एक राज्य में एक बहुत विद्वान व्यक्ति रहता था। एक बार जब राज्य के राजा से किसी ने उसकी प्रशंसा की तो उसने उसका सत्कार करने की सोची। उसने दूत भेजकर विद्वान को बुलाया और उसे स्वर्ण मुद्राओं से भरी एक थैली देकर बोला कि हमें कुछ ही दिन पहले पता चला कि हमारे राज्य में आपके जैसा विद्वान व्यक्ति रहता है। हम आपका सम्मान करना चाहते हैं।
इसलिए हमारी ओर से यह तुच्छ सी भेंट स्वीकार करें। विद्वान ने विनयपूर्वक उसकी भेंट लौटा दी और बोला कि क्षमा करें महाराज, मैं आपका पुरस्कार स्वीकार नहीं कर सकता। क्योंकि यह सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है। आपने स्वयं मेरी विद्वता का अनुभव नहीं किया है, सिर्फ किसी ने कहा कि मैं बहुत विद्वान हूँ और आपने मान लिया।
कल कोई आकर आपसे कहे कि मैं बहुत दुष्ट हूँ तो आप बिना कोई कारण जाने मुझे दंडित भी कर सकते हैं। राजा को अपनी भूल समझ में आ गई और उसने विद्वान से क्षमा माँगते हुए उसे राज्य की ओर से आयोजित होने वाले शास्त्रर्थ के अगले सत्र में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया।
सार: कुशल शासक को सुनी-सुनाई बातों के आधार पर निर्णय नहीं लेने चाहिए।
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
