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grehlaksmi ki kahani
grehlaksmi ki kahani

गृहलक्ष्मी की कहानी इससे पहले उस लड़की को देखकर उस लड़के ने कभी नहीं सोचा था कि वे इस तरह अचानक एक दिन बगैर किसी लम्बी-चौड़ी भूमिका के, एक ही खाट पर इतने पास आ जाएंगे । इस लड़की ने भी नहीं सोचा था । वह बात-बात पर शर्माने वाली दुबली-सी लड़की थी । वे बसन्त के शुरू के दिन थे और बसन्त के शुरू के दिनों में प्रेम करना दोनों के लिए नया अनुभव था । उनका विश्वास था कि ऐसा केवल प्रेम के अन्त में ही होता है, मगर यह प्रेम की एक ऐसी शुरुआत थी, जो उन्हें अविश्वसनीय भी लगती थी और सहज भी । उन्होंने पाया, बाद में स्वीकार भी किया कि वे दोनों भूखे थे । लड़के ने तो जिज्ञासा में पूछ भी लिया ‘डू वी लव ईच अदर?” लड़की होशियार थी, उसका ध्यान बातों की तरफ नहीं था, उसकी आंखें बन्द हुई जा रही थीं और सांस फूल जाने से उसके होंठ खुले थे । उसने कहा कि वे एक-दूसरे को जानने की कोशिश कर रहे हैं । लड़के को लगा, लड़की वाकई उसे पूरी तरह से जान लेना चाहती है ।

कुछ ही दिनों में, लड़के का नाम उबेराय से ओबी हो गया था और लड़की ने गहरे रंग की तमाम साड़ियां सूटकेस में रख दी थीं । लड़की को लड़के का नाम पसन्द नहीं था और लड़के को उसकी गहरे रंग की साड़ियां । उन्हें अफसोस रहेगा कि उन दिनों उनके पास बहुत कम समय था । लड़के की नौकरी नई थी और लड़की का बाप झक्की किस्म का सरकारी अफसर था ।

वे कुछ ही घण्टों के लिए मिल पाते थे । जल्दी में एक-दूसरे को दिन भर के काम तथा अकेलेपन का ब्योरा बताकर, वे समझते थे, वे प्रेम कर रहे हैं । फिर लड़का उसे बस स्टॉप पर छोड़ आता । बस के इन्तजार में वे सड़कों की बात करते या समुद्र की या किसी दम्पत्ति को देखकर लड़की फुसफुसा उठती, ‘कबूतर ।”

वे उस समय या उस उम्र में मिले थे, जब प्रेम की पारिभाषिक शब्दावली उनके लिए बेकार हो चुकी थी । पुरानी भाषा में उन दोनों ने प्रेम करना चाहा था, मगर उन दोनों को अपनी बातें बहुत अजनबी लगी थीं । भाषा उन्हें दूर ले जाती है, लड़की ने कहा । लड़का मुस्कराया । शुरू-शुरू में लड़की की उंगलियां देखकर उसके मुंह से निकल गया था कि उसकी उंगलियां ब्रश जैसी हैं।

“टूथब्रश जैसी?” लड़की ने पूछा था । ब्रश के नाम से उसे हमेशा टूथब्रश याद आता है और समुद्र के नाम से बम्बई।

“उस ब्रश जैसी, जिससे ‘मोनालिसा’ ने आकार लिया था।” कहकर लड़के को बहुत अफसोस हुआ । उसने दरअसल यह बात प्रेम के आवेश में कह दी थी । लड़की ने अपनी उंगलियां उसके सामने फैला दीं, तो लड़के ने पाया, कि उसकी उंगलियां भिंडी-तोरी जैसी हैं और उसकी बांहों पर लड़के से भी ज्यादा बाल हैं । लड़के के भूल-सुधार पर वह उदास हो गई और उसकी कॉफी ठण्डी होती रही । कुछ दिनों तक सब्जियां उनके प्रेम के इजहार का माध्यम बनी रहीं। लड़की ने कहा कि लड़के की शक्ल ऐसी है, जैसे आलू को चश्मा पहना दिया गया हो ।” आलू में ‘फैट’ होता है।” लड़के ने कहा ।

दरअसल, आलू के बारे में उसकी जानकारी सीमित थी। इतनी सीमित नहीं थी कि आलू का जिक्र आते ही बातों का सिलसिला टूट जाए । कभी-कभार अगर बातों का सिलसिला टूट जाता तो वे दोनों एक-दूसरे को मूर्खों की तरह देखने लगते, एकान्त होता तो चूमने लगते । बातों का टूटा हुआ सिलसिला जोड़ने के लिए एक-दो बार लड़की ने ब्राउनिंग की कविताएं सुनानी चाही थीं, मगर कविता के नाम से लड़का चिढ़कर उबाइयां लेने लगता था । जब से उनका प्रेम हुआ, उन्होंने चांद भी एक साथ नहीं देखा था, एक फिल्म देखी थी और फिल्म के दौरान उन्हें लगा था, वे एक-दूसरे से कट गए हैं और वे फिल्म बीच में ही छोड़ कर भाग आये थे । म्यूनिसिपल पार्क में । एक-दूसरे के हाथ चूमते-सूंघते यह बूझना उन्हें फिल्म से कहीं अधिक दिलचस्प लगा कि वे कौन-सा साबुन इस्तेमाल करते हैं । वे दोनों चश्मा पहनते थे और अगर पार्क में एकान्त होता हो उनके चश्मे अक्सर टकरा जाते । दोनों एक-दूसरे का चश्मा उतार देते । लड़की शुरू से ही लड़के के होठों की प्रशंसक रही है। वह अपने दांतों में लड़के के होंठ दबोच लेती । मुक्त होते ही लड़का उसकी पुतलियों की हरकत पर होंठ रख देता और महसूस करता कि उसने किसी जीवित अंग पर होंठ रखे हैं, ठीक उस तरह, जैसे पैर के नीचे तितली आ जाने पर आपने कभी महसूस किया होगा । लड़की आंखें मूंद लेती। जब वह आंखें खोलती तो लड़का बहुत पास से लड़की की भूरी आंखों में अपना चेहरा देखने लगता, जैसे आईना देख रहा हो । गौर से देखने पर उस लड़की की आंखों में उस लड़के को अपना चेहरा पहचाना हुआ-सा लगता । उसे लगता, उस लड़की की आंखों में वह ओबी को देख रहा है। वह कहता कि उसकी इससे छोटी तस्वीर नहीं हो सकती । लड़की की पुतलियों में ओबी का चेहरा होता और खिड़की और वार्डरोब । वह उसे बता देता कि उसकी पुतलियों में इस वक्त ये तमाम चीजें नजर आ रही हैं। लड़की कहती कि लड़के की आंखों में वह है, सस्ता कैलेण्डर है और दीवार है ।

“कितना अच्छा है, यह समाज की दीवार नहीं है ।” लड़का कहता ।

“विकेड हो”, वह कहती, ‘क्रुकेड हो । दोनों हो!”

“स्टूपिड हूं।” लड़का कहता । लड़का कहकर चुप हो जाता । लड़की चुप्पी से बहुत डरती थी । अपने बाप से भी ज्यादा डरती थी । 

“इस तरह कोई कितने दिन खुश रह सकता है?” लड़का पूछता ।

“क्या वे भी एक दूसरे से उकता जाएंगे?” लड़की भी वैसा ही सवाल पूछती और लड़का कुछ कहे, इससे पहले ही स्वयं कह देती, ‘वे उकताएंगे नहीं, वे कुछ महीनों के लिए एक-दूसरे से अलग हो जाया करेंगे ।”

“कुछ घण्टों के लिए अलग हो जाया करेंगे ।” लड़का कहता, ‘मगर मुझे लगता है अंत में हमारा हश्र भी वही होगा, जो लोगों का हुआ है।”

“लोगों का हश्र हुआ है?” लड़की पूछती ।

लड़का टाल जाता (हंसकर टाल जाता बात) और उसके साथ सटकर बैठ जाता ।

जैसा मैंने शुरू में कहा था, लड़की होशियार है, उसने ऐसे क्षणों में ही लड़के को जाना है। ये क्षण न आते तो वह अपने बाप को यह भी न बता पाती कि लड़के की उम्र और तनख्वाह कितनी है। इन बातों का उत्तर देते समय लड़का झूठ नहीं बोलता, मगर चौंक जरूर जाता है, जैसे कॉक्रोच की तरह कोई सच उसकी ओर बढ़ रहा हो । उसे लगता है, लड़की जैसे उससे शादी करने के बारे में सोच रही है। उसने हमेशा चीजों को जानना चाहा है, वह इस बात की भी पुष्टि करना चाहता, मगर वह पाता, लड़की उससे सटकर बैठी है । वह लड़की से सटकर बैठा है।

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