सहसा कुछ सोचकर उसने मूर्ति उसी स्थान पर रख दी। गहने भी उसी स्थान पर चरणों में डाल दिए। फिर झट उसने प्रभु यीशु मसीह की मूर्ति उठा ली। यदि वह पहेली की तह में पहुंच सकती है तो इसी मूर्ति के द्वारा। यह मूर्ति बाबा ने बनाकर फादर जोजफ को भेंट की थी। वह बता सकते हैं कि उन्होंने यह मूर्ति किसे दी थी? कब दी थी? क्यों दी? किन अवस्थाओं में दी?

शमा को जलता छोड़कर वह सीढ़ियां चढ़ती बड़े कमरे में पहुंची तो सूर्य की किरण उड़ती गर्द में कम होकर लाली में परिवर्तित हो चुकी थी। तेज पगों से वह बाहर निकली तो सूर्य अपने विश्रामगृह का द्वार खटखटा रहा था। कार ड्राइवर ने उसे देखा, आश्चर्य से परंतु कुछ पूछने का साहस नहीं कर सका। उसने पिछला गेट खोला तो वह उसमें बैठती हुई बोली‒ ‘बेलापुर चलो…’

 ‘बेलापुर।’ ड्राइवर ने आश्चर्य से समय का अनुमान लगाने के साथ अंदर बैठते हुए पूछा।

 ‘हां‒ ज़रा जल्दी चलो‒’ राधा ने अधीरता से कहा और गर्दन घुमाकर हवेली को देखा। डूबते सूर्य की लालिमा में रंगी होने के पश्चात् भी दीवारों के होंठों पर अपनी जीत की एक मुस्कान थी। शायद इस हवेली के सारे पाप धुल चुके थे, पापों का प्रायश्चित हो चुका था और शायद अब यहां एक नया जीवन उत्पन्न होने को बेकरार हो रहा था, शायद इसीलिए रामगढ़ इलाके पर से यहां की कुचली हुई आत्माओं को उनका मार्ग मिल चुका है। और शायद इसीलिए रामगढ़ का निर्माण अब एक नए सिरे से होने वाला है, जिसका नाम है पटेल नगर‒सरदार वल्लभ भाई पटेल नगर। जिसे बनाने के लिए वह व्यक्ति आया था जिसकी मां ने सर्वनाश किया है।

 जब कार गर्द उड़ाती हुई रामगढ़ से बाहर जाने वाले रास्ते पर भागने लगी तो राधा ने देखा, मज़दूर अपना-अपना काम समाप्त करने के बाद अलाव जलाकर खाना बनाने में व्यस्त हैं। कुछेक अपने छोटे से संसार में भी ख़ुश होकर शोर मचा रहे हैं, लोकगीत गा रहे हैं। उनकी आवाज़ ढोल की ताल तथा घंटी की टन-टन के साथ उसके कानों में बहुत दूर तक आती रही और वह इस आवाज़ पर कान धरे बहुत ख़ामोशी के साथ अपने बीते हुए युग को चलती-फिरती तस्वीर के रूप में देखती रही, जो उसने रामगढ़ गांव में आज से लगभग बाईस वर्ष पहले बिताया था।

बेलापुर से दो मील से अधिक पहले जब मिशन अस्पताल के लिए राधा की कार गुज़री तो बरगद का एक विशाल वृक्ष देखकर उसे कुछ याद आ गया। यहां इसी पेड़ के समीप वह एक रात गधे की पीठ से लुढ़ककर नीचे कीचड़ में लथपथ हो गई थी। यद्यपि रात का अंधकार पूर्णतया छाया हुआ था, सूर्य को डूबे हुए भी देर हो चुकी थी, फिर भी वह इस विशाल वृक्ष को एक ही दृष्टि में पहचान गई, पहचान इसलिए गई क्योंकि इसके दो मोटे तने एक-दूसरे से लिपटकर ही जड़ से आरंभ हुए थे।

इस समय अंधकार इसकी जड़ों तक पहुंचने में इसलिए असमर्थ था क्योंकि सामने के मंदिर से निकलता प्रकाश इस पर छाया हुआ था। वृक्ष की जड़ों में सीमेंट का एक पतला तथा लगभग डेढ़ फुट ऊंचा चबूतरा बना हुआ था। बाईस वर्ष पहले तो यह वहां पर था नहीं। यहां काफी भीड़ थी इसलिए ड्राइवर ने कार की गति धीमी कर दी थी। सहसा दूसरी ओर जब घंटे बजे तो उसने वृक्ष पर से दृष्टि हटाकर आवाज़ की ओर फेंक दी। तभी उसने कार रोकने की आज्ञा दी।

उसके दिल में अगणित विचार उठने लगे, ऐसे विचार जिनका कोई सिर था न पैर, फिर भी इनका उठना प्राकृतिक था। यहां…यहां तो सुअरों की खोलियां थीं, सुअरों का बाड़ा था, जहां एक दिन उसने कीचड़ में कमल को जन्म देते समय जीवन की आशा खो दी थी। इसी स्थान पर से तो फादर जोजफ उसे उठाकर अपने अस्पताल ले गए थे। इस स्थान को वह भला भूल सकती है? बरगद के विशाल वृक्ष के सामने ही तो वह स्थान था। फिर यहां यह मंदिर किसने बनवा दिया? किस कदर सुंदर बड़ा! संगमरमर की दीवारों पर तो आंख ही नहीं टिकती।

वह कार से नीचे उतरी। आगे बढ़कर मंदिर के द्वार पर खड़ी हो गई तो उसने चुनी हुई प्लेट पर पढ़ा। मंदिर को बनवाने वाली राधा देवी थीं। राधा देवी! राधा भगवान कृष्ण की ही है। बाहर फूलों की टाल लगी थी। जब दुकानदार ने उसे विचित्र दृष्टि से देखा तो उसने झट अपने पैरों से चप्पल उतारी और अंदर प्रवेश कर गई। एक बड़े से हॉल के अंदर सामने ही भगवान कृष्ण राधाजी के साथ होंठों से मुरली लगाए खड़े थे। राधा ने श्रद्धा से हाथ जोड़कर सिर झुका दिया, परंतु मन को संतोष नहीं मिला तो दीवारों पर चारों ओर आश्चर्य से देखते हुए एक बूढ़े पुजारी की ओर बढ़ गई।

 ‘पुजारी जी!’ उसने पूछा‒ ‘यह मंदिर किसने बनवाया है?’

 ‘राधा देवी ने बहन।’

 ‘राधा देवी ने?’

 ‘हां!’

 ‘कौन राधा देवी हैं यह?’

 ‘राजा विजयभान सिंह की कोई निकट संबंधी हैं।’ पुजारी ने उसे आश्चर्य से देखकर उत्तर दिया, ‘महाराज का कहना है कि उनके सुपुत्र ने इस धरती पर जन्म लिया था, इसलिए उन्होंने इसे मंदिर बनवा दिया।’ 

राधा सन्न रह गई। ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसके शरीर का सारा रक्त अंदर-ही-अंदर जमकर बर्फ की सिल बन गया है। कोई पुजारी अपनी देवी को भी इतना महत्त्व नहीं देता जो विजयभान सिंह ने उसे दिया है। इतना बड़ा सम्मान, इतना बड़ा आदर। उसका दिल बुरी तरह तड़प उठा। जी चाहा वह वहीं पर फूट-फूटकर रो पड़े। वह तो इस योग्य ज़रा भी नहीं है। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा नहीं होना चाहिए। वह इस योग्य नहीं है। उसकी घृणा का इतना बड़ा फल है तो उनके प्यार का फल क्या होता।

काश! उसने एक पल के लिए भी उनसे प्यार किया होता। काश! उसकी सिसकियां उभर आईं। तभी मंदिर के घंटे बजे तो उसे प्रतीत हुआ मानो राजा विजयभान सिंह तड़प-तड़पकर चीख़ रहे हैं, दर्द से पुकार रहे हैं, उसका नाम लेकर कह रहे हैं‒राधा मुझे क्षमा कर दो…राधा मुझे अपना लो। और वह इस तड़पती चीख़ को सहन नहीं कर सकी तो उसने झट अपने कानों में अंगुलियां डाल लीं। उसका शरीर कांप उठा। दिल पुकार उठा, क्षमा तो उसे मांगनी चाहिए, राजा विजयभान सिंह से, जिन्होंने आकाश का तारा होकर भी खाक की पूजा की। पुजारी उसे आश्चर्य से देखने लगा तो वह अपनी कार की ओर भागी। गेट खोलकर अंदर बैठती हुई बोली, ‘मिशन अस्पताल चलो‒जल्दी।’

और ड्राइवर ने कुंजी लगाकर गाड़ी स्टार्ट कर दी। एक्सिलेटर पर पैर दबाया तो गाड़ी अपनी गति में आने से पहले ही मिशन अस्पताल के सामने खड़ी थी।

गेट खोलकर वह बाहर निकली तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह किसी और अस्पताल चली आई है। एक निगाह उठाकर उसने चारों ओर देखा। अस्पताल पहले से काफी साफ़-सुथरा और बड़ा था। जो ऊंची इमारत पीछे के भाग में थी वह भी अब अस्पताल का ही एक भाग है। अस्पताल के अंदर पहुंचते-पहुंचते उसे कुछ याद आया। लपककर वह वापस आई। हाथ डालकर कार के पीछे से उसने प्रभु यीशु मसीह की मूर्ति निकाली और हांफती हुई फिर अस्पताल के अंदर पहुंच गई। वह इधर-उधर देख ही रही थी कि अचानक उसे एक नर्स मिल गई।

 ‘नर्स!’ उसने समीप पहुंचकर उससे पूछा, ‘यहां फादर जोजफ कहां मिलेंगे?’

 ‘वह तो रिटायर हो गए।’

 ‘रिटायर हो गए?’

 ‘हां-हां!’ नर्स बोली, ‘कल सुबह के जहाज से वह अपने देश वापस जा रहे हैं।’

 ‘कल सुबह के जहाज से!’ राधा को आशा की एक किरण दिखाई पड़ी, ‘इस समय वह कहां मिल सकते हैं?’

 ‘इस समय तो वह फादर फ्रांसिस के बंगले पर हैं। आज उनका ‘फेयरवेल डिनर’ जो है। ‘फेयरवेल पार्टी’ तो शाम को यहीं पर थी। यदि आप शाम को आ जातीं तो यहीं भेंट हो जाती।’

 ‘फादर फ्रांसिस के बंगले पर।’ राधा ने झट याद करने का प्रयत्न किया। फादर फ्रांसिस की कृपा को भी वह कभी नहीं भुला सकती थी, ‘क्या फादर फ्रांसिस वही तो नहीं जो पहले दिल्ली में इसी मिशन के इंचार्ज थे?’

 ‘यह तो आप बहुत पुरानी बातें कर रही हैं?’ नर्स ने कहा, ‘अब तो वह यहां का काम संभाल रहे हैं।’

 ‘यहां का?’ राधा का दिल प्रसन्नता से उछल पड़ा‒ ‘क्या वह यहीं जनसेवा कर रहे हैं? क्या उनका बंगला यहीं पर है‒जहां आज फादर जोजफ का फेयरवेल डिनर हो रहा है?’

 ‘जी हां…’ नर्स अब उसकी बातों से उकता चली थी। उसने अपनी कलाई घुमाकर घड़ी देखी तो राधा को समझते देर नहीं लगी कि उसे कहीं जाना है। जाते-जाते वह आज्ञा चाहती हुई बोली, ‘अच्छा! मुझे क्षमा कीजिए। यदि आपको फादर जोजफ से मिलना है तो आप उनके पुराने बंगले पर चली जाइए। जहां आजकल फादर फ्रांसिस रह रहे हैं।’

 राधा को भी जल्दी थी। मूर्ति लिए वह अस्पताल से बाहर निकली और कार में आकर बैठ गई।

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