युग-युगांतर से सनातनधर्मी हिंदुओं का आशंका रहित भरोसा रहा है कि गंगाजल सर्वदा पवित्र है। उसमें किसी भी मलिन वस्तु के संपक्र से मलिनता नहीं आती, अपितु जिस वस्तु से उसका स्पर्श हो जाता है वह निश्चित रुप से पवित्र तथा शुद्ध हो जाती है। भारत की पुरातन सभ्यता एवं संस्कृति ने जिस किसी भी विषय का धार्मिक गुणगान किया है, उसमें हरदम ही जनहित का रहस्य जरुर रहता है। विदेशी विशेषज्ञों के शोध-निर्णय पर उतना आश्चर्य नहीं है, जितना आश्चर्य अपने महामनीषी, महर्षियों की विलक्षण ज्ञानमयी दृष्टि पर होता है। गंगा के जिस जल की धारा में मुर्दे, हड्डियां आदि दूषित वस्तुएं बह रही हैं, वहीं कुछ फीट नीचे का गंगाजल पूर्ण शुद्ध रहता है।

गंगोत्री से समुद्र तक के पथ में कितने ही नदी-नाले गंगा जी में प्रविष्ट होते हैं, लेकिन गंगाजल का अद्भुत गुण गंगोत्री से गंगा सागर तक अक्षुण्ण बना रहता है। गंगा जल सालों तक रखे रहने पर भी दूषित नहीं होता। जब कि अन्य समस्त नदियों का जल कुछ ही वक्त में खराब एवं बदबू युक्त हो जाता है। अर्चना में बासी गंगा जल वर्जित नहीं है। भव बाधाओं से छुटकारा पाने के लिए गंगाजल घरों में रखा जाता हैं। मरणासन्न अवस्था में आत्मा की शांति तथा मुक्ति के लिए गंगा जल और तुलसीदल मुख में सद्भावनापूर्वक डाला जाता है। जिनके पापों का प्रायश्चित भी असंभव है, उनकी भी गंगाजल के सेवन सुख तथा शांति का अहसास होता है। गंगा स्नान के नियम तथा व्रत से धन-संपत्ति तथा कीर्ति प्राप्त होती है। जो सैकड़ों योजन दूर से भी ‘गंगा-गंगा’ का शायद उच्चारण करता है, वह तमाम पापों से मुक्त हो विष्णुलोक को जाता है। गंगा जल को गर्म करना दोष माना गया है। प्रज्ञा तथा प्रतिभा देने वाले गंगा जल की बड़ाई तो है ही, साथ ही आयुर्वेद के अनुसार से तन की निरोगता के अपार गुणों का अहसास भी हमारे पूर्वजों ने हजारों साल पूर्व कर लिया था।

संक्रामक बीमारियों को शमन करने में गंगाजल सर्वश्रेष्ठ है। गंगोदक में खून वृद्धि तथा कीटाणु समाप्त करने की अलौकिक सामर्थ्य है। गंगाजल पीने से अजीर्ण, जीर्ण ज्वर, संग्रहणी, राजयक्ष्मा, तपेदिक, कुष्ठ आदि व्याधि खत्म हो जाते हैं। गंगा में स्नान करने से मस्तक के और त्वचा रोग ठीक हो जाते हैं। आर्थिक दृष्टि से गंगा हमारी अमूल्य धरोहर है। विश्व के उर्वर भूखंड़ों में गंगा का कछार ही सर्वश्रेष्ठ है। कृषिकर्म का श्री गणेश गंगा की घाटी में ही हुआ था। गंगा की रेत में खरबूजे, तरबूज तथा ककड़ियां होती हैं। जंगलों की लकड़ी तथा काष्ठ गंगा की वेगवती धारा से संचालित होते हैं, जिससे मेहनत और धन दोनों की बचत होती है। गंगा की राह हमारा व्यापार चला तथा गंगा जी के तीर पर हमारे नगर खड़े हुए।

गंगा की पवित्रता और आश्चर्यजनक आध्यात्मिक शक्ति को अन्य सम्प्रदायों ने भी स्वीकार किया। रहीम, रसखान, ताज और मीर की हृदयस्पर्शी रचनाएं इसकी गवाह हैं। सुल्तान मुहम्मद तुगलक, बादशाह अकबर तथा कट्टरपंथी औरंगजेब के लिए खाने-पीने की सामग्री के साथ गंगा का जल भी रहता था। महर्षि वाल्मीकि, आदि शंकराचार्य, कालिदास, कात्यायन, पातंजलि, चाणक्य, सूरदास, तुलसीदास ,भारतेन्दु हरिश्चंद्र, महाकवि पद्माकर, राजदूत मुगस्थनीज, चीनी पर्यटक हुएन्सांग तथा ऐसे ही अनेकानेक महापुरुषों ने गंगा जी की स्तुति कर ओर अपनी अपनी उत्कृष्ट रचनाएं लिखकर अपनी वाणी पवित्र तथा लेखनी धन्य की है। इन सबकी तेजस्विता का रहस्य गंगाजल था।

गंगा जी को विदित है कि और लोग तो अपने पाप देने के लिए ‘ मेरे पास आते हैं,जबकि संत मुझे पावन करते हैं।’ कहते हैं जब प्रयाग में भारद्वाज मुनि स्नान करने आते थे, तब गंगा भी अति उत्साह तथा खुशी से 25 सीढ़ियां ऊपर आ जाती थीं। महर्षि वाल्मीकि की श्रद्धांजलि रही है-‘हे माता भगीरथी ! तुम्हारे तट पर निवास करने, तुम्हारे जल का पान करते, तुम्हारी लहरों में झूलते, तुम्हारा नाम लेते, तुम्हीं में दृष्टि लगाए हुए मेरा शरीरपात हो।’ ‘ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या’ का उद्घोष करने वाले श्री आदि शंकराचार्य बेहद आश्चर्य चकित होकर प्रेरित हुए-‘हे गंगे ! जो कलयुग के पाप यज्ञ, दान, तप तथा ज्ञान से समाप्त नहीं  होते, वे तुम्हारे जल की धारा के दर्शन मात्र से खत्म हो जाते हैं। भगीरथ उद्यम से स्वर्ग से मृत्युलोक में पधारी देवनदी गंगा आध्यात्मिक रुप से जितनी पवित्र, निर्मल ,स्वच्छ तथा पतितपावनी है, ऋषि-मुनियों ने भौतिक रुप से भी गंगा को उतना ही पवित्र, निर्मल तथा स्वच्छ रखने का कर्तव्य-निर्देश दिया है।

आज गंगा में प्रदूषण के प्रादुर्भाव का मूल वजह मानव की भोगवादी प्रवृत्ति है। तुच्छ स्वार्थ हेतु धन कमाने की होड़ में मनुष्य गंगा की नैसर्गिक धारा में औद्योगिक संस्थानों का दूषित (द्रव्य तथा नगरों से दूषित नाले गिरा ) जल गिरा रहे हैं। हम इसी भांति गंगा का उदर अवशिष्ट से भरते रहें तो परिणाम कल्पनातीत होगा।          

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