भगवान गणेश देवो के देव माने जाते हैं, मान्यता है कि कोई भी पूजा अर्चना तब तक फलित नहीं होती, जब तक गणेश जी की अराधना ना हो। ऐसे में किसी भी पूजन कार्य और अनुष्ठान की शुरूवात गणेश जी की पूजा-वंदना के साथ ही होती है और जोकि विशेष फलदायी मानी जाती है। खासकर गणेश महोत्सव के दौरान तो गणेश पूजा का खास महत्व होता है, भक्तजन अपने घरों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करते हैं और पूरे विधि-विधान से 10 दिनों तक पूजा करते हैं और फिर ग्यारहवें दिन मूर्ति विसर्जन करते हैं। गणेश पूजा के दौरान भोग का विशेष महत्व होता है, जैसा कि गणेश जी को मोदक प्रिय है, तो उन्हें मोदक के भोग लगाए जाते हैं।

वैसे ये तो सभी भक्तजन जानते हैं, गणेश जी को मोदक क्यों पसंद है, पर ऐसा क्यों है ये बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको इसी बारे में बताने जा रहे हैं गणेश जी को मोदक क्यों प्रिय है। दरअसल, इसके पीछे कई सारी पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं… तो चलिए जानते हैं ऐसे ही कुछ प्रसंग के बारे में…

पहली कथा

इसके पीछे जो सबसे प्रचलित मान्यता है, वो ये कि एक बारपरशुराम से युद्ध के दौरान गणेश जी का दांत टूट गया था। जिसके कारण उनके दांत में काफी तेज दर्द उठा और ऐसे में उनके लिए खासतौर पर ऐसा व्यंजन तैयार किया गया, जिसे खाने में कोई दिक्कत ना हो और वो था मोदक। मोदक खाने में जितने स्वादिष्ट होते हैं उतने ही नर्म और मुलायम भी, ऐसे में भगवान गणेश को ये मोदक काफी पसंद आए और तभी से ये उनके प्रिय हो गएं।

 

दूसरी कथा

दूसरी कथा ये है कि एक बार पार्वती जी ने विशेष लड्डू यानी मोदक बनाएं और अपने दोनों पुत्रों कार्तिकेय और गणेश जी से कहा कि जो भी अपने ज्ञान, बुद्धिमत्ता और शक्ति का परिचय देगा, वो ही इन मोदक का असली हकदार होगा। ऐसे में कार्तिकेय अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करने निकल पड़ें, वहीं गणेश जी ने अपने माता-पिता शिव-पार्वती की परिक्रमा कर ये तर्क दिया उनके लिए उनके माता-पिता ही सारा संसार है। ऐसे में गणेश जी के इस तर्क से शिव जी और मां पार्वती काफी खुश हुएं और उन्हें तीनों लोकों में ज्ञान, विज्ञान और कला में सबसे निपुण होने का आशीर्वाद दिया। इसके साथ ही देवी पार्वती के हाथों बनाए गए मोदक भी गणेश जी के हो गए और तभी से उनके प्रिय भोग में मोदक शामिल हो गया।

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