अष्टवसु, एकादश रूद्र, द्वादश आदित्य, इन्द्र और प्रजापति नाम से तैंतीस संख्या वैदिक देवताओं की कही गई है। प्रत्येक देवता की विभिन्न कोटियों की दृष्टि से तैंतीस कोटी संख्या लोक-व्यवहार में प्रचलित हो गई।

कुछ विद्वानों के तर्क से आकाश में तैंतीस करोड़ तारे हैं।
1. ‘देवगृहा वै नक्षत्राणि’
2. ‘द्यौर्वै सर्वेंषां देवानामायतनम्’

सारे दैदीप्यमान नक्षत्र देवताओं के घर हैं। द्युस्थान में सब देवताओं का आवास है। इस दृष्टिकोण से आकाश की असंख्य तारे ही तैंतीस करोड़ देवता हैं।