क्या बीता हुआ कल, आज पर इस तरह से भी हावी हो सकता है कि आज का सच और समर्पण सब बेकार साबित हो जाए? तो फिर क्या ज़रूरी है कि सच बोलने या ट्रांसपैरेंसी के नाम पर अपने पार्टनर को कुछ भी बताया जाए, लेकिन क्या इतने नज़दीकी संबंधों में कुछ छिपाना भी सही होगा? आज ये सवाल अपने लिए कई रूपों में जवाब की तलाश करता मिल जाता है। हालांकि आज की पीढ़ी अपने को पुरानी पीढ़ी के मुकाबले काफी लिबरल बताती है और ऐसा ज़ाहिर करती है कि अपने पार्टनर का पास्ट उनके प्रैजेंट पर कोई असर नहीं डालता, आजकल तो सभी के पास्ट रिलेशनशिप होते हैं, वगैरह। लेकिन, जैसे ही ये बात उनके अपने रिश्ते में निकल आती है तो कइयों का व्यवहार बदल जाता है। वे अपने पार्टनर के प्रति एक तरह का शक महसूस करने लगते हैं और शक किसी भी रिश्ते को खोखला करने वाली दीमक का नाम है।
आसान नहीं होता कमिटेड होना
ये बात सही है कि प्यार, विश्वास और प्रतिबद्धता हर रिश्ते की बुनियाद होते हैं। रिश्ता अगर शादी या अफेयर जैसा नाज़ुक हो तो इसका महत्त्व बहुत बढ़ जाता है और इसकी जि़म्मेदारी बनती है इस रिश्ते के दोनों साझेदारों की। पहली बात तो ये कि आज की पीढ़ी किसी भी तरह के कमिटमेंट से जहां तक हो सके, बचने की ही कोशिश करती है। आज में जीना और आज के लिए जीना ही उनकी फस्र्ट प्रियोरिटी होता है, लेकिन इसके साथ ही ये भी सच है कि अगर वह किसी भी संबंध में कमिटिड होती है तो उसे निभाती भी है। इस सब के बावजूद हमारे रूढि़वादी समाज का असर उन पर और उनके व्यवहार पर गाहेब गाहे नज़र आ ही जाता है।
प्रैक्टिकल लाइफ की आइडियोलॉजी
अगर हम हाल ही में हुई एक रिसर्च को सही मानें तो उसके अनुसार आज का$फी रिश्ते इसलिए टूटते हैं, क्योंकि कंप्लीट ट्रांसपैरेंसी की बात कहने के बावजूद लोग अपने पार्टनर के पास्ट को भुला नहीं पाते। अपने-आप को दूसरों से अलग बताकर वे अपने पार्टनर के बारे में जानना तो सब-कुछ चाहते हैं, लेकिन जान लेने के बाद उसे पचा लेना उन्हें मुश्किल लगने लगता है। अतीत में हुआ कोई अफेयर उन्हें वर्तमान में भी प्रभावित करने लगता है। पार्टनर के पहले बने वे संबंध अगर देह की सीमा से भी आगे निकल गए हों, तब तो इस मौजूदा रिश्ते की बुनियाद भी हिलनी ही हिलनी तय है। आधुनिकता, लिबरल सोच, ट्रांसपैरेंसी, प्रैजेंट में जीने की बातें, सब धरी की धरी रह जाती हैं और इस जेनरेशन के भी ज़्यादातर लोग वैसा ही रूढि़वादी व्यवहार करने लगते हैं, जैसा हमेशा से होता आया है। नतीजा इस रूप में सामने आता है कि अतीत वर्तमान पर हावी हो जाता है। ट्स्ट और ट्रांसपैरेंसी की बातें हवा हो जाती हैं और बात बे बात शक करना, कमेंट करना या फिर लड़ाई-झगड़े करना आए दिन की सच्चाई बन जाती है। सो बहुत ज़रूरी होता है कि इस बारे में कोई भी बात कहने से पहले दिल की भी सुनें और दिमाग की भी।
रिश्ते की मिठास बनाए रखने में बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं ये टिप्स-
- सबसे पहली बात तो ये कि प्रैजेंट में आपका व्यवहार अपने पार्टनर के लिए कैसा है। आप उसका कितना ख्याल रखते हैं, उसके साथ आपकी रिलेशनशिप कैसी है, कम्यूनिकेशन कैसा है, केयर कितनी है, ट्रांसपैरेंसी कैसी है, इन सब के आधार पर बहुत-कुछ तय होता है।
- हमेशा अपने साथी की भावनाओं का ख्याल रखें और उससे संवाद बनाए रखें।
- ये बात सुनने में अजीब लग सकती है, लेकिन अपने पार्टनर को अपना पास्ट बताने या खुद पास्ट में जीते रहने से कोई फायदा नहीं होता। जो बीत चुका है, उसे बीता हुआ मान लें। पूरा फोकस प्रैजेंट और फ्यूचर पर रखें।
- आप अपने साथी के नेचर को बेहतर तरीके से जानती हैं। उसी के अनुसार तय कीजिए कि आपको क्या कहना है, क्या नहीं। कई बार बहुत उदारवादी सोच दिखाने वाले लोग भी अंदर से बहुत रूढि़वादी हो सकते हैं। इनके साथ समस्या तब आती है, जब वे अतीत के आधार पर ही वर्तमान का आकलन करना भी शुरू कर देते हैं।
- लव सेक्स से बहुत ज़्यादा दूर रहने वाला विषय नहीं है। फिर भी हमारे समाज की ये विडंबना है कि लोग अतीत में बने अफेयर तक के प्रति बहुत उदारवादी सोच नहीं रखते। बात अगर फिजि़कल रिलेशन तक पहुंची हुई हो तो मेरी सलाह तो यही है कि इस बारे में कोई बात ही न की जाए, क्योंकि उतनी उदारवादी सोच अभी भी हमारे भारतीय रिश्तों में देखने में नहीं आती।
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