praayashchitt by munshi premchand
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‘छुरी फेर ली।’

‘जी हां, आज सबेरे मालूम हुआ। पुलिसवाले जमा हैं। आपको बुलाया है।’

‘लाश अभी पड़ी हुई है?’

‘जी हां, अभी डॉक्टरी होनेवाली है?’

‘बहुत से लोग जमा हैं?’

‘सब बड़े-बड़े अफसर जमा हैं। हुजूर, लाश की ओर ताकते नहीं बनता। कैसा भलामानुष हीरा आदमी था। सब लोग रो रहे हैं। छोटे-छोटे दो बच्चे हैं, एक सयानी लड़की है व्याहने लायक। बहूजी को लोग कितना रोक ले है पर बार-बार दौड़कर लाश के पास आ जाती हैं। कोई ऐसा नहीं है, जो रूमाल से- आंखें न पोंछ रहा हो। अभी कितने ही दिन आये हुए पर सबसे कितना मेल-जोल हो गया था। रुपये की तो कभी परवाह नहीं थी। दिल दरियाव था?’ मुरारीलाल के सिर में चक्कर आने लगा? द्वार की चौखट पकड़कर अपने को संभाल न लेते, तो शायद गिर पड़ते। पूछा – ‘बहूजी रो रही थीं?’

‘कुछ न पूछिए, हुजूर। पेड़ की पत्तियां झड़ी जाती हैं। आंखें फूलकर गूलर हो गई हैं।’ ‘कितने लड़के बतलाए तुमने?’

‘हुजूर,दो लड़के हैं और एक लड़की।’

‘हां-हां, लड़कों को तो देख चुका हूं, लड़की सयानी होगी?’

‘जी हां, ब्याहने लायक है। रोते-रोते बेचारी की आंखें सूज आई हैं।’

‘नोटों के बारे में भी बातचीत हो रही होगी?’

‘जी हां, सब लोग यही कहते हैं, दफ्तर के किसी आदमी का काम है। दारोगाजी तो सोहनलाल को गिरफ्तार करना चाहते थे, पर शायद आपसे सलाह लेकर करेंगे। सेक्रेट्री साहब तो लिख गए हैं कि मेरा किसी पर शक नहीं है।’

‘क्या सेक्रेट्री साहब कोई खत लिखकर छोड़ गए।’

‘हां, मालूम होता है, छुरी चलाते वक्त याद आई हो कि सुबह में दफ्तर के सब लोग पकड़ जायेंगे। बस, कलेक्टर साहब के नाम चिट्ठी लिख दी।’

‘चिट्ठी में मेरे बारे में कुछ लिखा है?. ..तुम्हें यह क्या मालूम होगा?’

‘हुजूर, अब मैं क्या जानूं, मुदा इतना सब लोग कहते थे कि आपकी बड़ी तारीफ लिखी है।’

मुरारी की सांस और तेज हो गई। आंखों से आंसू की दो बड़ी-बड़ी बूंदें गिर पड़ी। आंखें पोंछते हुए बोले – ‘वे और मैं एक साथ के पढ़े थे, नन्दू। आठ-दस साल साथ रहा। साथ उठते-बैठते, साथ खाते, साथ खेलते। बस, इसी तरह रहते थे, जैसे दो सगे भाई रहते हों। अंत में मेरी क्या तारीफ लिखी है? मगर तुम्हें क्या मालूम होगा।’

‘आप तो चल ही रहे हैं, देख लीजिएगा।’

‘कफ़न का इंतजाम हो गया है?’

‘नहीं हुजूर, कहा न कि अभी लाश की डॉक्टरी होगी। मुदा अब जल्दी चलिए। ऐसा न हो, कोई दूसरा आदमी बुलाने आता हो।’

‘हमारे दफ्तर के सब लोग आ गए होंगे?’

‘जी हां, इस मुहल्ले वाले तो सभी थे।’

‘पुलिस ने मेरे बारे में तो उनसे कुछ पूछताछ नहीं की।’

‘जी नहीं, किसी से भी नहीं।’

मुरारीलाल जब सुबोध के घर पहुंचे, तब उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि सब लोग उनकी तरफ संदेह की आंखों से देख रहे हैं। पुलिस इंस्पेक्टर ने तुरंत उन्हें बुलाकर कहा – ‘आप भी अपना बयान लिखा दें और सबके बयान तो लिख चुका हूं।’ –

मुरारीलाल ने ऐसी सावधानी से अपना बयान लिखाया कि पुलिस के अफसर भी दंग रह गए। उन्हें मुरारीलाल पर शुबहा होता था, पर इस बयान ने उसका अंकुर भी निकाल डाला। इसी वक्त सुबोध के दोनों बालक रोते हुए मुरारीलाल के पास आये और कहा – ‘चलिए, आपको अम्मा बुलाती हैं।’ दोनों मुरारीलाल से परिचित थे। मुरारीलाल यहां तो रोज ही आते थे, पर घर में कभी नहीं गए थे। सुबोध की स्त्री उनसे पर्दा करती थी। यह बुलावा सुनकर उनका दिल धड़क उठा – कहीं इसका मुझ पर शुबहा न हो। कहीं सुबोध ने मेरे विषय में कोई संदेह न प्रकट किया हो। कुछ झिझकते हुए, कुछ डरते हुए भीतर गये, तब विधवा का करुण-विलाप सुनकर कलेजा कांप उठा। उन्हें देखते ही उस अबला के आंसुओं का कोई दूसरा सोता खुल गया। और लड़की तो दौड़कर इनके पैरों से लिपट गई। दोनों लड़कों ने भी घेर लिया। मुरारीलाल को उन तीनों की आंखों में ऐसी अथाह वेदना, ऐसी हृदय-विदारक याचना भरी हुई मालूम हुई कि वे उनकी ओर देख न सके। उनकी आत्मा उन्हें धिक्कारने लगी। जिन बेचारों को उन पर इतना विश्वास, इतना भरोसा, इतनी आत्मीयता, इतना स्नेह था, उन्हीं की गर्दन पर उन्होंने छुरी फेरी। उन्हीं के हाथों यह भरा-पूरा परिवार धूल में मिल गया। इन असहायों का अब क्या हाल होगा? लड़की का विवाह करना है, कौन करेगा? बच्चों के लालन-पालन का भार कौन उठाएगा मुरारीलाल को इतनी आत्मग्लानि हुई कि उनके मुंह से तसल्ली का एक शब्द भी न निकला। उन्हें ऐसा जान पड़ा कि मेरे सुख में कालिख पूति है, मेरा कद कुछ छोटा हो गया है। उन्होंने जिस वक्त नोट उड़ाए थे, उन्हें गुमान भी न था कि उसका यह हश्र होगा। केवल सुबोध की बेइज्जत करना चाहते थे। उनका सर्वनाश करने की इच्छा न थी।

शोकातुर विधवा ने सिसकते हुए कहा – ‘भैयाजी, हम लोगों को वे मझधार में छोड़ गए। अगर मुझे मालूम होता कि मन में यह बात ठान चुके हैं तो अपने पास जो कुछ था, वह सब उनके चरणों पर रख देती। मुझसे तो वे यही कहते थे कि कोई-न-कोई उपाय हो जायेगा। आप ही के मार्फत वे कोई महाजन ठीक करना चाहते थे। आपके ऊपर उन्हें कितना भरोसा था कि कह नहीं सकती।’

मुरारीलाल को ऐसा मालूम हुआ कि कोई उनके हृदय- पर नश्तर चला रहा है। उन्हें अपने कंठ में कोई चीज फंसी हुई जान पड़ती थी।

रामेश्वरी ने फिर कहा – ‘रात सोए, तब खूब हंस रहे थे। रोज की तरह दूध पिया, बच्चों को प्यार किया, थोड़ी देर हारमोनियम बजाया और तब कुल्ली करके लेटे। कोई ऐसी बात न थी जिससे लेश-मात्र भी संदेह होता। मुझे चिंतित देखकर बोले – ‘तुम व्यर्थ घबराती हो। बाबू मुरारीलाल से मेरी पुरानी दोस्ती है। आखिर वह किस काम आएंगे? मेरे साथ के खेले हुए हैं। इस नगर में उनका सबसे परिचय है। रुपयों का प्रबंध आसानी से हो जायेगा। फिर न-जाने कब मन में यह बात समायी। मैं नसीब-जली ऐसी सोयी कि रात को मिनकी तक नहीं। क्या जानती थी कि वे अपनी जान पर खेल जायेंगे?’

मुरारीलाल को सारा विश्व आंखों में तैरता हुआ मालूम हुआ। उन्होंने बहुत जब्त किया, मगर आंसुओं के प्रवाह को न रोक सके।

रामेश्वरी ने आंखें पोंछकर फिर कहा – ‘भैयाजी, जो कुछ होना था, वह तो हो चुका, लेकिन आप उस दुष्ट का पता जरूर लगाइए, जिसने हमारा सर्वनाश कर दिया है। यह दफ्तर ही के किसी आदमी का काम है। वे तो देवता थे। मुझसे यही कहते रहे कि मेरा किसी पर संदेह नहीं है, पर है यह किसी दफ्तर वाले ही का काम। आपसे केवल इतनी विनती करती हूं कि उस पापी को बचकर न जाने दीजिएगा।’ पुलिसवाले शायद कुछ रिश्वत लेकर उसे छोड़ दें। आपको देखकर उनका यह हौसला न होगा। अब हमारे सिर पर आपके सिवा और कौन है? किससे अपना दुःख कहें? लाश की यह दुर्गति होनी भी लिखी थी।

मुरारीलाल के मन में एक बार ऐसा उबाल उठा कि सब कुछ खोल दें। साफ कह दें;,मैं ही वह दुष्ट, वह अधम, वह पामर हूं। विधवा के पैरों पर गिर पड़ें और कहें, वह छुरी इस हत्यारे की गर्दन पर फेर दो। पर जबान न खुली, इसी दशा में बैठे-बैठे उनके सिर में ऐसा चक्कर आया कि वे जमीन पर गिर पड़े।

तीसरे पहर लाश की परीक्षा समाप्त हुई। अर्थी जलाशय की ओर चली। सारा दफ्तर, सारे हुक्काम और हजारों आदमी साथ थे। दाह-संस्कार लड़कों को करना चाहिए था, पर लड़के नाबालिग थे इसलिए विधवा चलने को तैयार हो रही थी कि मुरारीलाल ने जाकर कहा – ‘बहूजी, यह संस्कार मुझे करने दो। तुम क्रिया पर बैठ जाओगी, तो बच्चों को कौन संभालेगा? सुबोध मेरे भाई थे। जिंदगी में उनके साथ कुछ सलूक न कर सका, अब जिंदगी के बाद मुझे दोस्ती का कुछ हक अदा कर लेने दो। आखिर मेरा भी तो उन पर कुछ हक था। ‘रामेश्वरी ने रोककर कहा – ‘आपको भगवान् ने बड़ा उदार हृदय दिया है भैयाजी, नहीं तो मरने पर कौन किसको पूछता है? दफ्तर के और लोग, जो आधी-आधी रात तक हाथ बांधे खड़े रहते थे, झूठी बात पूछने न आये कि जरा ढाढस होता।’

मुरारीलाल ने दाह-संस्कार किया। तेरह दिन तक क्रिया पर बैठे रहे। तेरहवें दिन पिंडदान हुआ, ब्राह्मणों ने भोजन किया, भिखारियों को अन्नदान दिया गया, मित्रों की दावत हुई, और यह सब कुछ मुरारीलाल ने अपने खर्च से किया। रामेश्वरी ने बहुत कहा कि आपने जितना किया, उतना ही बहुत है। अब मैं आपको और जेरबार नहीं करनी चाहती। दोस्ती का हक इससे ज्यादा और कोई क्या अदा करेगा, मगर मुरारीलाल ने एक न सुनी। सारे शहर में उनके यश की धूम मच गई, मित्र हो, तो ऐसा हो।

सोलहवें दिन विधवा ने मुरारीलाल से कहा – ‘भैयाजी, आपने हमारे साथ जो उपकार का अनुग्रह किए हैं, उनसे हम मरते दम तक उऋण नहीं हो सकते। आपने हमारी पीठ पर हाथ न रखा होता, तो न-जाने हमारी क्या गति होती। कहीं रुख की भी छांह तो नहीं थी। अब हमें घर जाने दीजिए। वहां देहात में खर्च भी कम होगा और कुछ खेती-बारी का सिलसिला भी कर लूंगी। किसी-न-किसी तरह विपत्ति के दिन कट ही जायेंगे। इसी तरह हमारे ऊपर दया रखिएगा।’

मुरारीलाल ने पूछा – ‘घर पर कितनी जायदाद है?’

रामेश्वरी – ‘जायदाद क्या है, एक कच्चा मकान है और दस-बारह बीघे की काश्तकारी है। पक्का मकान बनवाना शुरू किया था, मगर रुपये पूरे न पड़े। अभी अधूरा पड़ा हुआ है। दस बारह हजार खर्च हो गए और अभी छत पड़ने की नौबत नहीं आयी।’

मुरारी – ‘कुछ रुपये बैंक में जमा हैं, या बस खेती ही का सहारा है?’

विधवा – ‘जमा तो एक पाई भी नहीं है भैयाजी, उनके हाथ में रुपये रहने ही नहीं पाते थे। बस, वही खेती का सहारा है।’

मुरारी – ‘तो उन खेतों में इतनी पैदावार हो जायेगी कि लगान भी अदा हो जाय और तुम लोगों की गुजर-बसर भी हो?’

रामेश्वरी – ‘और कर ही क्या सकते हैं, भैयाजी! किसी-न-किसी तरह जिंदगी तो काटनी ही है। बच्चे न होते, तो मैं जहर खा लेती।’

मुरारी – ‘और अभी बेटी का विवाह भी तो करना है?’

विधवा उसके विवाह की अब कोई चिंता नहीं। किसानों में ऐसे बहुत से मिल जायेंगे, जो बिना कुछ लिये-दिये विवाह कर लेंगे।’

मुरारीलाल ने एक क्षण सोचकर कहा – ‘अगर मैं कुछ सलाह दूं तो उसे मानेंगी आप?’ रामेश्वरी – ‘भैयाजी, आपकी सलाह न मानूंगी तो किसकी सलाह मानूंगी। और दूसरा है ही कौन?’

मदारी – ‘तो आप अपने घर जाने के बदले मेरे घर चलिए। जैसे मेरे बाल-बच्चे रहेंगे, वैसे ही आपके भी रहेंगे। आपको कष्ट न होगा। ईश्वर ने चाहा, तो कन्या का विवाह भी किसी अच्छे कुल में हो जायेगा।’

विधवा की आंखें सजल हो गई। बोली – ‘मगर भैयाजी, सोचिए..’.

मुरारीलाल ने बात काटकर कहा – ‘मैं कुछ न सोचूंगा और न कोई बहाना सुनूंगा। क्या दो भाइयों के परिवार एक साथ नहीं रहते? सुबोध को मैं अपना भाई समझता था और हमेशा समझूंगा।’

विधवा का कोई बहाना न सुना गया। मुरारीलाल सबको अपने साथ ले गए और आज दस साल से उनका पालन कर रहे हैं। दोनों बच्चे कॉलेज में पढ़ते हैं और कन्या का एक प्रतिष्ठित कुल में विवाह हो गया है। मुरारीलाल और उनकी स्त्री तब-मन से रामेश्वरी की सेवा करते हैं और उनके इशारों पर चलते हैं। मुरारीलाल सेवा से अपने पाप का प्रायश्चित कर रहे हैं।