपरा

अगर आप ध्यान दें तो यह पाएंगे तो सिख समुदाय केवल पग ही नहीं पहनते, बल्कि अपनी दाढ़ी को भी बांधते हैं। हालांकि, इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा है। दरअसल, जब ब्रिटिश राज ने भारत में अपनी पकड़ बनाना शुरू किया तो उन्होंने सिख समुदाय द्वारा पग पहनना काफी अच्छा लगता था। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी हुकूमन के दौरान एक ख़ास आकार और सिमिट्री वाली पग का चलन शुरू किया। ताकि विशिष्ट समुदाय की सेना की पहचाना आसानी से की जा सके। इतना ही नहीं, अंग्रेज़ों की वजह से ही सिखों द्वारा अपनी दाढ़ी को बांधने का चलन भी शुरू हुआ। दरअसल, उस समय अंग्रेजों द्वारा अलग तरह की बंदूक का इस्तेमाल किया जाता था और उसे इस्तेमाल करते समय खुली दाढ़ी में आग लगने की संभावना रहती थी। जिसके कारण सिपाहियों को हिदायत दी गई थी कि वो दाढ़ी को ठोड़ी के पास बांधें, ताकि कोई अनहोनी ना हो। उस समय दाढ़ी बांधने का जो चलन शुरू हुआ, वह आज तक बदस्तूर कायम है।

आजादी के बाद केवल सिख समुदाय ने पहनी पग

जहां आजादी से पहले सिखों के अलावा हिन्दू व मुस्लिम समाज के लोग भी पग पहना करते थे और इसे सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता था। हालांकि, उनकी पग का कलर व पहनने का तरीका अलग-अलग था। लेकिन जब भारत को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिली, तो अलग-अलग धर्मों के लोगों ने पग पहनना छोड़ दिया। दरअसल, आजादी के समय भारत का बंटवारा हुआ था और एक अलग देश पाकिस्तान बना था। उस दौरान देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे। उस दौरान एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों के खून के प्यासे हो गए थे। इसी कारणवश हिंदुओं ने भी पगड़ी पहननी छोड़ दी क्योंकि दंगों में उन्हें लोग सिख समझ रहे थे और इसलिए उन्हें हमले का शिकार होना पड़ रहा था। वहीं, दूसरी ओर जो मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे, उन्होंने दाढ़ी तो रखी लेकिन पगड़ी पहनना छोड़ दिया था। हालांकि, आजादी के बाद सिख समुदाय ने पगड़ी पहनना नहीं छोड़ा और आज यह उनकी विशिष्ट पहचान बन गया है।

इतिहास में दर्ज है इसकी महत्ता

सिख धर्म के कई गुरुओं ने दस्तार या पग पहनने की महत्ता का वर्णन किया है।

अंतिम मानव सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने लिखाः

 

कंघा दो वक्त कर, पाग चुने कर बंधाई।

अर्थ- “अपने बालों को दिन में दो बार कंघी करें और अपनी पगड़ी को सावधानी से बांधें, बारी-बारी से घुमाएँ।”

वहीं, सबसे पहले सिख इतिहासकारों में से एक भाई रतन सिंह भंगू ने श्री गुर पंथ प्रकाश में लिखा हैः

 

दोई वेले उठो बंदो दस्ते, पहर आठ रख्यो शास्त्र सांभरे

केसन की किजो प्रीतपाल, नाह उस्तान से कट्यो वाल

अर्थ- दिन में दो बार दस्तार बांधें और शास्टर (धर्म की रक्षा के लिए हथियार) पहनें, और उन्हें 24 घंटे देखभाल के साथ रखें। अपने बालों की अच्छी देखभाल करें। अपने बालों को ब्लेड से न काटें।

इस तरह आप समझ सकते हैं कि सिख धर्म के लिए पग कितनी महत्वपूर्ण है। चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन वह अपनी पग पर कभी भी आंच नहीं आने देते, क्योंकि यह उनके धर्म, सम्मान व प्रतिष्ठा से जुड़ी है।

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