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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

सभा का समापन होते-होते नज्म फिर से बज उठी थी। आवाज दूर तक जा रही थी और यह जनता के दिलों-दिमाग में गहराई से उतर रही थी।

‘हम देखेंगे, हम देखेंगे… लाजिम है के हम भी देखेंगे… वो दिन के जिसका वादा है, हम देखेंगे…’ महिलाएं इस खास तरह की धुन और संगीत के साथ गा रही थीं और मौजूद लोग स्वर लहरियों में डूब गए थे। हालत ये थी कि गीत-संगीत ने सामाजिक संघर्ष और ज्ञान का विस्तार लोक तक कर दिया था। महिलाओं का नेतृत्व हाजिर जवाब तो था ही, इनके इरादों में हौंसला था। खौफ के सामने डेमोक्रेटिक तौर-तरीके और अरमान अपनी जगह बना रहे थे। सामने उम्रदराज औरतों के चेहरे थे जो भाषण पर टकटकी लगाए हुई थीं। युवाओं जैसा जोश था उनमें। फिर गोल दायरे में खड़े युवा चेहरे दिखाई दिए, जन समूह के इरादों से वह खुद सनसनाहट से सराबोर हो गई थी। थोड़ी देर में ही उसके मन में कई तरह की यादें और चित्र घूमने लगे।

सुलताना मंच पर थीं। उसने मोहसिना खान की तरफ देखा जो जोहर बाग के इस प्रोटेस्ट अभियान की मुखिया थीं। नजरों-नजरों में दोनों ने एक दूसरे को समझा। मोहसिना खान की उम्र 85 साल थीं और ये कॉलेज की रिटायर्ड प्रोफेसर थीं। सुलताना इनकी स्टूडेंट रही थीं। लेकिन यहाँ की पहचान आंदोलन से थी जिसमें किसी तरह की नातेदारी और निकटता का कोई सवाल ही नहीं था। सुलताना वकील थीं और महिलाओं और मजलूमों के अधिकारों के लिए कानूनी मदद का अभियान चलाती थी… यह कॉलेज के छात्र-छात्राओं को एक जागरूक नागरिक बनाने के लिए साल में दो बार कैंप लगाती थीं जिसमें जाने-माने नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और वकील हिस्सा लेते थे। उसने शक्रिया अदा करने के अंदाज में बात शरू की।

हमारी दोस्त प्रज्ञा ने बहुत अच्छी तरह फरमाया कि रूलिंग क्लास की नीयत में खोट है और बहुत बड़ा खोट है। लेकिन हम संविधान में लिखे हमारे हक हासिल किए बिना पीछे नहीं जाएंगे, यह मसला कानून से जुडा जरूर है मगर इसे जन जागरूकता का मुद्दा बनाना ज्यादा जरूरी है। उनका इरादा रुवीकरण है पर हमारा इरादा हमारे हक हैं। उनका मकसद सामुदायिक टकराव है तो हम मोहबत की खेती करना चाहते हैं। आपका शुक्रिया। आप आए और जमहूरियत के सवालों पर नेक इरादे जाहिर किए।’

जन समूह में कुछ शोर-शराबा और सनसनाहट बढ़ी तो लोगों का ध्यान मंच पर गया। सुलताना ने बात को आगे बढ़ाते हुए देश के वर्तमान हालातों और जन भावनाओं को उकेरते हुए पृष्ठभूमि पर बात रखी। ‘आप सभी जानते तो हैं कि आज हमारे धरने का 50वां दिन है ओर इसमें जिस तरह की ऊर्जा शुरूआत के दिनों में थी आज भी वैसी ही है। हम पर रोज कोई न कोई नया आरोप लगाया जाता है लेकिन हमें मालूम है कि ये आरोप क्यों लगाये जा रहे है? ये सुन लें, जितना इस देश की मिट्टी पर ये अपना हक मानते हैं हमारा इससे जरा भी कम नहीं। यहाँ अब ये सवाल होना चाहिए कि देश को कौन बांट रहा है? जिस दिन से ताज पहना है कुछ न कुछ ऐसे काम ही जियादे किए हैं और सोशल टेंशन में इजाफा ही हुआ है। लोग सड़कों पे भी आए हैं। असल मसिद करोडों साधन विहीन लोगों और गरीब जनता को दोयम दर्जे का सिटीजन बनाना है, ये कारनामा गैरवाजिब है और हम एक रहने के लिए अंत तक लड़ेंगे।’

उसके मन में फिर एक चित्र उभरा। सभा के बीच से ‘संविधान बचाओ!’ और ‘महिलाओं का संघर्ष जिंदाबाद’ के नारों में आकाश को छूने की हिम्मत स्पष्ट दिख रही थी। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या! संविधान की प्रस्तावना का गायन करने के लिए महिलाओं का दल जोशीली धुन में इसे गा-गा कर सुना रहा था। सभा में पिन ड्राप साइलेंस छाई थी। ऐसे लगता था जैसे देश के लिए इससे बेहतरीन धुन हो नहीं सकती। लोगों के मन में सवाल थे कि जिस संविधान में इतनी महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं इस पर हमने इतना कम क्यों सोचा? कितनी मुश्किलों के बाद आजादी मिली और आखिर हमारे हाथों में संविधान आया था। इसी दौरान करतल ध्वनि से वक्ता का इस्तकबाल किया गया। ज्यों-ज्यों वे मंच पर जा रही थीं त्यों-त्यों देशभक्ति के खास जुनून ने सबकों अपनी गिरफ्त में ले लिया था।

प्रज्ञा की आयु लगभग 30 साल और जोशीला व्यक्तित्व। युवावस्था में जोश नहीं होगा तो कब होगा। कॉलेज के दौरान छात्र संघ की अध्यक्ष रहीं और बाद में रिसर्च के लिए यूनिवर्सिटी आने पर निरंतर जन सवालों से जुडी रहीं। ऐसा लगता था जैसे ये इन्हीं में रम गयीं। समाज ही नहीं, सरकारी कार्यालयों के व्यवहार में लड़कियों के प्रति समता भाव न होने पर चिंता जाहिर की थी। कई बार इन्हीं सवालों पर धरना भी दिया था। मामला उछलने पर प्रशासन से जवाब-तलबी होती तो दफ्तर का व्यवहार कुछ-कुछ बदलने लगता था। उसके मन में ऐसा राग पैदा हुआ कि वह महिलाओं के मुद्दों पर कड़ापन जाहिर करने लगी। आप किसी दूसरे व्यक्ति के साथ केवल इसलिए दुर्व्यवहार करते हैं कि उसकी शारीरिक पहचान आप जैसी नहीं है। वह आप जैसा सोचती है, वैसा ही काम भी करती है लेकिन आपकी निगाह में वह एक औरत बनकर ही रहती है। यह विचार कहां से आया? समाज और कार्यालयों को इस पर विमर्श की जरूरत है। व्यक्ति के विचार में सार्थक परिवर्तन से ही सामाजिक सोच में रचे-बसे शोषण को रोका जा सकता है।

शुरूआत में देश की आजादी का चित्र खींचा, उन सपनों पर रोशनी डाली जिनको पूरा करने के लिए संविधान बनाया गया था। उस वक्त लाखों लोगों की आंखों में जैसे-जैसे खाब थे इसका चित्र पेश किया। ऐसे खाब जिनमें सामाजिक बराबरी हासिल होनी थी। ऐसे खाब जहां किसी तरह की धार्मिक गैर-बराबरी तो कहीं नहीं थी। ऐसे खाब जिनको पूरा करने में अनेक योजनाओं को तराशा गया था। क्या था हमारे पास उस वक्त, उधार का खाते थे, लेकिन किसान मजदूर कारीगर और कर्मचारी ही नहीं, व्यापारी भी संघर्ष के साथी रहे। यह सबकी आजादी थी. पर अब किसी एक हिस्से के नाम पर मेहनतकश जमात से बेगाना व्यवहार क्यों?’ आगे बढ़ते हुए उसने कहा-

‘देखिए, मैं समाज के एक बड़े हिस्से की आवाज के रूप में आपके बीच आई हूं और यह संदेश लाई हूं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करने वाला संपूर्ण समाज आपके साथ खडा है। यह सही है कि देश की सरकारों ने जान बूझकर इस समाज को गरीब बनाकर रखा है, लेकिन संविध न में लिखे हकों को हम एक दिन जरूर हासिल करेंगे। जो हमारे वाजिब हक किसी वजह से छट गए हैं. सामाजिक एकता के बल पर उन्हें भी हासिल किया जाएगा। सामाजिक लोकतंत्र अभी कोसों दूर खड़ा हमें चिढ़ा रहा है, पर उधर की कोशिश है यह नजदीक न आ पाए। हम जिसे जी जान से चाहते हैं उधर वाले हर रोज इसकी घज्जियां उडाकर जनता पर हंस रहे हैं।’

मैं सैल्यूट करती हूं माताओं, बहनों को! जिन्हें अपनी जिंदगी की नहीं, आने वाली पीढियों की फिक्र है। आपका बलिदान एकता के नाम है। आप तो जानते ही हैं कि दस साल पहले बड़ी होशियारी से एक नया मॉडल, विकास का चमकीला फार्मूला जनता की आंखों में बसाया गया, हलक में उतारा गया, मीडिया से सांठ-गांठ की और दिन-रात गीत गाए गए। बताया गया कि महंगाई पर काब करना है तो देश को इसे अपनाना होगा. रोजगार बढ़ाने हैं या व्यापार, इसे अपनाना होगा, सबको शिक्षा देनी है तो यही कारगर होगा, देश को सुरक्षित करना है तो दुश्मनों की आंख में आंख डालकर देखने वाले नेता को देश सौंपना होगा। सबने देख लिया है! और देखेंगे। सामाजिक दूरियां क्यों बढ़ रही है। पब्लिक सेक्टर क्यों बिक रहा है, पब्लिक यूनिवर्सिटीज की फीस क्यों बढ़ रही हैं, गरी युवा तो पढ़ नहीं सकते, फिर इनमें पढ़ेगा कौन?…। युवा अनपढ़ रहेगा तो विश्व गुरू बनेगा कौन? देश की मिली-जुली तहजीब को कोई मिटा नहीं सका, पर यह अभियान कब तक चलेगा? हम रोज देख रहे हैं कि जनता रोजी-रोटी के लिए मारी-मारी फिर रही है! सत्ता को चाहे थोड़ा-मोड़ा हासिल हो जाए पर जनता के हाथ में जो है वो भी जाने वाला है। बर्बादी के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा?

आप इतनी ठंड में यहां बैठी हैं, कुछ अपने लिए थोड़े ही मांग रही हैं। सरकारों ने बात नहीं की। ध्यान से देखों और समझो ये क्या बोल रहे हैं क्या कर रहे है? अब तो सबने सुना जय श्रीराम का मुकाबला जय बजरंगबलि से करवाया जा चुका है। पर हैरत है कोई भी नारेबाज हमारा दर्द सुनने तक नहीं आया! हमारी बात इसी देश की बात है। जनता के मन की बात है! यह एक ही खेत की मूली है। चुनाव को धर्मयुद्ध बनाकर जीत लेना क्या लोकतंत्र की निशानी है!… देखिए देश के कोने-कोने में यह आवाज जानी चाहिए कि संविधान है तो हम हैं! यह तो ऐसे नागरिकों के खिलाफ जंग है जिन्होंने इसी भूमि को अपना मादरे वतन माना और दूसरी जगह जाने से मना कर दिया था। आज जो संकट आया है वह धर्म के चोले में आया है और धर्म के उसूलों के खिलाफ आया है।’ मानसिक पटल पर चित्र पर चित्र उभर आए थे।

इससे पहले सांयकाल के पांच बजते-बजते लोगों का जुटना शुरू हो गया था। कोई गीत सुना रहा था तो कोई कविता या कव्वाली। कोई संविधान को छिन्न-भिन्न करने की कोशिशों पर तहरीर पेश करता। बीच-बीच में सांप्रदायिक सौहार्द या आजादी के आंदोलन पर कोई नाटक पेश किया जाता। कार्यक्रम की शुरूआत जहां प्रस्तावना से होती तो अंत में राष्ट्रगान की धुनें बजतीं। देश के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग पहचान के लोग यहां आते, नये-नये सवाल उठाते। आज तो सुबह ही पंजाब से जत्थेदार गुरनाम सिंह के नेतृत्व में लंगर सेवा करने वाले सिख श्रद्वालुओं का जत्था लंगर का जरूरी सामान लेकर यहां पहुंचने वाला था कि पुलिस इनता रास्ता बदल कर दूसरी जगह ले जाने लगी लेकिन जैसे ही इन्हें पुलिस की चालबाजी मालूम हुई इन्होंने अपना ट्रक बीच सड़क में ही रोक दिया और सड़क पर बैठ गए। चंद मिनटों में ही ट्राफिक फड़फड़ाने लगा तो पुलिस की सांसे भी टैफिक की तरह फलने लगीं। बाद में बडी मसक्कत के बाद गप-चप से कुछ सेटल हुआ और ये पांच सौ लोगों के लंगर का सामान लेकर ध रना स्थल पर पहुंचे।

हर रोज की तरह आज की शाम भी हवा में धुआं मिल चुका था। जो हर सांस में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रहा था। बिजली के तारों पर पक्षी कहीं लाइन कतार बैठे थे तो कहीं आस-पास के दरख्तों पर अपने पंख फड़फड़ा रहे थे। कबूतरों के जोड़ों ने भी फ्लाईओवर के नीचे की दरारों में आसरे ढूंढ लिए थे। महानगरों में ये फ्लाईओवर भी चलते-फिरते हजारों लोगों के आश्रय बने हुए थे। ऐसे ही दिन भर हजारों वाहनों की दौड़म-दौड़ को झेलते या इन्हें अपनी सीने से गुजारते-गुजारते कहीं कुछ चौन मिलती थी। इन्हीं के नीचे कहीं-कहीं छोटी-मोटी जगह पर कई कुछ परिवार खाना पका रहे थे। पास में कुछ बच्चे मंडरा रहे थे तो कुछ छोटी-छोटी दुकानों के बाहर खाने का सामान खरीदते लोगों के आगे हाथ पसारे खड़े थे पर लोग इनसे निगाह मिलाए बिना ही आगे बढ़ जाते थे। पर ये बाल भिखारी बाबुओं के पीछे कुछ कदम चलकर निराश होकर मुड़ आते थे। जब कोई इन्हें कुछ सामान या पैसा दे देता तो ये झट से काबू में करके फिर से पहले वाली हालत में आ जाते। इन्हीं फ्लाई ओवर के नीचे जगह-जगह कुत्ते भी भागम-भाग और उछल-कूद में मस्त थे।

स्टेज के दाहिनी तरफ सावित्रीबाई फले और फतिमा शेख लाइब्रेरी थी। यह दिन-रात खुली रहती थी। इसमें सैकड़ों किताबें और पत्रिकाएं थीं। साथ ही तिरंगा हवा में लहलहा रहा था जिस पर बना अशोक चक्र निरंतर ज्ञानशील बनने और अधिकारों के लिए संघर्ष करने का संदेश देश की हवा में फैला रहा था। यहां आए यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले युवा, नागरिक सवालों को संविधान के नजरिये से हल करने पर बहस कर रहे थे। इन्हें सुनने वाले भी इनकी बहस से रोमांचित हो रहे थे, जागरूक हो रहे थे और तरह-तरह के अनुमान लगा रहे थे। कल क्या होगा किसको पता! लेकिन कुछ ऐसा भी है जिसका पता पब्लिक जानती है!

अचानक कुछ लोगों ने सभा पर हमला बोल दिया। बीस पच्चीस लोगों का हुजूम तीन सौ लोगों के बीच घुस कर लाठी चलाने लगा। आवाज बुलंद करने वाली महिलाएं वहीं डटी रहीं। घबराहट और सरसराहट जरूर फैल गई, पर वो अपनी जगह से हिली नहीं। कोई जान-माल की अनहोनी न हो जाए इसके लिए सुलताना ने आगे आकर मोर्चा संभाला। ‘कुछ दहशतगर्द यहां घुसकर हालत बिगाड़ रहे हैं। इनसे भिड़ें न, एक तरफ कर दें,…। इन्हें कुछ कहना है तो पुलिस से कहें। जाहिर है यह हमारा डेमोक्रेटिक राइट है। हमें रियायत नहीं, बराबरी चाहिए।’ कार्यकर्ता आगे बड़े, हिंसा पर उतारू लोगों को रोका, पकड़कर बाहर निकाला, धक्का-मुक्की हुई, बचाव पक्ष के युवाओं को थोड़ी बहुत चोट भी लगी, पर आने वालों का मकसद कामयाब हुआ।

थोड़ी देर में ही बात एक मुंह से दूसरे मुंह होते-होते बाजारों और मोहल्लों तक फैल गई और लोग गली-चौराहों पर इकट्ठा होने लगे। गली के नुक्कड़ पर खड़ा होकर निर्मल मिश्रा जोर-जोर से बोलने लगा था। ‘देखना एक दिन ये हमारे घरों में घुसेंगे, बताओ कैसे सुरक्षित रहोगे, इतनी हिम्मत! मैं पूछता हूं हम लोग इनसे मुकाबला करने से क्यों डरते है? अरे! इनकी क्या औकात जो हमारे भाईयों को धकियाएं, लतियाएं और लाठी उठाकर सामना करें। भाइयों बाहर निकलो, कब तलक यों ही भेड़ बनकर जिंदा रहोगे।

आधे घंटे भर में सैंकड़ों लोगों का जमघट लग गया पर आगे कोई नहीं बढ़ना चाहता था। अधिकतर लोग दुनियादारी को जानते थे तो कुछ नये खिलाड़ी भी थे। जन उत्तेजना तब तक व्यक्तिगत मामला ही बना रहता है जब तक कोई इसमें धर्म या जाति के गर्व का किस्सा फिट न कर दे। अफवाहें तभी आग बनती हैं जब वे किसी मकसद से अनियंत्रित होकर सामाजिक घृण ा का घोल अपने अंदर मिला लेती हैं। उत्तेजित कोई भी समुदाय हो सकता है लेकिन बुद्धिवान लोग इस उत्तेजना से समाज सुधार करने की कोशिश करते हैं तो दुनिया को काबू में करने के सपने देखने वाले और मुकुट सजाने की चाहत पाले हुए लोग इसी उतेजना में समाज को धुआं-धुआं कर देते हैं। आज समाज सेवा का शॉर्टकट इसी तरह के फितूरी और छुटभैय्या बीजों से फूटता है जिसकी शाखाएं समाज को छाया नहीं, जहरीली लपटें देती हैं। कुछ लोग बिन बुलाए मेहमान की तरह इनसे उलझना और कुछ समझाना चाह रहे थे। वे कई मर्तबा गुप-चुप ऐसी कोशिशें कर भी चुके थे। कमेटी ने भी इनकी नेक सलाह पर विचार का आश्वासन दिया था। दूसरों के घर जलाने की सोच खुद के लिए भी आफत के बीज बोया करती है।

‘कौन से दिनों को देखना चाहते हो, देखो!’ मुंह पर कपड़े लपेटे कुछ लोग भगदड़ करने का प्रयास करते हैं। महिलाओं और वहां बैठे लोगों को जगह खाली करने का हुक्म देते हैं। पुलिस भी इनके दाएं-बाएं चक्कर लगा रही थी। उसके कान में कोई मंत्र गूंज रहा था जिसका पालन करना और करवाना ही जैसे उसका एकमात्र फर्ज था। वर्दी पर संकट। पुलिस का काम जन से कम, जन सेवकों की डिक्टेट से अधिक लगता था। वैसे भी पब्लिक सब जानती है, कौन क्या है? लेकिन सेवकों को लगता है जैसे उनसे ज्यादा कोई नहीं जानता। असल यह है कि पब्लिक इतने सालों से देख-देख कर थक चुकी है। सब जान चुकी है कि इन सेवकों के मन में क्या है लेकिन बहुत जल्दी भावुक होकर अपनी सारी कमाई गंवाकर आगे-पीछे दौड़ने लगती है।

आखिर पब्लिक में भी तो धर्म बसा हुआ है। यह भी तो पलक झपकते ही जात से समझौता कर लेती है। देखते ही देखते पब्लिक गच्चा खा जाती है और एक बार के गच्चे का मतलब है पांच साल सिर पीटना। जब दोबारा से ढोल बजते हैं तो साथ ही पब्लिक में भी नाचने-गाने का शौक चर्राने लगता है और यह सोचने-समझने लगती है कि मौके का फायदा उठा लिया जाए और घाट-घाट का पानी पीए लोग फटाफट सरपट दौड़ने लगते है। गोल्डन टाइम। लोग गुलाल उड़ाने लगते हैं और जन सेवक जन धुनों पर थिरकने लगते हैं। थिरके भी क्यों न? मनचाहा जो हो गया! सच है पब्लिक सब जानती है लेकिन आगे की सोचने वाले यह भी जानते है कि पब्लिक का रिमोट बटन कहां है। ये इसी बटन को दबा-दबाकर जनता का कचूमर निकलने के नये-नये नुक्ते आजमाते आये थे। देखते ही देखते अलग-अलग पॉवर के रिमोट जेबों में समा जाते हैं, कुछ शख्स सुरक्षा के नाम पर बड़े बड़े दरवाजों के पीछे तहखानों में चले जाते हैं। पब्लिक यह भी जानती है। वह यह भी जानती है कि उसकी चाल फिक्स करने वाले रिमोट चारों तरफ लगे हैं जो दिखते नहीं हैं केवल काम करते हैं और बाकायदे कुछ रिजल्ट भी देते हैं लेकिन जनता रिमोट के इन शिकंजों को उधेड़कर जब उलगुलान पर उतर आती है तो सत्ता के पास कुछ करने को नहीं, खाली देखने को बचता है। अचानक देखा सभी रिमोट फड़फड़ा रहे थे, पब्लिक की पॉवर असीम है। यही गाड़ी-घोड़ देती है और यही इसे छीन लेती है।

अब अंधेरा बढ़ने लगा था। इस गहरे होते अंधेरे को क्या कोई रोक पायेगा? दिनभर की तपन और भागदौड़ से अब सड़को पर फैली भीड़ भी थके कदमों से प्रिय जनों की तरफ बढ़ती जा रही थी। इस अंधेरी छाया में घर जाने का संतोष चेहरों से पढ़ा जा सकता था। प्रकृति केवल वही नहीं है जो सामने है बल्कि वह भी थी जिसे अभी प्रकट होना है। आसमान में काले-नीले बादल उमड-घमड आये थे। बिजल चमक-धमक और कडक रही थी जिसकी तेज रोशनी किसी की भी आंखें चुंधिया सकती थी। चमचमाहट, गड़गड़ाहट और कड़कड़ाहट सुनकर लोग घरों में दुबकने लगे थे। लेकिन रोज कमाने-खाने वाले अनेक लोग खुली सड़कों पर इसका सामना करने को मजबूर थे। रिक्शे और ई रिक्शे वाले भीगे बदन बाबुओं को मेट्रो स्टेशन पर आ-जा रहे थे। उन्हें इसका अंजादा तो था ही कि प्रकृति का किसी से कोई बैर नहीं, यह तो सबको बराबर देती है। खैर, जब नौबत आएगी तो देखा जाएगा। प्रकृति से रिश्ता टूटा तो खतरे हजार।

इस दुनिया से दूर उसके मन में चल रहा, उमड़-घुमड़ रहा, स्वप्निल यथार्थ ज्यों ही टूटा, अचानक उसका हाथ एफएम रेडियो पर गया, उसे ऑन किया तो यहां वही बज रहा था जो अभी चंद मिनट पहले उसकी मेमोरी में उफान उठाए हुए था… लाजिम है के हम भी देखेंगे… वो दिन के जिसका वादा है, हम देखेंगे…’ कितना सच है जीवन में रंगत पैदा करने में गीत-संगीत की जगह कोई ले नहीं सकता। संगीत की लहरियां लोक और विचार लोक में छाई हुए थीं। अब लोग नहीं, विचार आमने-सामने थे। लोकतंत्र इमारत की दीवार में पैदा होने वाले पीपल के उस अंकुर की तरह है जो धीरे-धीरे दीवार को फोड़कर उपेक्षित और संकीर्ण जगहों से अपनी गर्दन बाहर निकालकर अपने होने का सबूत देता है। हालांकि इसकी गर्दन बार-बार कलम होती है। मगर उसकी जड़ खोदने की लाख कोशिशों के बावजूद इसकी कोपलें फिर से फूटने लगती हैं।

बुद्धगढ़। जैसा नाम वैसा काम। महानगर से लगभग 40 किलोमीटर दूर बसा गांव। अधिकतर लोग किसी न किसी रोजगार से जुड़े हुए थे। खेती की जमीन अधिक नहीं बची थी, पर शहर का फायदा किसी न किसी तरह मिल गया था। गांव से 10 किलोमीटर पहले तक उग आए कंक्रीट के जंगल ने इलाके की जंगलात को हजम कर लिया था। अब इस गति को ठहरा देना किसी के बस में नहीं था। उंचे दाम मिलते और किसान कछ सौदेबाजी के बाद अपनी जमीनों का सौदा कर ही लेते थे। प्रज्ञा अपने गांव में थी। उसे लगा कि पांच-सात साल पहले जो गांव था अब वह धीरे-धीरे बदल चुका था पहले जो सवाल गांव के बुरे माने जाते थे लेकिन अब उन सवालों पर गांव के लोग खुल चुके थे। अब अनेक लड़कियां कॉलेज जाने लगी थीं और जागरूक भी हो गई थीं। महिलाओं का ध्यान नई पीढ़ी की पढ़ाई-लिखाई और जरूरतों की बातचीत पर अधिक रहने लगा था। अबकी बार सरपंच एक महिला चुनी गयी थीं। और वह भी प्रज्ञा की भाभी सुजाता। जो पोस्ट ग्रेजुएट थीं और उसने गांव में सबसे पहले पर्दा प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई थी। तब बड़े-बुड्डों और कुछ महिलाओं की नाराजगी के बावजूद महिलाओं और लड़कियां की आवाज ने गांव में खलबलाहट मचा दी थी। यह गली-सड़ी समाज व्यवस्था के बदलाव की दिशा में पहला बड़ा कदम था। जब सुजाता ने गांव के इस रिवाज के खिलाफ कदम बढ़ाया तो कॉलेज जाने वाली इन्हीं लड़कियों ने इसका खुलकर साथ दिया। देखते ही देखते जातीय बंधनों को दरकिनार करके गांव की महिलाओं का हुजूम खड़ा हो गया जिसके बल पर वे पूरे गांव में रैली निकालने में कामयाब हुई। इसके बिना सामाजिक व्यवस्था द्वारा बिछाए जाल को किसी भी तरह तोड़ पाना बेहद मुश्किल था, लेकिन यह तालीम का ही कमाल था कि उनमें सामाजिक बराबरी का विचार पैदा हआ और उन मान्यताओं के खिलाफ विद्रोह खडा कर दिया जिन्हें मान-सम्मान की प्रतीक माना जाता था। आखिर में जीत हासिल की और यह घटना आज भी सभी के लिए प्रेरणा है।

दोपहर का वक्त हो चला था। अपना घरेलू काम-धंधा निपटाकर कई लोग सरपंच की बैठक में आ चुके थे। बैठक के दो भाग थे एक में अधि कतर पुरूष बैठते थे तो दूसरे में महिलाएं। हालांकि पुरूषों की तरह उनका आना-जाना कम ही रहता था। लेकिन वे आपस में बातचीत करती थीं। महिलाओं की चर्चा में पहले घरेलू मुद्दे ही छाए रहते थे पर अब गांव और देश के मुद्दे भी यहां जगह बना चुके थे। अब महिलाएं भी इस फील्ड में हस्तक्षेप कर रही थीं। प्रज्ञा राजनीतिक चर्चाओं में जुटे बड़े-बुजुर्गों से बात करने के लिए बैठक में चली आई थी। कुर्सी पर बैठते हुए उसने देखा कि बाहर पीपल के पड़े के नीचे दो-तीन टोलियां बैठी ताश खेल रही थीं। ऐसे लगता था जैसे बाहरी दुनिया से उनका संपर्क टूट गया है।

किसी फाइल में कागज तलाश रहे बिजली महकमे से रिटायर्ड अंकल को उसने कहा।

‘अंकल जी आप क्या तलाश रहे है?’

फाइल को एक तरफ रखते हुए उसने कहा, ‘बेटी पटवारी की एक रिपोट थी, ये कागज भी मौपे पे कित खू ज्यां हैं (गुम होना) पता नी। चल मिल ज्यागी, थोड़ी बार में सही। तुम बताओ दिल्ली में के हो रह्या है। अपनी ही बात को आगे करते हुए उसने फिर कहा-

‘एक तो या युनसटी, बेरा नी के करके छोड़ेगी, रोज खबर आवें हैं।’

‘फीस बहोत बढ़ा दी थी, स्टूडेंट हड़ताल थी, पिछले हफ्ते ही खत्म हुई है।’ बात स्पष्ट करते हुए उसने कहा ‘अंकल जी बात ये है के जब से या सरकार आई है ना, सारे देश में हड़ताल पे हड़ताल है, पर कोई बात सुनता तो यो मामला इतना नहीं बढ़ता। पर एक बात तो सबने देख ली के इनको छोडना ठीक नहीं। वैसे भी या लडाई सभी की थी और सभी साथ लड़े भी और जीते भी’

‘हां, इस दुनिया में सारी लड़ाई पॉवर की सै, अर देख या सबनै चलानी बी कोन्या आती। देख सबको मिला जुलाके ही लोग राजी रहें हैं। सुणो सबकी फेर कर ल्यो वा जो ठीक लगे।’

अंकल अपने गांव के सामाजिक मामलों को अच्छी तरह जानते थे और उनका अनुभव भी था। इसी को आगे बढ़ाते हुए बोले- ‘देख आपने गाम में मुसलमान बी हैं। हैं तो आठ घर अर बोट भी कुले तीस। फेर बी इनका ध्यान राखणा म्हारा फर्ज है। गाम राम तो सब का है बेटी, कै हिंदू अर के मुसलमान, जब सबने रहणा साथै है तो आछी तारिया रहो, सबने करके खाणा है।’

‘आप तो ठीक कहो सो पर ये तो दिन रात लगे हैं।’ प्रज्ञा ने कहा।

‘ऐसा लगता है अंकल जी देश का माहौल बिगड़ रहा है। अपने गांव में तो सब ठीक है ना!’

‘देख आपणी तो या दूसरी योजना है। पहले मैं सरपंच था और इब या थारी भाभी। हामने तो यो दिखे है के इब टेम आछा नी रहा, पता नहीं यो पीसा कित जावै है। जो कहवे था कुछ होया बी।’ अंकल ने पूछा

‘या सारी मार गरीबों पर पडेगी. भ्रष्टाचार करने वाले ही कह रहे हैं कि इसे मिटायेंगे, पर गरीब, किसान और मजदूर ये कहां भ्रष्टाचारी हैं! सबसे ज्यादा तो यही भुक्त रहे हैं। उसने उत्तर देने का प्रयास किया।

‘पर यो तो दिन-रात बोलताए र है। करण का कुछ पता नी।’ अच्छा तू बता तेरे वो कॉलेज के इंटरयू का के होया!’

‘ना उसमें मेरा नहीं हुआ… असल में सभी जगह बहुत मारा-मारी है। इससे आगे कुछ और भी है जो जनता को दिखता कम है पर सारे जान चुके हैं’ प्रज्ञा ने जैसे स्पष्टीकरण देते हुए कहा।

उसने बाहर बैठी मंडली के बारे में पूछते हुए कहा- ‘अंकल ये ताशों वाले कुछ छुट्टी भी करें हैं या दिन भर यों ही ताश बजावें हैं, कुछ बात कर लें इनसे भी।’

‘ये तो यूंएं (ऐसे ही) लगे रह हैं।’ उसने उनकी तरफ आवाज लगाकर अंदर आने का इशारा किया पर वे अपने खेल में इतने व्यस्त थे कि उन्होंने ठीक से सुना भी नहीं। और अंकल खाना खाने चले गए।

सच है कि जिंदगी एक खेल है और सभी इस खेल को अपनी-अपनी तरह से खेल रहे हैं। कोई जन जागरूकता के नाम पर इसे खेल रहा है तो कोई इस अभियान में लगा है कि लोग जागरूक ही न हो पाएं। कितने ही लोग जिंदगी को राजनीति के हवाले कर देते है तो बहुतेरे ऐसे मिल जाएंगे तो राजनीति को बुराई कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन जाने-अनजाने देर-सबेर यह सबको प्रभावित करती है। कोई व्यक्ति इसके पास किसी जरूरत के लिए ही आए यह जरूरी नहीं। जब देश के नाम पर सब कुछ यही जमात निर्धारित करती है तो इस पर दबाव बनाया जाए कि वह गैर-बराबरी और विभिन्न तरह के शोषण के खिलाफ स्टैंड ले। लेकिन यह सच है कि राजनीति का खेल जिंदगियों के भविष्य का खेल है।

पंचायत भवन परिसर में महिला मिशन की मीटिंग। देश के सामने मौजूद मुद्दों पर महिलाओं का विचार विमर्श। एक जागरूक व्यक्ति ही जागरूक और तार्किक परिवार, समाज और देश का निर्माण कर सकता है। इस रास्ते पर हमारी चाल अभी बहुत मंद है। इसे बढ़ाने से ही देश आगे बढ़ेगा। सरपंच सुजाता जो गांव की महिला मिशन की भी अध्यक्ष थीं। ने इसकी मीटिंग को कल ही निर्धारित कर दिया था। वैसे भी अब दोपहर के वक्त सभी अपने काम निबटा चुकी थीं। उनमें से अनेक खेतों से वापस आ गई थीं। कुछ घर में रहने वाली भी कुछ फुर्सत में थीं। कॉलेज जाने वाली लड़कियां भी वापस आ गयीं थीं। उनमें आगे बढ़ने और नया जानने का जज्बा था। आज का आकर्षण काफी समय बाद उनके बीच पहुंची बहन प्रज्ञा थी। दो घंटे बाद फिर घर-परिवार के काम शुरू हो जाएंगे। बातचीत का यही सही वक्त था।

पंचायत भवन तालाब किनारे था और तालाब किनारे चारों ओर पेड़ थे। इन पेड़ों पर सैकड़ों की संख्या में पक्षियों ने अपने ठिकाने बनाये हुए थे। किसी ने टहनियों के बीच बहुत खूबसूरती से घोंसले की बुनाई की थी तो किसी ने बुड्डे पेड़ों की खोखरों में आशियाना बना लिया था। इसी चहचहाट के बीच लोग अपने पशुओं को पानी पिलाने तालाब पर ला रहे और बतिया रहे थे। आसपास के खेतों में गेहूं के पौधे लहलहा रहे थे। इस खुशनुमा मौसम में सभा के लिए आना-जाना शुरू हो चुका था। यह मिशन गाँव के सभी विद्यार्थियों के लिए एक पाठशाला यानी मुफ्त का कोचिग सेटर चलाता था जिसकी शरूआत लडकियों के स्कल छोडने को रोकने के इरादे से की गई थी। इसमें पढ़कर अनेक लड़कियां कॉलेज तक जा चुकी थी। आज की इस खास सभा में कोचिंग लेने वाली लड़कियां भी थीं और इन्हें पढ़ाने वाली लडकियां भी। ये पढाई में तो आगे जा रहीं थीं पर आज सामाजिक शिक्षा की भी उतनी ही जरूरत है। सरपंच ने सभी का स्वागत किया और आज के माहौल में सामाजिक शिक्षा और हमारी समझ पर बातचीत होने लगी।

बातचीत की शुरूआत में प्रज्ञा ने घर-परिवार और गांव से बात शुरू की और इसे आगे बढ़ाते हुए देश-दुनिया के सवालों तक चली आई। फिर बात पर बात बढ़ने लगी और चर्चा होने लगी। बातों से निकलते सवालों को फिर से सवाल बनाते हुए ममता कुछ कहना चाहती थी। ममता ग्रेजुएट होने के साथ-साथ गांव में सेल्फ हेल्प ग्रुप के जरिए सामाजिक सहायता कार्यक्रम चलाती थीं। जिससे न केवल महिलाएं आर्थिक रूप से समर्थ हो रही थीं। बल्कि उनके मध्य स्वाभिमान का आना अभी तक के बदलावों में सबसे महत्वपूर्ण था। वह गांव से बाहर हो रहे बदलावों के बीच अपने गांव को देखते हुए कहती है- ‘ये सारे देश में वे धरने-प्रदर्शन क्यों हो रहे है? बात क्या है? सरकार तो कह रही है के हिंदू लोगों को दूसरे देशों से लाकर अपने देश में बसवांगे, या तो कोई गलत बात नहीं। गांव में तो यही चर्चा है। बाकी तुम बताओ।’

नीरजा ने भी ममता की बात का समर्थन करते हुए कहा- ‘टीवी में भी रोज यों ही बतावें हैं।’

‘बात ऐसी है के सरकार जो कर रही है इसमें कुछ को छूट दे रही है और कुछ को नहीं, सरकार ऐसा करना चाहती है तो सबको यह अधिकार दे, धर्म के नाम पर तेरा-मेरी न करे। अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उसने कहा- ‘पहले नंबर तो इसकी जरूरत ही नहीं. पहले यहां वालों को तो दे दें रोजी-रोटी, पढ़ाई-लिखाई, दवाई, मकान, दुकान और जरूरी सामान। दूसरी फिर भी देना चाहते हैं तो सबकों दें रोक-टोक बिना, अब तक भी तो दिया करते, अब ऐसा क्या हुआ! वही लोग! केवल राज करने वाले बदले हैं। तीसरे यदि देश के पास धन है तो स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी खालो, अस्पताल बनाओ, इन कामों में क्यों बर्बाद कर रहे है टेक्स का पैसा, इतनी सी बात है।’

नीरजा ने फिर सवाल करते हुए कहा-‘हिंदुओं को कौन आने देता था पहले, अब या सरकार हिंदू धर्म की तरफ ध्यान दे री है, तो इसमें के गलत है?’

‘आपको कैसे पता चला के हिंदू नहीं आते थे पहले।’ प्रज्ञा ने उससे ही पूछने के लहजे में अपनी बात कही।

‘अरे वो मास्टर बतावे था के सरकार ने यो आछा काम किया है।’ नीरजा ने उतेजना में कहा।

‘अच्छा वो जो प्राइवेट स्कूल में नौकरी करता है। प्रज्ञा ने जानना चाहा।

‘हां, वो तो गाम में कई आदमियों को लिए फिरता है और सारे एक जैसी बात बतावें हैं।’ सरपंच ने बात को खोलते हुए कहा।

‘सुनो सरपंच साब! देखा… यह धर्म और धर्म मानने वालों की आपस की लड़ाई कतई नहीं है। एक बात हम सबने ध्यान रखनी चाहिए के वे भी वेसे ही हैं जैसे हम, कानून की नजर में सभी बराबर हैं। जानना यह जरूरी है कि संविधान में सब बराबर हैं तो जबरदस्ती छोटे-बड़े बनाने की जरूरत ही क्या है? गैर-बराबर को बराबर तो बना सकते हैं लेकिन किसी को गैर-बराबर नहीं बना सकते। यही समझने की बात है। खैर, जब जनता जागती है तभी पॉवर को कुछ समझ में आता है। अत तो सारा दारोमदार इसी बात पर है के जनता इसे धर्म का मामला मानती है या देश चलने का?’ प्रज्ञा ने जैसे नई बात बताते हुए कहा।

‘ये बता अब होगा के?’ सरपंच ने भविष्य की ओर देखते हुए उत्सुकता जगाते हुए प्रश्न किया।

‘लोगों को सड़कों पर आने के लिए कई बार सोचना पड़ता है, काम-धाम छोड़ना आसान नहीं। सरकार को चाहिए के वो लोगों के बारे में सोचे। अपनी बात कहने की आजादी सबको है, धरने-प्रदर्शन तो देश भर में चल ही रहे हैं। यह ऐसा काम है जिसे धर्म की आंखों से नहीं, संविधान की आंखों से देखना जरूरी है। सरकार का विरोध करना देश का विरोध करना नहीं है। लोग हमेशा सरकारों के खिलाफ तो जाते ही हैं और जाते रहेंगे!’ उसने जैसे सभी की समझ का विस्तार करने के एवज में यह कहा।

नीरजा ने अगला सवाल करते हुए कहा-‘जब ये धरना नहीं हटाएंगे तो फिर ये भी शुरू कर देंगे!’

‘आप यह समझने का प्रयास करो कि कानन सबको मानना पडता है। धरना गलत है तो इसे हटाना पुलिस का काम है। कोर्ट का काम है, हमारा नहीं। हम इसे क्यों रोकना चाहते हैं? जब आप और हम इसे करेंगे तो फिर पुलिस क्या करेगी?’

‘फेर के होगा इब? या लड़ाई तो ना छिड़ज्या? सरकार का काम तो सबने एक नजर तें देखणा होवै सै। महिला मिशन में सबसे अधिक उम्र की गंगा ने माथे पर हाथ फेरते हुए चिंता जाहिर की।

प्रज्ञा को महसस हआ कि गांव में अभी बंटवारा करने की अफवाहें तो हैं लेकिन अभी लोग जानना चाहते हैं कि आखिर ये माजरा क्या है? इन्हें केवल हिंदू मुस्लिम की बात ही बताई गई है। असल बात बताना बहुत जरूरी है। ‘ताई, आप सही कह रहो हो! आपने तो देखा ही है समय किसी का हमेशा नहीं रहता, समय बदलता है तो कानून भी बदलते हैं और सबसे बड़ी बात तो ये है के समाज को बांटना खतरनाक खेल है? जब जनता को रोजगार नहीं मिलेगा तो उसे क्या फायदा? उसके बच्चों को सस्ती और अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी तो उसे क्या फायदा? उसका इलाज अच्छी तरह नहीं होगा तो उसे क्या फायदा? क्या लोगों को काम दिए बिना केवल धर्म के नाम पर खुश किया जा सकता है? डेमोक्रेसी में कोई कितने दिन धींगा-मस्ती करेगा। आखिर उसे जनता को हिसाब बताना ही पड़ता है कि टेक्स का पैसा कहां खर्च हुआ? पुलिस को भी कानून और कोर्ट से डर लगता है।’

इस वक्त सुजाता, ममता, नीरजा और गंगा के मन में उथल-पुथल मची हए थी। साथ में बैठी लडकियों के हाव-भाव और भागीदारी से लग रहा था कि वे भी कुछ ऐसा ही कुछ ही सोच रही थीं कि जब जनता ने सरकार को चुना है तो उसका काम लोगों की भलाई करना है या कुछ और? सभी के मन में घूम रहे सवालों को जबान पर लाते हुए गांव की मुखिया सुजाता ने कहा-‘जब लोगों को यों ही खतरा हो जावेगा तो लोकतंत्र आखिरी इंसान तक कैसे जाएगा?’

महिला मिशन में उभरे प्रश्नों के उत्तर देने की कोशिश करते हुए वह समझ रही थी कि मेरे गांव में महिलाएं अब आगे जा रही हैं। ये भी देश, समाज और कानून के सवाल जानने की कोशिश कर रही हैं। जैसे-जैसे यह प्रक्रिया आगे जाएगी समाज का एकतरफा दोतरफा नहीं, चौतरफा विकास होगा और बढ़ता होता जाएगा। उसने अगली पीढ़ी की लड़कियों की ओर मंद-मंद मुस्काते हुए खुशी जाहिर की। फिर उसने सभी प्रश्नों का सम्यक विश्लेषण करते हुए कहा-‘देखो, चुनाव लोकतंत्र का उत्सव हैं। हमारे नेता यह कहते नहीं थकते कि हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, पर लोकतंत्र में हम करते क्या हैं! वोट कैसे लेते हैं! सरकार कैसे बनाते हैं! चुनाव जीतने के लिए किस-किस को खिलाते-पिलाते हैं! तेरे-मेरे नहीं, जाति, धर्म के मामले आगे कर दिए जाते हैं, क्या कभी देश और राज्यों के इलेक्शन जनता के मुद्दों पर होते हैं! अगर हो भी गए तो चुनाव के बाद उन्हें भुला दिया जाता है। राजनीति में झूठ का कारोबार इसलिए सफल है क्योंकि हमारे भी अपने स्वार्थ हैं। पर राजनीति में अच्छे और चरित्रवान लोगों की संभावना हमेशा बनी रहेगी।’

महिला मिशन की बातें लड़कियों पर असर कर रही थीं। उसने अपनी बातों को सवाल के नजरिये से ही कहा- ‘हम सवालों से क्यों बचना चाहते हैं? हम में से कोई भी ऐसा भारत नहीं चाहता जहां लोग अपनी बात न कह पायें, डंडे के बल पर रोके जायें? जहां जनता की बोलने की आजादी पर पहरा लगा दिया जाए? क्या आजादी के लिए लड़ने वालों और संविधान बनाने वालों ने ऐसे भारत का सपना देखा था? इतिहास बताता है कि देश केवल सामाजिक प्रेम और सहयोग से ही मजबूत होता है… पर अपने ही देश में अपने ही लोगों के दिलों में डर क्यों हैं?

लोकतंत्र ने गूगों को भी जबान दी है, जो बोलना भूल गए थे अब अपने हकों के लिए लड रहे हैं। हम खद महिलाएं भी उन्हीं में से हैं। अब इन्हीं भूले हुए लोगों को फिर से बोलना सिखाना है। जनता की सोच में ध र्म-संस्कृति और जात पर गर्व करने के लिए दी जा रही ट्रेनिंग को समझना उतना ही जरूरी है जितना जरूरी शरीर के लिए भोजन। एक दूसरे की पहचान के खिलाफ भड़काने और पगलाने के फार्मूले इसी तंत्र का हिस्सा हैं। हमें इन खाइयों को पाटना है और सामाजिक बराबरी के लिए उलगुलान करना है। यही राह देश की तरक्की की राह बनेगी।’

माहौल ने परिसर और पब्लिक को गिरफ्त में ले लिया था। तालियां बनजे लगी थीं। वहां बच्चों की टोलियां आ चुकी थीं। जिसने सुना वो ऐसी सोच पर फिदा और जिसने नहीं सुना उसे अफसोस। चेतना और जिज्ञासा अपनी दायरे तोड़ चुके थीं। चारों तरफ सवाल घूम रहे थे। सभी ने महसूस किया कि बुद्धगढ़ के उदगार देश के एक-एक गांव के उदगार बनने चाहिए? सामाजिक परंपराओं के नाम पर स्त्रियों के अंदर की शक्ति मुफ्त में ही बर्बाद क्यों हो जाती है? जिंदगी डर में ही क्यों कट जाती है? यह डर कभी घर का होता है तो कभी गांव के माहौल का, तो कभी मर्यादाओं के नाम पर पाखंडों का। पर जैसे ही ज्ञान का दरवाजा खुलता है तो जगह खुद-ब-खुद बनने लगती है। ज्ञान के दरवाजे पर बनाए गए पहाड़ को ढहाने से जन-जन खिल उठेगा। वे कह रही थीं कि सदियों से बसाए गए डर की तह में जाना, लड़ना और मिटाना ही हमारी देशभक्ति है। उनके दिलो-दिमाग और हाव-भाव में परिवर्तन की तरंगें मचल रही थीं। खिले हुए चेहरों को देखकर लगता था मानों ज्ञान हृदय में बस गया हो।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’