Tagada by Munshi Premchand
Tagada by Munshi Premchand

चवन्नी निकालकर सेठजी ने उसके सामने ऐसे गर्व से फेंकी, मानो इसकी उनके सामने कोई हकीकत नहीं है। सुंदरी के मुँह का भाव तो देखना चाहते थे, पर डरते थे कि कहीं वह यह न समझे, लाला चवन्नी क्या दे रहे हैं, मानों किसी को मोल ले रहे हैं।

इक्केवाला चवन्नी उठाकर जा रहा था कि सुंदरी ने कहा- सेठजी की चवन्नी लौटा दो। लपक कर उठा ली। शर्म नहीं आती। यह मुझसे रुपया ले लो। आठ आने की ताजी मिठाई बनवाकर लाओ।

उसने रुपया निकालकर फेंका। सेठजी मारे लाज के लाड़ गये। एक इक्केवान की भठियारिन, जिसकी टके की भी औकात नहीं, इतनी खातिरदारी करे कि उनके लिए पूरा रुपया निकालकर दे दे, वह भला कैसे सह सकते थे? बोले-नहीं-नहीं, यह नहीं हो सकता। तुम अपना रुपया रख लो (रसिक आंखों को तृप्त करके) मैं रुपया दिए देता हूँ। यह लो, आठ आने की ले लेना।

इक्केवान तो उधर मिठाई और दाना-चारे की फिक्र में चला, इधर सुंदरी ने सेठ से कहा- यह तो अभी देर में आएगा लाला, तब तक पान तो खाओ।

सेठजी ने इधर-उधर ताक कर कहा- यहाँ तो कोई तम्बोली नहीं है।

सुंदरी उनकी ओर कटाक्ष पूर्ण नेत्रों से देखकर बोली- क्या मेरे लगाए पान तम्बोली के पानों से भी खराब होंगे?

सेठजी ने लज्जित होकर कहा, नहीं-नहीं, यह बात नहीं। तुम मुसलमान हो न? सुन्दरी ने विनोदपूर्ण आग्रह से कहा- खुदा की कसम, इसी बात पर मैं तुम्हें पान खिलाकर छोडूंगी।

यह कहकर उसने पानदान से एक बीड़ा निकाला और सेठजी की तरफ चली। सेठजी ने एक मिनट तक तो, हाँ! हां! किया, फिर दोनों हाथ बढ़ाकर उसे हटाने की चेष्टा की, फिर जोर से दोनों होंठ बंद कर लिये, पर जब सुंदरी किसी तरह न मानी, तो सेठजी अपना धर्म लेकर बेतहाशा भागे। सोंटा वहीं चारपाई पर रह गया। बीस कदम पर जाकर रुक गये और हांफ कर बोले- देखो, इस तरह किसी का धर्म नहीं लिया जाता। हम लोग तुम्हारा छुआ पानी भी पी लें तो धर्म भ्रष्ट हो जाए।

सुन्दरी ने फिर दौड़ाया। सेठजी फिर भागे। इधर पचास वर्ष से उन्हें इस तरह भागने का अवसर न पड़ा था। धोती खिसककर गिरने लगी, मगर इतना अवकाश न था कि धोती बाँध लें। बेचारे धर्म को कंधे पर रखे दौड़े चले जाते थे। न मालूम कब कमर से रुपयों का बटुआ खिसक पड़ा। जब एक पचास कदम पर फिर रुके और धोती ऊपर उठायी, तो बटुआ नदारद। पीछे फिरकर देखा। सुंदरी हाथ में बटुआ लिये, उन्हें दिखा रही थी और इशारे से बुला रही थी। मगर सेठजी को धर्म रुपये से कहीं प्यारा था। दो-चार कदम चले, फिर रुक गये।

एकाएक धर्म-बुद्धि ने डाँट बतायी। थोड़े रुपये के लिए धर्म छोड़ देते हो। रुपये बहुत मिलेंगे। धर्म कहां मिलेगा?

यह सोचते हुए वह अपनी राह चले, जैसे कोई कुत्ता झगड़ालू कुत्तों के बीच से आहत, दुम दबाए भागा जाता हो और बार-बार पीछे पलटकर देख लेता हो कि कहीं वे दुष्ट आ तो नहीं रहे हैं।

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