Hindi Katha: देवी भगवती दुर्गा निर्गुण हैं, सर्वव्यापी हैं जिनका न कभी जन्म होता है, न मृत्यु। उन्हीं भगवती की सात्विक, राजसी और तामसी शक्तियाँ स्त्री की आकृति में महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली के रूप में प्रकट होती हैं। संसार की अव्यवस्था दूर करने के लिए ये शक्तियाँ प्रत्येक युग में अवतार धारण करती हैं।
एक समय की बात है, पुराणों के रचयिता महर्षि वेद व्यास सरस्वती नदी के तट पर स्थित अपने आश्रम में बैठे थे। तभी उनकी दृष्टि दो गौरेया पक्षियों पर पड़ी जो अपने बच्चों को दाना चुगा रहे थे और स्नेह कर रहे थे। देवी भगवती की माया से व्यासजी के मन में भी संतान और उसका प्रेम पाने की इच्छा जागृत हुई। वे विचार करने लगे कि ‘संतान पाने के लिए विष्णु, शंकर, इन्द्र, ब्रह्मा, गणेश – इनमें से किनकी उपासना करनी चाहिए ? “
उसी समय देवर्षि नारद उनके आश्रम में आए। नारदजी ने उनकी चिंता का कारण पूछा तो व्यास जी बोले “हे देवर्षि ! वेदों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में यह वर्णित है कि पुत्रहीन को सद्गति नहीं मिलती। अतः इसी बात को लेकर मैं चिंतित हूँ। पुत्र पाने के लिए मैं किस देवता की शरण लूँ?”
नारदजी ने उन्हें देवी भगवती की उपासना करने का परामर्श दिया। उनके परामर्श पर वेद व्यास भगवती की तपस्या करने के लिए मेरुगिरि पर चले गए। सौ वर्षों की कठिन तपस्या के बाद देवी भगवती वेद व्यास पर अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने भगवान् शंकर को उन्हें वर प्रदान करने के लिए भेजा। भगवान् शंकर ने वेद व्यास जी को पुत्र – प्राप्ति का वरदान दिया । व्यास जी पुनः अपने आश्रम में लौट आए। वे विवाह के बंधन में नहीं बँधना चाहते थे,फिर पुत्र कैसे उत्पन्न हो ?
वे इसी बात पर विचार कर रहे थे कि उनकी दृष्टि स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ अप्सरा घृताची पर पड़ी जो उनके आश्रम के समीप आकाश मार्ग से जा रही थी। घृताची ने देखा, व्यास जी उनकी ओर एकटक दृष्टि से देख रहे हैं। वह आतंकित हो गई कि मुनि कहीं उसे शाप न दे दें। उसने तोती का रूप धारण कर लिया और भयभीत होती हुई वह मुनि के आगे से निकली।
अप्सरा को देखते ही मुनि के शरीर में काम का संचार हो गया । तोती बनी घृताची तो वहाँ से चली गई लेकिन मुनि का अमोघ वीर्य, हवन के लिए एकत्रित की गई लकड़ियों पर पड़ गया। उस वीर्य से व्यास जी के परम तेजस्वी पुत्र शुकदेव का जन्म हुआ।
शुकदेव जन्म से ही व्यास जी की भाँति धर्मनिष्ठ, वेदमूर्ति और ज्ञानवान थे। वे शीघ्र ही बड़े हो गए तो व्यास जी ने उन्हें गुरुकुल में शिक्षा-दीक्षा के लिए भेजा। ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् उन्होंने ऋषि-मुनियों में अत्यंत प्रतिष्ठा अर्जित की और सभी ओर ज्ञान का प्रकाश फैलाया।
