suno puniya
suno puniya

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

घाम की चादर आंगन के पूर्वी कोने में सिकुड़ गई थी. पुनिया ने मुंडेर की ओर देखा और अनुमान लगाया सांझ होने में अधिक देर नहीं है। ठंड का असर काफी देर पहले से ही बढ़ने लगा था। रह-रहकर हाथों के रोंगटे खड़े हो जाते थे और बदन कांप उठता था।

पुनिया चाहती थी कि डेलवा (टोकरी) आज ही तैयार हो जाए। ‘थोड़ा-सा ही बचा है सोचकर उसने कुछ कांस खोंसकर सूजा उसमें घोंप दिया और आरण (सरकंडा) से तैयार मूंज फंसाकर आगे बुनना शुरू कर दिया। डेलवा समाप्त कर उसे आंगन बुहारना था, इसीलिए वह जल्दी-जल्दी हाथ चलाने लगी।

‘माई आ जाती तो वही बुहार देती आंगन में गंद मची हुई है। पुनिया ने सोचा, ‘लेकिन हार–पतार काम करती कितना थक जाती है माई भी… घर आते ही खटिया पर ढेर हो जाती है…और मैं सोचती हूं, अगर वही..मैं कितनी मूर्ख हूं.. ।’ सूजा एक जगह अटक गया तो उसे ठीक करने लगी, ‘कितना काम करते हैं माई और बापू..बापू जैसे थककर भी नहीं थकता…ई फसल मा मिसिर महाराज का करज जो उतारना है। उन्हें जस…तस…।’ सूजा उसकी उंगली में चुभ गया। झुंझलाकर पुनिया ने डेलवा एक ओर पटक दिया, कांस समेटे और मूंज से बांधकर नहा पर रख दिया। कुछ देर यों ही बैठी रही, फिर झाडू उठाकर आंगन बुहारने लगी।

आधा आंगन भी न बुहार पाई थी कि ढोल बजने और कुछ लोगों की ‘डिग डिग.डिग डा.डा.डा. की आवाज आई। सजा-झाड थामे वह कछ देर यों ही खड़ी रही, फिर झाडू फेंक बाहर आई और दरवाजे से टिककर खड़ी हो गई।

‘डिग.डिग.डिग…डिगकृडाकृडा…डा…’ की आवाज ढोल के साथ तीव्र से तीव्रतर होती जा रही थी। पुनिया का हृदय जोर-जोर से धड़कने लगा और आंखें सामने गली की ओर टिक गईं। उसे मालूम था-जब भी ढोल बजता है.दीवाली खेलने के लिए पारस उसमें जरूर शामिल होता है। पारस को खेलता देखने के लिए पुनिया की आंखें लालायित रहती हैं। सच यह है कि वह पारस के खेल को कम..पारस को अधिक देखती है। उस क्षण उसके हृदय में एक विचित्र गुदगुदी-सी होती रहती है और अन्य अवसरों की अपेक्षा… जब कभी वह पारस से मिलती है…घर में, खेत में, या किसी बाग में…पारस उसे अधिक अच्छा लगता है। लेकिन महीनों से पारस से मिलना तो दूर, वह उसे देख भी नहीं पाई है।

मैदान में खेल शुरू होने से पहले पारस एक बार उसके घर के सामने से अवश्य गुजरता है, और इस समय भी पुनिया को विश्वास था कि वह उधर से होकर ही मैदान की ओर जाएगा।

पुनिया को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। कंधे पर लाठी रखे, बनियान और लुंगी पहने, पारस गली में आता दिखा उसे। पुनिया ने नज़रें घुमा लीं, जैसे उसने पारस को देखा ही न हो। कनखियों से देख वह तब भी रही थी। पारस ने समझ लिया कि पुनिया जानबूझकर उसे अनदेखा कर रही है। वह मन-ही-मन मुस्कुराया। पुनिया के दरवाजे के सामने आकर उसने खखारा। लेकिन पुनिया ने तब भी उसकी ओर नहीं देखा। पारस एक क्षण के लिए ठिठका और पुनिया के चबूतरे पर लाठी पटक दी।

“ठीक से चलना नहीं आता?” पारस के चेहरे पर नज़रें टिकाकर पुनिया बोली।

“वह मैं तुझसे सीखूगा न अब…।” लाठी चबूतरे पर टेककर पारस बोला।

“पुनिया लजा गई और ड्योढ़ी की ओर देखने लगी।

“आज दीवाली नहीं देखोगी..कांटे की बराबरी होगी घिनुआखेड़ा वालों से।”

“होने दो…मुझे क्या? तुम लोगों को कोई काम-धाम भी है, या…खाए.. अंगड़ाए और लाठियों पर उछलने लगे।” बहुत दिनों बाद पारस से बातें करना अच्छा लग रहा था उसे ।

“बातें मत मार…देखना है तो आ जा…आज के बाद फिर बीर बाबा के मेला के दिन ही खेल होगा…इन्हीं लोगों से…।”

“होने दो मुझे क्या?”

“अरे तेरा वो…रामभरोसे भी तो खेलेगा…।”

“मैंने कहा न-मुझे क्या? मत रुला मुझे यूं… ।” पुनिया रुआंसी हो गई।

“देख..रोना मत…मैं तो तुझे बता रहा था…रामभरोसे भी आया है, और मेलावाले दिन उसी के गुट से होंगे दो-दो हाथ… ।”

“यह तू जान-मुझसे मत बोल ।”

“देखना हो तो आ जा…देर हो रही है…मैं चला… ।” और भरपूर नजर पुनिया पर डाल वह चल पड़ा। पुनिया उसे गली के मोड़ तक देखती रही। फिर चीखकर बोली, “मैं नहीं आऊंगी..नहीं।” और दरवाजा धड़ाम से बंद कर वह आंगन में आ गई और चारपाई पर ढह फूट-फूटकर रोने लगी।


दलपत खेड़ा में लगभग पच्चीस घर अहीरों के हैं…गांव के दक्षिणी कोने में पूरा एक मोहल्ला है ‘अहीरन टोला’ नाम से। एकाध को छोड़ सभी काश्तकार, परिश्रमी और खाते-पीते। पुनिया का घर भी इसी टोला में है… पारस के घर से दूर । टोला के उत्तरी छोर में पुनिया का घर है तो पूर्वी छोर में पारस का। दोनों घरों को एक गली जोड़ती है। जिस मैदान में दीवाली खेली जाती है, वह उत्तरी छोर की ओर पड़ने वाली मुख्य सड़क के किनारे है और वह मख्य सडक गांव को अन्य गांवों से जोड़ती है।

दीवाली खेल ‘अहीरन टोला’ के युवकों का प्रिय खेल है। गांव के दूसरे टोला-ठाकुर टोला…ब्राम्हण टोला–पासी टोला-कोइरी टोला आदि के कुछ युवक भी कभी-कभी दो-चार हाथ आकर खेल लेते हैं. लेकिन केवल मन बहलाव के लिए ही। जो कौशल ‘अहीरन टोला’ के युवकों के हाथ में है, दूसरों में नहीं। और इस टोला के युवकों में भी सर्वाधिक सफाई और कुशलता पारस के खेल में होती है।

पारस दोनों प्रकार की दीवाली खेल लेता है। छ:-सात युवकों के साथ बैठकर छोटे-छोटे डंडों का खेल, जिसमें सभी एक-दूसरे के डंडों में डंडे मारते हुए बैठे-बैठे चक्राकार घूमते रहते हैं और दूसरा लठही दीवाली। इसमें दो युवक एक साथ अत्यंत कुशलता से लाठियों का प्रदर्शन करते हुए त्वरित गति के साथ लाठियां भांजते हैं और लाठियां केवल लाठियों से ही टकराती हैं। इस खेल में पारस अपनी कोई बराबरी नहीं रखता।

पारस है भी बांका जवान। बहुत अच्छी काश्त नहीं उसके पिता के पास, फिर भी उसका परिवार सखी है। दसवीं तक पढकर आर्थिक कारणों से वह आगे नहीं पढ़ सका, और पिता के साथ खेती में हाथ बंटाने लगा। जबसे पारस ने खेती संभालनी शुरू की, उसके घर में खुशहाली लौट आई। तीन वर्ष से वह खेती संभाल रहा है। खेतों की जुताई-बुवाई तक वह काम में इतना खोया रहता है कि उसे अन्य बातों का होश नहीं रहता, लेकिन उससे मुक्त होते ही वह मोहल्ले के युवकों के साथ दीवाली खेलने के अभ्यास में जुट जाता है। उसका मानना है कि इससे शरीर की मांस-पेशियां दुरुस्त रहती हैं।

यह खेल दीवाली के बाद ही शुरू होता है और केवल दलपत खेड़ा में होता हो, ऐसा नहीं है, उसके आस-पास के गांवों में भी खेला जाता है। लेकिन बीर बाबा के मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा के बाद पंचमी के दिन मेला लगता है जिसमें इस खेल का अच्छा प्रदर्शन देखने को मिलता है। दो गांवों के खिलाड़ी प्राण-पण से एक-दूसरे को हराने का प्रयत्न करते हैं और खेल खत्म होने तक अगले वर्ष किस गांव के साथ किस गांव का खेल होगा, तय हो जाता है।

ऐसी किसी प्रतियोगिता में पारस केवल दो वर्ष से ही शामिल हो रहा है और दो वर्ष पहले जब पहली बार वह खेला था..इन्हीं घिनुआखेड़ा वालों के साथ..पुनिया भी अपनी माई और बापू के साथ उसका खेल देख रही थी। पुनिया की आंखें गड़कर रह गई थीं पारस पर, और पारस ने भी खेलते-खेलते देख लिया था कि पुनिया उसे ही देखे जा रही है। खेल खत्म होने के बाद वह सीधा उधर ही आया था और पुनिया के बापू से पूछा था, “कैसा लगा मेरा खेल, बुधई काका?” पूछ वह पुनिया के बापू से रहा था, लेकिन देखता जा रहा था पुनिया की ओर।

पुनिया लजाकर माई की ओट में जा खड़ी हुई थी।

“बहुत अच्छा खेले, बेटा…तुमने तो गांव-टोला का नाम रोशन कर दिया। तू न होत त ई पौना-अद्धा का करि लेत…नाम डुबा देत..धनि भाग महादेव के–जो तू जइसा पूत पैदा कीन्ह… ।” बुधई आसीसने लगे थे पारस को।

पारस खिल उठा था उस दिन। उसने फिर एक बार पुनिया की ओर देखा था…पुनिया कनखियों से उसकी ओर देख रही थी। पारस के अंदर खुशी के बगूले उठने लगे थे। लाठी पर उछलता वह साथियों के बीच जा पहुंचा था। उसने फिर मुड़कर देखा था पुनिया की ओर। पुनिया अभी भी देख रही थी उसी को।

और उसी दिन से दोनों के मध्य एक अनाम रिश्ता पनपने लगा था… जिसे वे समझते तो थे…लेकिन नाम नहीं दे पाए थे। दोनों के मन पवित्र थे। जब तक दिन में कम से कम एक बार एक-दूसरे को देख नहीं लेते, बेचैन रहते थे। यह बेचैनी चुंबक की तरह दोनों को एक-दूसरे की ओर खींचती. ..लेकिन कठोर सामाजिक अनुशासन उनके बीच दीवार बनकर खड़ा हो जाता। वे मिलते, बातें करते, एक-दूसरे को उलाहने देते..फटकारते-मनाते, मिन्नतें करते…किन्त अपने इस रिश्ते को कोई नाम नहीं दे पाते। कह भले ही न पाते वे कुछ लेकिन आंखें स्पष्ट कर देतीं कि ‘तुम कहो या न कहो, हम समझते हैं कि हम दोनों एक-दूसरे को प्यार करते हैं। और उनका प्यार पवित्र था-दूध की भांति।

लेकिन उस दिन मेले में रामभरोसे की नज़र भी पुनिया पर टिकी रही थी, यह किसी ने न देखा था। पुनिया रामभरोसे को भा गई थी। उस दिन वह भी नयी उमंग लेकर अपने गांव घिनुआखेड़ा लौटा था।


घिनुआखेड़ा अहीरों का ही गांव है…एक सौ तीस घरों का छोटा-सा गांव। सभी काश्तकार। परिश्रमी और अपने काम में प्रवीण किसानों का गांव है यह। रामभरोसे का बाप रघुआ के पास पच्चीस बीघे मातवर खेत हैं। खुद का ट्यूबवैल है और करने वाले दस मजबूत हाथ। गांव में वह सबसे अधिक सम्पन्न है। रामभरोसे उसका तीसरा और छोटा लड़का है, कम पढ़ा, लाड़-प्यार में पला-बढ़ा। कुछ-कुछ जिद्दी। पुनिया उसके मन में चढ़ गई तो वह शांत कैसे बैठ सकता था? कुछ दिनों तक वह दलपत खेड़ा के चक्कर काटता रहा..पुनिया से मिलकर अपनी बात कह देने के लिए पुनिया के घर के चक्कर भी लगाए उसने, लेकिन एक दिन भी पुनिया उससे नहीं टकराई।

रामभरोसे ने दसरा उपाय सोचा- वह बाप को मनाएगा। बाप उसकी शादी के लिए परेशान है। उसने बापू के मन के दो रिश्ते वापस कर दिए थे। रामभरोसे ने बापू से अपनी बात कह देना बेहतर समझा। और एक दिन चौपाल में बैठा बापू जब हुक्का गुड़गुड़ा रहा था, पास बैठा रामभरोसे बोला, “बापू, एक बात कहूं?”

रघुआ उसकी ओर देखने लगा।

“दलपत खेड़ा के बुधई काका हैं न..आपकी तो पुरानी यारी…।”

“हां हां-क्या हुआ बुधई को?”

“हुआ कुछ नहीं, बापू।”

“फिर…तू बोलता क्यों नहीं।” हुक्का गुड़गुड़ाना बंद कर रघुआ उसके चेहरे की ओर देखने लगा।

“बापू-ओह की बेटी है…।” रामभरोसे का स्वर कांपने लगा था। सोच रहा था, कहीं बापू बमकने न लगे, “पुनिया नाम है ओहका…।”

“पूरी बात क्यों नहीं बोलता?” रघुआ की त्योरियां चढ़ गईं।

“आप मेरे साथ उसका रिश्ता…।”

“चोप्प साले, मैं जाऊंगा बुधई के यहां रिश्ता मांगने!” हुक्का के नेप मुंह में डालते हुए रघुआ बोला।

रामभरोसे का चेहरा उतर गया।

“पता नहीं तेरे भेजे में का-का घूमता रहता है- सोचा कभी-कहां बुधई और कहां हम..मैं नीचे उतरूंगा, रिश्ता मांगने जाऊंगा, तुझे सोचकर शरम नहीं आई। एक-से-एक ऊंचे खानदान की शादियां तूने लौटा दी… और अब मैं तेरे लिए रिश्ता मांगने जाऊं..!” रघुआ को बोलते-बोलते खांसी आ गई। खांसता रहा वह कुछ देर।

रामभरोसे जमीन पर छोटी-सी लकड़ी से आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचता रहा।

“मैं पूछता हूं, तूने वे रिश्ते क्यों लौटाए…बीस-बीस हजार के रिश्ते..और अब बुधई के पास भेज रहा है मुझे…जहां पांच हजार भी मिलने की उम्मीद नहीं।”

“आप नहीं जानते, मैंने वे रिश्ते क्यों लौटाए थे? दोनों लड़कियां काली-कलूटी…बदसूरत… | दहेज के पीछे मैं उन्हें गले मढ़ लेता..?”

“तो सुन ले कान खोलकर- मैं बुधई के पास नहीं जाऊंगा और तुझे रिश्ता वहीं करना होगा, जहां मैं चाहूंगा।रघुआ फिर नेप मुंह में रख हुक्का गुड़गुड़ाने लगा था। लेकिन वैसा नहीं होने दिया रामभरोसे ने, जैसा रघुआ ने कहा था। उसने काम भी छोड़ दिया उस दिन से, और खाना भी। सुबह होते ही जंगल की ओर निकल जाता और दिन-भर पड़ा रहता किसी पेड़ के नीचे । चार दिन में ही व्याकुल हो उठा था रघुआ। पांचवें दिन उसे ढूंढ़ता जा पहुंचा था जंगल में। रामभरोसे दलपत खेड़ा के बनियों के बाग में आम के एक पेड़ के नीचे लेटा था अंगोछा बिछाए। चेहरा उसका आमचूर हो रहा था और शरीर शिथिल | बापू को देखकर भी वह लेटा रहा…बल्कि करवट लेकर उसने उसकी ओर पीठ कर ली।

“भरोसे!” रघुआ उसके पास लाठी टेक बोला।

रामभरोसे कुछ नहीं बोला, “लेकिन कानों को उसने सक्रिय कर लिया बापू की बात सुनने के लिए।

“का कहना होगा बुधई से कुछ बता तो दे!” रघुआ के स्वर में गिड़गिड़ाहटा-सी उभर आई थी।

“मैं कुछ नहीं जानता।” दबे और भर्राए स्वर में रामभरोसे बोला।

“फिर भी।”

“कहा न..जो मर्जी हो कहिए जाकर ।” और रघुआ की बात आगे सुने बिना वह तेजी से उठा और अंगोछा समेट गांव की ओर चल पड़ा।

रघुआ उसे जाता देखता रहा…फिर हलका-सा मुस्कराया और दलपत खेड़ा की ओर मुड़ गया।


रामभरोसे के साथ पुनिया के रिश्ते में बुधई को आपत्ति ही क्या होनी थी। यह उसके लिए सखद समाचार था। रामभरोसे का बाप स्वयं रिश्ता मांगने आया था..इससे बढ़कर खुशी उसके लिए और क्या हो सकती थी। बड़ी लड़की की शादी कर चुका था। लड़का कोई था नहीं। अब ले-देकर पुनिया ही बची है। वह उसकी शादी के लिए परेशान रहने लगा था। पुनिया के लिए खुद रघुआ रिश्ता मांगने आया तो उसे लग रहा था, जैसे वह स्वप्न देख रहा था।

बुधई को याद आया, जब वह अपनी बड़ी लड़की सोनिया का रिश्ता रघुआ के बड़े लड़के से मांगने गया था, रघुआ ने दो-टूक जवाब दिया था, “बुधई भाई, इस बारे में हम बात न करें तो ही अच्छा होगा…हमारी घरवाली की मांग आप पूरी न करि पइहौ, फिर ई बातें करिकै अपनी पुरानी यारी काहे को… ।”

“हम त यारी को और पक्का करें खातिर आए रहन।”

“न भइया या बात छेड़बै न करौ…लड़कवा की माई कहीं बात पक्की करि रही है…।”

बुधई पर स्पष्ट हो गया था कि रघुआ अपनी पत्नी का बहाना लेकर स्वयं मोटे दहेज के कारण रिश्ता नहीं करना चाहता।

और आज वही रघुआ रामभरोसे के लिए पुनिया को मांगने आया था। रघुआ की संपन्नता के समक्ष वह पुराने घाव को भूल गया और उसने ‘हां’ कर दी। बात पक्की हो गई। बुधई उन दिनों कुछ आर्थिक संकट में था, इसलिए उसने चार फसलें समेटने के बाद शादी करने के लिए रघुआ को तैयार कर लिया।

रघुआ को प्रस्ताव बुरा नहीं लगा। उसने सोचा-इस बीच संभव है, रामभरोसे का मन बदल जाए…तब कुछ और ही सोचा जाएगा…कुटिल मुस्कान फैल गई थी रघुआ के मुखपर ।


अहीरन टोला में यह बात आम चर्चा का विषय बन गई कि रघुआ रामभरोसे के लिए पुनिया का रिश्ता मांगने आया था। औरतें पुनिया के भाग्य की सराहना करने लगीं, “बड़े भाग्य लेकर आई है छोकरी, अच्छे खाते-पीते घर में जाकर राज करेगी। सुना है, रघुआ के घर की औरतें खेत-पात नहीं जातीं। घर के काम तलक के लिए नौकर हैं।”

“बरतन तक नहीं मांजती…नवाबजादियों की तरह रहती हैं..अब का है.. पुनिया की ठसक देखना अब ।” औरतें हार–पतार जाते हुए, खेतों में काम करते हए, आपस में यही चर्चा करती रहतीं।

लेकिन पुनिया चुप थी। माई-बाप ने केवल खबर–भर सुनाई थी। उससे पूछा भी नहीं था कि उसे यह रिश्ता स्वीकार है या नहीं। पूछते क्यों? गांव में जैसा प्रायः होता है…मां-बाप कभी पूछते ही नहीं लड़की से। लड़कियों की भावनाओं का भी कोई मूल्य होता है…वे नहीं जानते। और बुधई ने भी समझ लिया कि उसने पुनिया के लिए जो निश्चत कर दिया, पुनिया इससे खुश ही होगी।

लेकिन पुनिया खुश न थी। वह कुछ और ही सोच रही थी।


उस दिन पुनिया खेत से मटर तोड़कर लौट रही थी। रास्ते में पारस मिल गया।

“पुनिया, एक बात पूछनी थी!” पगडंडी में उसके सामने खड़ा होकर लाठी मेड़ से टेकते हुए पारस बोला।

पुनिया उसकी ओर देखने लगी।

“सुना है, तुम्हारे बापू ने रामभरोसे के साथ… | का यह सच है?”

पुनिया ने पारस के चेहरे पर आंखें गड़ा दीं। उसकी आंखें गीली हो आईं।

“ओह पुनिया!” पारस विचलित हो उठा, “तुम इस रिश्ते से इनकार कर दो…कह दो अपने बापू से… |” पारस ने पुनिया के चेहरे की ओर देखा । आंसू उसके गालों पर लुढ़क आए थे।

पारस ने आगे बढ़कर दायें हाथ से आंसू पोछ दिए।

“पुनिया, तुम नहीं समझ सकती…मैं तुम्हे कितना… ।” पारस का गला भर आया । शब्द अटक गए। कुछ क्षण तक वह पुनिया के चेहरे की ओर देखता रहा, फिर गला साफ करके बोला, “पुनिया, तुम मना कर दो…साफ-साफ कह दो कि …कि तुम क्या चाहती हो।”

“मैं क्या चाह सकती हूँ?” कांपते स्वर में पुनिया बोली।

“तुम-तुम कह दो न कि तुम…।”

दोनों एक-दूसरे की आंखों में देखते रहे, अपलक..शब्द अटक गए थे गले के अंदर।

“मैंने जब से सुना है..मैं कितना परेशान हूं..तुम नहीं समझ सकतीं।” काफी देर बाद पारस बोला।

“तुम..तुम…क्यों.?”

“जानकर भी यह न पूछो, पुनिया, तुम बापू से मना कर दो, बस-फिर हम देख लेंगे।”

“तुम क्या देख लोगे…मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा।”

“सब कुछ समझ में आएगा तुम्हारे..” पारस पुनिया की ओर बढ़ा और उसने कंधे के पास उसे पकड लिया, “तम मना करके तो देखो…फिर…।”

पुनिया ने एक झटके से अपना कंधा छुड़ा लिया और एक कदम पीछे की ओर हट गई। लेकिन मेड़ से नीचे उसका दाहिना पैर फिसल गया… संतुलन बिगड़ने से धोती की कोंछ हाथ से छूट गई और मटर बिखर गई।

पुनिया का चेहरा लाल हो गया। उसने भौंहें चढ़ाकर पारस की ओर देखा और कोंछ में बची शेष मटर भी वहीं गिरा दी और तेजी से जाने लगी। पारस ने लाठी फेंक दी और बैठकर मटर बीनने लगा। उसने पुनिया को रोकना चाहा…आवाज दी…लेकिन वह नहीं रुकी।

पारस नहीं सोच पा रहा था कि पुनिया चाहती क्या है? उसे अपने ऊपर भी खीझ हो रही थी। वह क्यों नहीं बात स्पष्ट कर देता। अगर पुनिया को उससे प्यार है तो स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन कहे कैसे…वह चाहता तो है कहना-लेकिन…|

वह उस दिन शाम को पुनिया के घर गया यह निर्णय करके कि एकांत पाते ही वह अपनी बात पुनिया से कह देगा। लेकिन उसे खाली लौटना पड़ा था। पुनिया माई के साथ रसोई में कुछ पका रही थी। वह उसके बापू से बातें करता रहा था और पुनिया के बापू पूरे समय अपनी फसल और रामभरोसे के साथ पुनिया के रिश्ते की बातें ही करता रहा था, जिसमें पारस की बिलकुल रुचि न थी।

पारस दुःखी था कि वह अपनी बात क्यों नहीं कह पाता पुनिया से। उसने यहां तक सोचा कि उसे पुनिया की माई या उसके बापू से कह देना चाहिए कि वह पुनिया को प्यार करता है… और…और वह सोचता ही रहा। न वह पुनिया से कुछ कह सका..न उसकी माई से और न ही बुधई से । धीरे-धीरे समय बीतता गया।


पुनिया अब घर से अकेली कम ही निकलती थी। जब कभी जाती या तो अपनी माई के साथ या पड़ोस की बसंती के साथ | बसंती उम्र में पुनिया से चार साल छोटी थी और पारस सोचता कि क्यों न बसंती के माध्यम से ही वह अपनी बात पुनिया तक पहुंचा दे, लेकिन वह ऐसा भी नहीं कर सका।

एक दिन कुछ देर के लिए पुनिया से फिर मुलाकात हो गई। बसंती साथ थी उस दिन पुनिया के | बसंती खेत में कुछ खोद रही थी और पुनिया मेड़ पर उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। पारस अपने खेतों की ओर जा रहा था। पुनिया को देख वह उधर से जा निकला।

पारस को देख पुनिया का चेहरा लाल हो गया, और वह सामने आम के पेड़ की ओर देखने लगी जैसे उसने पारस को देखा ही न हो।

“कैसी हो, पुनिया?” निकट पहुंचकर पारस ने पूछा।

पुनिया ने एक दृष्टि पारस के चेहरे पर डाली, फिर नीचे की ओर देखने लगी।

“नाराज हो?”

“मैं क्यों होने लगी नाराज!”

“मुझे लगा कुछ दुबली हो गई लगती हो…।”

“तुम मोटे हो गए हो क्या?”

दोनों हंसने लगे हलकी हंसी। पारस ने बसंती को देख लिया। उसकी हंसी बिला गई। दोनों इधर-उधर देखने लगे।

“तुम कहो तो मैं तुम्हारे बापू से बात करके देखू?” कुछ देर बाद पारस ने पुनिया के चेहरे पर नजरें गड़ाकर पूछा।

“किस बारे में?”

“अपने और तुम्हारे बारे में…।”

“कोई और बात नहीं कर सकते…मुझे रोज-रोज वही बात पसंद नहीं।” पुनिया का स्वर उत्तेजित था।

“पसंद नहीं?” पारस हत्प्रभ था, “पसंद नहीं …यानी… |”

“यानी…कुछ कर-करा सकते नहीं..फिर माथा खराब करने से क्या फायदा?” पुनिया चुप हो गई।

बसंती आ गई थी।

“का बात है, पारस ह भइया?” बसंती ने पूछा।

“कुछ नहीं।” पारस अपने खेतों की ओर मुड़ने लगा।

“मैं सब समझती हूं।” बसंती फिक से हंस दी।

पारस खुश था यह सोचकर कि पुनिया उसे चाहती है…और अब उसे पुनिया के बापू से बात कर लेनी चाहिए या अपने बापू को बुधई काका के घर भेजना चाहिए। लेकिन वह अपने बाप से डर के कारण अभी बात नहीं करना चाहता। पहले पुनिया के बापू का मन जान ले, फिर बापू से बात करेगा।

पुनिया उस क्षण घबरा उठी थी बसंती की बातों से…कहीं बसंती ने घर में माई से कह दिया तो?

और वही हुआ। बसंती ने पुनिया की माई से कह दिया था कि पुनिया और पारस कुछ प्यार-व्यार की बातें कर रहे थे। माई ने बुधई से कहा, “लड़की पराए घर की होने वाली है। अब उस पर ध्यान देना जरूरी है।”

“हुंह!” इतना ही बोला था बुधई। उसने पुनिया से कुछ भी नहीं कहा और पत्नी को भी रोक दिया था कि वह भी कुछ न कहे।

सांझ अचानक ही रामभरोसे आ गया था उसी दिन। अच्छा लगा था बुधई को। होने वाले दामाद की जमकर खातिरदारी की थी बुधई ने। दोनों बातें कर ही रहे थे कि पारस आ गया।

“राम-राम-काका!” पारस ने बुधई से कहा, “अरे भरोसे, तुम…कब आए?”

बुधई ने पारस की राम-राम का कोई उत्तर नहीं दिया। रामभरोसे ने केवल इतना ही कहा, “थोड़ी देर पहले ही आया हूं।” और वह फिर बुधई से बातें करने लगा।

“और सब ठीक-ठाक?” पारस ने रामभरोसे से पूछा।

रामभरोसे ने उसकी ओर देखा, फिर रुखाई से बोला, “ठीक-ठाक ही होना है।”

पारस ने समझ लिया कि शायद उन लोगों को उसका आना ठीक नहीं लगा। वह घर के अंदर जाना चाहता था, लेकिन उसके मन में विचार आया-कहीं बुधई ने टोक दिया..अंदर किसलिए..? वह तुरंत लौट पड़ा।

दिन में पारस जितना खुश था, शाम तक उतना ही निराश हो उठा था। मन पुनिया का भी दुखी था, क्योंकि उसे यह आभास मिल चुका था कि बसंती ने माई से शिकायत कर दी थी।

लेकिन रामभरोसे उस दिन अवश्य खुश था। पुनिया के हाथ का पका खाना खाकर और उससे दो बातें करके वह उस
के घर से निकला था। पुनिया के घर से जाते समय रामभरोसे बसंती के घर गया था। बसंती के परिवार से उसके पुराने संबन्ध थे। बसंती ने मजाक-मजाक में ही रामभरोसे से कहा था, “पनिया दीदी को जल्दी से ब्याह ले जाओ, भरोसे भइया.. नहीं तो हाथ मलते रह जाओगे।”

“क्यों, क्या हुआ?”

“बस, समझ लो।” बसंती उसके कान में फुसफुसाई थी।

रामभरोसे ने और जोर दिया तो बसंती ने उस दिन की घटना भी उसे बता दी थी।

सुनकर कुछ न बोला था रामभरोसे। लेकिन उस दिन के बाद उसने पारस से बात करना बंद कर दिया था। अपने बापू से स्पष्ट कह दिया था कि वह पुनिया के बापू पर जल्दी-से-जल्दी ब्याह कर देने के लिए दबाव डालना शुरू कर दें।

पारस अब उदासीन-सा रहने लगा था। पुनिया ने भी बाहर जाना लगभग छोड़ दिया था। जब-तब पारस उसके घर के सामने से निकलता तो वह उसे दरवाजे की ओट होकर देख भर लेती…बातें करने का साहस दोनों ही नहीं कर पाते थे।

बुधई को रघुआ के संदेश मिलने लगे थे और वह स्वयं भी पुनिया के बोझ से जल्दी-से-जल्दी मुक्त हो जाना चाहता था, लेकिन आर्थिक समस्या अभी भी थी..इसलिए उसने कुछ दिन की और मोहलत मांग ली थी। इस बार बुधई को उम्मीद थी कि फसल अच्छी होगी। फसल काटते ही वह पुनिया का विवाह कर देगा। इस वर्ष उसने और अधिक परिश्रम करके खेत तैयार किए थे। सभी खेतों में गेहूं ही बोया था। दीवाली तक उसके सारे खेत बोए जा चुके थे, और वह प्रतिदिन खेतों में जाकर देखने लगा था कि गेहं अंखुआए या नहीं। वह इसलिए भी उधर जाता, क्योंकि उसे डर लगा रहता था कि कहीं दीवाली खेलने की उन्मुक्तता में लड़के पाटा दिए एवं बोए उसके किसी खेत में दीवाली न खलने लगें।


कार्तिक पूर्णिमा का गंगा स्नान निकट आ चुका था। दीवाली के बाद की पंचमी का इंतजार था और वह दिन भी उंगलियों पर गिनते न गिनते आ ही गया। एक दिन पहले ही बीर बाबा के मंदिर के पास के मैदान में बीस किलोमीटर दूर तक से आए व्यापारियों की दुकानें सजने लगी थीं।

बीर बाबा का मंदिर दलपत खेड़ा से लगभग दो किलोमीटर दूर, पूर्वी दिशा में, पांडु नदी के किनारे है, जिसके चार-पांच किलोमीटर इर्द-गिर्द अनेक गांव हैं। पिछले कुछ वर्षों की अपेक्षा उस वर्ष लोगों में मेला देखने का उत्साह कुछ अधिक ही था, क्योंकि वर्षा अच्छी होने से फसल की बुआई भलीभांति हुई थी। किसानों को अच्छी फसल की उम्मीद थी, और इस उम्मीद के कारण उनमें मेला देखने का उत्साह दोगुना हो उठा था।

चारों दिशाओं की पगडंडियों पर रेंगते हुए लोग मेले की ओर बढ़ रहे थे।

पुनिया भी बापू और माई के साथ आई थी। एक-एक रुपए के बतासे लेकर तीनों बीर बाबा पर प्रसाद चढ़ाने गए। सीढ़ियां चढ़ते समय पुनिया ने नजरें नीचे झुका लीं और भीड़ को ठेलती जल्दी-जल्दी सीढ़ियां चढ़ने लगी। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा था। बुधई ने भी पारस को देख लिया और पुनिया की माई ने भी, लेकिन देखते ही दोनों ने नजरें घुमा ली थीं।

पारस सीढ़ियां उतरकर रुक गया और पुनिया के लौटने की प्रतीक्षा करने लगा। वह सोच रहा था कि पूछेगा उससे कि आज खेल देखेगी या नहीं। लेकिन क्षण भर बाद ही उसे याद आया बुधई का उपेक्षापूर्ण चेहरा और उसका अब तक का व्यवहार । पारस ने विचार बदल दिया और दुकानों के बीच से होकर चल पड़ा उस टीले की ओर, जिधर दीवाली खेलने वाले युवक तैयारी में व्यस्त थे।

हलवाइयों की दुकानों से ताजी मिठाई की गंध आ रही थी और जलेबियां निकाली जा रही थीं। बिसातियों की दुकानों में औरतों की भीड़ थी। खिलौनों की दुकानों के आस-पास बच्चे मंडरा रहे थे। पारस ने रास्ता बदल लिया, और बायीं ओर मुड़कर लकड़ी के सामानों की दुकानों की ओर जा निकला। पास ही एक लड़का उबले सिंघाड़े बेच रहा था। पारस का मन सिंघाड़े खाने को हुआ, लेकिन कुछ खाकर खेलना उचित नहीं। वह आगे बढ़ गया।

ढोल बजने लगा था और छोटे-छोटे लड़के खेलने लगे थे। अपने गाववाले युवको के पास जाकर पारस उनका खेल देखने लगा। दीवाली देखने के लिए लोग टीले पर इकट्ठे होने लगे थे।

लड़कों को खेलता देख कुछ बूढों में भी जोश आ गया। उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आ गए। अपनी बेढंगी लाठियां संभाल वे भी उछलने लगे। लगभग आधा घंटा तक हुड़दंग होता रहा।

लड़के थक गए तो हंसते हुए एक ओर जा खड़े हुए। ये सभी दलपत खेड़ा के लड़के थे..बारह से पन्द्रह वर्ष की उम्र के बीच ।

मैदान साफ देख पारस का एक साथी बोला, “चलो, पारस ।”

“हां घिनुआखेड़ा वालों को आवाज दे दो…तैयार होकर आ जाएं।” अपनी पतली और मजबूत लाठी को तीन बार मोड़कर पारस ने देखा, और साथियों को चलने का इशारा किया।

पारस का एक साथी लाठी ऊपर उठाते हुए चीखकर बोला, “अरे, रामभरोसे होऊ…आ जाओ सबके साथ ।

ढोल बज उठा जोर से। ठोल बजाने वाला बलमा धानुक था दलपत खेड़ा का। वर्षों से वही बजाता आ रहा था। इस अवसर पर जब वह ढोल बजाकर गांव लौटता, प्रत्येक अहीर परिवार से उसे एक सेर अनाज मिलता।

ढोल की आवाज से जोश आने लगा युवकों में। सभी लुंगी और बनियायन में, नंगे पैर थे। ठंड का असर जैसे उन पर नहीं हो रहा था। खेलने का उत्साह जो था सभी में। घिनुआखेड़ा वाले युवक भी आ गए। ढोल की आवाज पर सभी लाठियां ऊपर उठाकर नाचने लगे। खेल शुरू करने से पहले वे सदैव ऐसा ही करते थे। नाचते-नाचते वे गा रहे थे-

“काहे तो निमिया कड़वी लागे,

काहे से लागे शीतली छांह ।

काहे से भइया बैरी लागे,

काहे से लागे दाहिनी बांह ।

ढम-ढम-ढम-ढमाढम…

खाए से निमिया कड़वी लागे,

बैठे से लागे शीतली छांह।

बांट में भइया बैरी लागे,

रण में लागे दाहिना बांह।

हो हो हो…

खाने को चाहिए खांडा चिरऊजी,

सोने को चाहिए छरहरी डाल ।

छैला को चाहिए पातर धनिया,

ओ हो हो हो… ।”

बलमा धानुक के हाथ रुक गए। युवकों का नृत्य-गान भी रुक गया । यह संकेत था खेल शुरू करने का | बलमा ने देख लिया था कि सूरज की रोशनी बूढ़ी होती जा रही है और छाया आम के पेड़ों से नीचे उतर आई है।

“हां, भइयन, खेल शुरू करो!” बलमा ने कहा और ढोल पर दो बार ढम-ढम की आवाज दी।

खिलाड़ी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। इसका अर्थ था, पहले कौन किससे भिडेगा? पारस ने स्थिति भांप ली। वह अपनी लाठी संभाल आगे आ गया। रामभरोसे को पारस के साथ खेलना था। वह भी आगे बढ़ आया । रामभरोसे ने लाठी को जमीन पर रखकर जल्दी-जल्दी कई बार लचकाया और रहस्यात्मक दृष्टि से पारस की ओर देखा । पारस ने महसूस किया कि रामभरोसे ने अपनी लाठी को अधिक ही तेल पिलाया है। इस खेल के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली ठोस बांस की लाठियों को खिलाड़ी अधिक-से अधिक कड़वा तेल लगाकर मजबूत बनाते हैं, और उनकी यह प्रक्रिया वर्ष भर चलती रहती है।

बलमा ढोल बजाने लगा। रामभरोसे पर एक दृष्टि डाल पारस ने टीले की ओर देखा। पुनिया, बापू और माई के साथ भीड़ के एक कोने में खड़ी दिख गई। पुनिया एकटक उसी को देख रही थी। पारस को टीले की ओर देखता देख रामभरोसे की दृष्टि ने उसकी दृष्टि का पीछा किया। उसने भी पुनिया को देख लिया। रामभरोसे के अंदर अंगारे सुलग उठे। लाठी पटक बोला, “खेल शुरू हो ।”

पारस संभला । रामभरोसे ने ‘जय बीर बाबा’ कहकर अपनी लाठी पारस की लाठी से टकराई…और खेल शुरू हो गया। दोनों को खेलता देख दो अन्य जोड़ों में भी उत्साह आ गया। वे भी मैदान में उतर आए और रामभरोसे और पारस से कुछ हटकर खेलने लगे। छह लाठियों के समवेत स्वर बजने लगे…कट-कड़ाक-कट…कड़ाक-कड़ाक-कट-कटाक!

बड़ी मात्रा में लोग खिलाड़ियों के चारों ओर एकत्रित हो गए थे। सभी दम साधे देख रहे थे। अद्भुत प्रदर्शन था। औरतें और बच्चे चीत्कार कर उठते…अब लगी उसके लाठी…तब लगी। लेकिन खेलने वाला यदि प्रतिद्वंद्वी का प्रहार नहीं बचा सकता, तो फिर वह खिलाड़ी कैसा? तीनों जोड़े घूम-घूमकर खेल रहे थे। दृष्टि बंध गई थी देखने वालों की। किसको देखें किसको नहीं…यही प्रश्न था। वे तीनों जोड़ों को एक साथ देखना चाहते थे, लेकिन तीनों पर एक साथ दृष्टि स्थिर रखना संभव न था…तीनों के प्रदर्शन में तीव्रता जो थी!

बलमा के ढोल का स्वर भी तेज से तेजतर होता जा रहा था। बलमा झूम रहा था। उसके हाथ स्वत: चल रहे थे…जैसे उनमें मशीन लगा दी गई हो।

और मशीन रामभरोसे के हाथों में भी जैसे लग गई थी आज । जितनी तेजी से उसके हाथ चल रहे थे, उतनी ही तेजी से उसका दिमाग भी गतिशील था।

‘तो यही अवसर है पारस को सबक सिखाने का…पुनिया से उसे दूर करने का…जो मेरी है…उससे मिलने, बात करने, देखने का सबक मिलना ही चाहिए!

कड़ाक…कड़ाक-कट…कड़ाक..पारस का प्रहार बचाने में दिमाग चकरघिन्नी हो गया रामभरोसे का। संभलकर वह प्रहार बचाने और करने लगा। क्षण भर के लिए विचार लड़खड़ा गए। लेकिन कितनी देर! वह फिर सोचने लगा–लेकिन खेलते समय प्रतिद्वंद्वी को चोट पहुंचाना-वह भी जानबूझकर-खेल की मर्यादा के विरुद्ध है। खेल की पवित्रता को नष्ट करना है। ऐसा करना अपने खेल को कलंकित करना हुआ रामभरोसे!

“वाह मेरे शेरो…वाह-वाह…!” भीड़ में से कोई बोला। रामभरोसे की विचार-श्रृखंला लाठियों की तड़तड़ाहट में फिर टूट गई। दिमाग एक बार फिर चकरघिन्नी की तरह घूम गया । संतुलन बिगड़ गया। वह संभल पाता, इससे पहले ही पारस की लाठी उसके सिर पर जा लगी। रामभरोसे गिर गया। कोहराम मच गया।

पारस अपराधी सा एक ओर खड़ा हो गया। वह नहीं समझ पा रहा था कि वह सब कैसे हो गया। लोग क्या कहेंगे? बुधई काका.. टोला–गांव-पुनिया सब यही सोचेंगे कि पारस ने जानबूझकर मार दी होगी लाठी। वह कैसे यकीन दिलाएगा लोगों को कि वह ऐसा कभी सोच भी नहीं सकता था।

रामभरोसे के गिरते ही ढोल पर बलमा के हाथ रुक गए थे। वह चीख रहा था. “दौडो.दौडो. देखो रामभरोसे को. पारस बबआ. ई का हआ?”

पारस को जैसे लकवा मार गया था। वह हिले-डुले बिना आंखें फाड़कर देखता रहा। उसकी सारी शक्ति जैसे निचुड़ गई थी।

बलमा ढोल फेंककर दौड़ पड़ा था। आस-पास इकट्ठी भीड़ इधर-उधर भागने लगी थी। चीख-पुकार…शोर और शोर…लोग भागते समय यह भी भूल गए थे कि वे किसी दुकान का सामान रौंदते भाग रहे हैं। दुकानदार हड़बड़ाते हुए सामान बटोरने लगे थे। मिट्टी-प्लास्टिक के खिलौने, मूंगफली, गट्टी-रेवड़ी…सब धूल में बिखर गए थे। किसी की चप्पलें छूट गई थीं तो कोई अपना झोला छोड़कर भाग खड़ा हुआ था। झुंड के झुंड स्त्री-पुरुष… बच्चे-बूढ़े-जवान खेतों को रौंदते-पगडंडियों पर भागते दिख रहे थे।

“लाठी चल गई …मेला में!” हांफते हुए सभी यही कह रहे थे।


बलमा की गोद में रामभरोसे का सिर था और सिर से खून बहकर जमीन को गीला कर रहा था। उसकी सांसें तेज चल रही थीं…आंखें मुंदी हुई थीं। वह धीमे स्वर में पानी मांग रहा था। उसका एक साथी दौड़कर नदी से पानी ले आया था। दो बूंट पानी पीकर रामभरोसे शिथिल लेट गया था। बलमा ने अपना अंगौछा उसके सिर पर बांध दिया था।

पारस अभी भी चुप खड़ा था। किसी ने उससे कहा कुछ भी नहीं था, लेकिन वह अपने को अपराधी मान रहा था। उसके साथी उसके इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गए थे…रामभरोसे के साथियों की ओर से पारस पर होने वाले संभावित हमले से उसकी रक्षा करने के लिए।

रामभरोसे के साथी उत्तेजित थे ही। वे बरगद के पेड़ के पास इकट्ठे होकर यह तय कर रहे थे कि कुछ भी क्यों न हो जाए, लेकिन पारस को वे साबुत जाने न देंगे। रामभरोसे के साथी कुछ करते, इससे पहले ही वहां रघुआ आ गया। रघुआ को जब रामभरोसे के घायल होने की खबर मिली उस समय वह मंदिर के उत्तरी छोर पर दूसरे गांव के कुछ वृद्ध लोगों के साथ गांजे की चिलम फूंक रहा था। खबर पाते ही वह दौड़ा आया था।

दलपत खेड़ा और अपने गांव के युवकों में तनाव रघुआ ने आते ही बांप लिया। उसने अपने गांव के युवकों को डांटा, “खड़े-खड़े मुंह क्या ताक रहे हो…एक-दूसरे का…उठाकर भरोसे को गाड़ी में लिटाओ और ले चलो सुजानपुर के डॉक्टर बाबू के पास ।”

सुजानपुर वहां से आठ मील दूर था—जी.टी.रोड के किनारे। रघुआ की डांट सुन सभी युवक सक्रिय हो उठे थे। बुधई भी आ गया। रामभरोसे को गाड़ी में लिटा दिया गया। रघुआ के साथ बुधई और रामभरोसे के दो साथी भी गाड़ी में बैठ गए। शेष पैदल चले।

पारस वैसे ही अडोल खडा उन्हें जाता देखता रहा. जब तक बैलगाडी झाड़ियों की ओट में छुप नहीं गई।


कुछ ही देर में वह सब घटित हो गया था। पुनिया हत्प्रभ थी..बेचैन भी, ‘क्या पारस ने जानबूझकर रामभरोसे को लाठी मारी…लेकिन क्यों? पारस ऐसा नहीं कर सकता..लेकिन क्यों नहीं कर सकता? क्या तूने पारस के मन की सारी बातें पढ़ रखी हैं…कभी-कभी आदमी अंदर कुछ होता है और बाहर कुछ…फिर भी पारस ऐसा घृणित काम नहीं कर सकता..जरूर चूक से ही लाठी लग गई होगी–पारस का चेहरा भी यही बता रहा है…तब से वह अपराधी-सा खड़ा दिख रहा है…- |’

तत्क्षण पुनिया के मन में विचार कौंधा, ‘पारस के प्रति तेरे हृदय में जो भाव है…उसी के कारण तू यह नहीं सोच सकती कि पारस ने जानबूझकर ही रामभरोसे को घायल किया है…लेकिन क्यों? क्योंकि पारस तुझे चाहता है…वह नहीं चाहता होगा कि तू किसी और की…।’ वह जमीन पर बैठ गई और घुटनों के मध्य सिर रखकर धीरे-धीरे सुबकने लगी।

“रो क्यों रही है, पूनो…भरोसे ठीक हो जाएगा।” माई उसके सिर पर हाथ फेरने लगी, “चुप हो जा–बीर बाबा की किरिपा से सब ठीक हो जाएगा।”

पुनिया वैसे ही सिर रखे बैठी रही।

“उठ पूनो-घर चलें…बापू बैलगाड़ी के साथ गया है भरोसे को लेकर… चल, घर में कुछ काम-धाम बाकी है।” माई अभी भी उसके सिर पर हाथ फेर रही थी।

पुनिया वैसी ही बैठी रही।

सूरज डूब चुका था। स्टेशन के पश्चिम की ओर शुक्लों की अमराई के पीछे धुंधलका पेड़ों के नीचे उतरने लगा था- आहिस्ता-आहिस्ता।


गैस बत्तियों की रोशनी में रात देर तक चलने वाला मेला लगभग उजड़ चुका था। जो लोग कंबल लेकर रात भर रुककर नौटंकी देखने के इरादे से आए थे, वे भी लौटने लगे थे। डर था, कहीं पुलिस न आ जाए। कोई माइक से घोषणा कर रहा था, “भाइयो! बहनो! आप सबके लिए–रात नौटंकी का इंतजाम-!”

पुनिया अभी भी घुटनों के मध्य सिर रखे बैठी थी।

“उठ पुनिया, घर चलें।”

पुनिया ने सिर ऊपर उठाया। उसकी आंखें लाल थीं।

दोनों चल पड़ीं। इक्का-दुक्का लोग ही थे पगडंडियों पर। धुंधलका पूरी तरह खेतों पर उतर आया था। झींगुरों की आवाजें झाड़ियों में उभरने लगी थीं।

पुनिया ने उस रात कुछ नहीं खाया और सुबह भी वह देर से ही उठी। नींद उसे रात भर नहीं आई थी. सोचती रही थी पारस के बारे में कैसे लगी पारस से लाठी?’ वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची। इतना वह भी जानती थी कि खेलने वाले का उद्देश्य अगर खेलना हो तो एक-दूसरे को बचाकर ही वे खेलते हैं और ऐसे में कभी चूक से ही चोट लगती है किसी को।

रह-रहकर पारस का चेहरा पुनिया की आंखों के सामने घूमता रहा।

बुधई रात को लौटा नहीं था।

पुनिया सुबह उठी तो शरीर दर्द से टूट रहा था। माई बाहर जाने के लिए तैयार थी। पुनिया को जगा देख वह बोली, “मैं जा रही हूं-घर देखना-दाल रख दी है कटोरे में, मां…रोटी सेंक लेना…थोड़े से चावल भी-बापू आ जाए तो खिला देना।

पुनिया ने कोई उत्तर नहीं दिया।

माई के जाने के बाद वह नहा पर बैठ गई और फिर सोचने लगी पारस के बारे में, ‘क्या पारस ने मेरे लिए ऐसा किया..मैं नहीं मानती कि वह ऐसा कर सकता है…मुझको पाने के लिए…लेकिन क्या मालूम…बापू से तो कुछ वह कह नहीं सका था…ऐसे ही…।’ वह अत्यधिक दुःखी हो उठी।

सूरज की किरणें छप्पर पर अठखेलियां कर रही थीं, और गौरेया मुंडेर पर फुदक रही थी। पुनिया गौरेया को देखने लगी। तभी बसंती ने उसे आवाज दी।

‘शायद बसंती को कुछ मालूम हो इस बारे में… | कैसे लगी रामभरोसे को पारस की लाठी…जरूर मालूम होगा, और वही बताने वह आई होगी…।’ पुनिया ड्योढ़ी तक आ गई।

बसंती गली में खड़ी थी।

“अंदर आ जा…वहां क्यों खड़ी है!”

बसंती आने लगी तो पुनिया अंदर की ओर मुड़ गई। बसंती उसके पीछे-पीछे आंगन में आ गई।

“कल त बड़ा गज़ब हो गया, दीदी… बीर बाबा ने ही बचा लिया रामभरोसे भइया को। नहीं त…पारस ने त मार ही दिया था!” नजरें इधर-उधर दौड़ाती बसंती बोली।

पुनिया चुप रही।

“रामभरोसे को तो रात ई पट्टी वट्टी बांधकर और कुछ दवाई देकर सुजानपुर के डॉक्टर बाबू ने शहर ले जाने के लिए कहा था…बोले थे कि शहर ले जाने से घाव जल्दी ठीक होगा- मेरे भइया भी साथ गए रहैं… उहां अस्पताल में भरती करवा के भइया सुबो-सुबो लौट आए हैं..बता रहे हैं, कौनो चिंता की बात न है…बुधई काका शाम तलक आवेंगे।”

पुनिया ने लंबी सांस ली।

“भइया त रघुआ काका ते बोले रहैं पुलिस मा रिपोट लिखवावन खातिर…पन उनने मना कर दिया..रामभरोसे पर जानलेवा हमला अउर रघुआ काका की पारस के प्रति ई उदारता…अपने तो समझ मा न आवा… भइया भी कह रहे हैं… |” हाथ मटकाकर बसंती बोली।

पुनिया फिर भी चुप रही।

बसंती की नजरें अभी भी इधर-उधर दौड़ रही थीं।

“कुछ चाहिए…?” पुनिया ने पूछ लिया।

“दीदी, थोड़ी-सी चाह की पत्ती हो तो…कोऊ आ गवा है।”

आने-जाने वालों के लिए पुनिया के यहां चाय पड़ी रहती थी। ढाई सौ ग्राम आती तो एक साल तक चल जाती। पुनिया रसोई में गई और एक छोटी कटोरी में चाय की पत्ती लाकर बसंती को दे दी।

“कटोरी अभी दे जाऊंगी, दीदी।” बसंती मुस्कुरा दी।

“कोई बात नहीं।” पुनिया को अपनी आवाज किसी गुफा के अंदर से आती प्रतीत हुई।

पुनिया बसंती को छोड़ने बाहर ड्योढ़ी तक गई। बसंती के जाने के बाद वह ड्योढ़ी पर बैठ गई और घास चरने के लिए जंगल जाते जानवरों को देखने लगी, जो गली में एक-दूसरे के आगे-पीछे जा रहे थे। गोबर से सनी भैंसें और घंटियां टुनकाती गाएं, कान फड़काते-डोलते पड़वे और उछलते बछड़े जा रहे थे। निश्चिंत …पेट भरने के लिए…पीछे-पीछे मनकू अहीर था लाठी लिए। सारे टोला के जानवर मनकू ही घेरकर ले जाता है और महीने में उसे लोग प्रति जानवर कुछ रुपए दे दिया करते हैं।

पुनिया जानवरों को जाता देखती रही। धीरे-धीरे मेला का दृश्य फिर उसके दिमागे में उभरने लगा..मेला–मेला में दीवाली, खेल…खेलते हुए पारस और रामभरोसे…और रामभरोसे पर पारस की लाठी का प्रहार उसने स्वयं देखा था। रामभरोसे को गिरते उसने देखा था और चीखी भी थी वह… लेकिन किसी ने न सुनी थी उसकी चीख-क्योंकि चीखें तो चारों ओर से आने लगी थीं-

“लाठी चल गई …लाठी…भागो!” शोर करते लोग एक-दूसरे को धकियाते भाग रहे थे।

एक-एक दृश्य पुनिया की नजरों के समक्ष घूम रहा था। पुनिया खो-सी गई उसमें।

“पुनिया…!”

पुनिया अचकचा गई। सामने पारस खड़ा था। पुनिया की आंखें सुर्ख हो गईं। वह उठ खड़ी हुई और अंदर की ओर मुड़ी।

“सनो पनिया…।” उदास स्वर में पारस बोला और आगे बढ़ा ।

“मुझे कुछ नहीं सुनना…चलो जाओ यहां से..मैं तुम्हारी शक्ल नहीं देखना चाहती।” पुनिया चीखी और उसने धड़ाम से दरवाजा बंद कर लिया।

“पुनिया, मेरी बात तो सुनो…मैंने जानबूझकर नहीं… |”

पारस की बात बीच में ही काटकर पूर्ववत स्वर में पुनिया चीखी, “मैंने कहा न-चले जाओ यहां से…मुझे कुछ नहीं सुनना–और यह भी सुनते जाओ- ।” पारस खड़ा रहा चुप।

पुनिया कुछ बोली नहीं। वह फफक-फफककर रोने लगी थी।

पारस कुछ देर तक दरवाजे के बाहर खड़ा रहा, फिर बुझे मन से वापस लौट पड़ा।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’