गोदावरी को रात भर नींद नहीं आयी थी, दुराशा और पराजय की कठिन यंत्रणा किसी कोड़े की तरह उसके हृदय पर पड़ रही थी। ऐसा मालूम होता था कि उसके कंठ में कोई कड़वी चीज अटक गई है। मिस्टर सेठ को अपने प्रभाव में लाने की उसने वह सब योजनाएं की, जो एक रमणी कर सकती है, पर उस भले आदमी पर उसके सारे हाव-भाव, मृदु-मुस्कान और वाणी-विलास का कोई असर न हुआ। खुद तो स्वदेशी वस्त्रों के व्यवहार करने पर क्या राजी होते, गोदावरी के लिए एक खद्दर की साड़ी लाने पर भी सहमत न हुए। यहां तक कि गोदावरी ने उनसे कभी कोई चीज मांगने की कसम खा ली।
क्रोध और ग्लानि ने उसकी सद्भावनाओं को इस तरह विकृत कर दिया, जैसे कोई मैली वस्तु निर्मल जल को दूषित कर देती है। उसने सोचा, जब यह मेरी इतनी-सी बात नहीं मान सकते, तब फिर मैं क्यों इनके इशारों पर चलूं, क्यों इनकी इच्छाओं की लौंडी बनी रहूं? मैंने इनके हाथ अपनी आत्मा नहीं बेची है। अगर आज ये चोरी या गबन करें तो क्या मैं सजा पाऊंगी उसकी सजा ये खुद झेलेंगे। उसका अपराध इनके ऊपर होगा। इन्हें अपने कर्म और वचन का अख्तियार है, मुझे अपने कर्म और वचन का अख्तियार। यह अपनी सरकार की गुलामी करें, अंग्रेजों की चौखट पर नाक रगड़ें, मुझे क्या गरज है कि उसमें उनका सहयोग करूं। जिसमें आत्माभिमान नहीं, जिसने अपने को स्वार्थ के हाथों बेच दिया, उसके प्रति अगर मेरे मन में भक्ति न हो, तो मेरा दोष नहीं। यह नौकर हैं या गुलाम, नौकरी और गुलामी में अंतर है। नौकर कुछ नियमों के अधीन अपना निर्दिष्ट काम करता है। वह नियम स्वामी और सेवक दोनों ही पर लागू होता है। स्वामी अगर अपमान करे, अपशब्द कहे तो नौकर उसको सहन करने के लिए मजबूर नहीं। गुलाम के लिए कोई शर्त नहीं, उसकी दैहिक गुलामी पीछे होती है, मानसिक गुलामी पहले ही हो जाती है। सरकार ने इनसे कब कहा है कि देशी चीजें न खरीदें। सरकारी टिकट तक पर यह शब्द लिखे होते है ‘स्वदेशी चीजें खरीदो।’ इससे विदित है कि सरकार देशी चीजों का निषेध नहीं करती, फिर भी यह महाशय सुर्खरू बनने की फिक्र में सरकार से भी दो अंगुल आगे बढ़ना चाहते हैं।
मिस्टर सेठ ने कुछ झेंपते हुए कहा – ‘कल फ्लावर शो देखने चलोगी?’
गोदावरी ने विरक्त अब से कहा – ‘नहीं।’
‘बहुत अच्छा तमाशा है।’
‘मैं कांग्रेस के जलसे में जा रही हूं।’
मिस्टर सेठ के ऊपर यदि छत गिर पड़ी होती या उन्होंने बिजली का तार हाथ से पकड़ लिया होता, तो भी वह इतने बदहवास न होते। आंखें फाड़कर बोले – ‘तुम कांग्रेस के जलसे में जाओगी?’
‘हां, जरूर जाऊंगी।’
‘मैं नहीं चाहता कि तुम वहां जाओ।’
‘अगर तुम मेरी परवाह नहीं करते, तो मेरा धर्म नहीं कि तुम्हारी हर एक आज्ञा का पालन करूं।
मिस्टर सेठ ने आंखों में विष भरकर कहा – ‘नतीजा बुरा होगा।’
गोदावरी मानो तलवार के सामने छाती खोलकर बोली – ‘इसकी चिंता नहीं, तुम किसी के ईश्वर नहीं हो।’
मिस्टर सेठ खूब गर्म पड़े, धमकियां दी, आखिर मुंह फेरकर लेट रहे। प्रातःकाल फ्लावर शो जाते समय भी उन्होंने गोदावरी से कुछ न कहा।
गोदावरी जिस समय कांग्रेस के जलसे में पहुंची, तो कई हजार मर्दों और औरतों का जमाव था। मंत्री ने चंदे की अपील की थी और कुछ लोग चंदा दे रहे थे। गोदावरी उस जगह खड़ी हो गई, जहां और स्त्रियां जमा थी और देखने लगी कि लोग क्या देते है। अधिकांश लोग दो-दो चार-चार आना ही दे रहे थे। वहां ऐसा धनवान था ही कौन? उसने अपनी जेब टटोली, तो एक रुपया निकला। उसने समझा, यह काफी है। इसी इंतजार में थी कि झोली सामने आवे तो उसमें डाल दूं? सहसा वही अंधा लड़का जिसे कि उसने पैसा दिया था, न जाने किधर से आ गया और ज्यों ही चंदे की झोली उसके सामने पहुंची, उसने उसमें कुछ डाल दिया। सबकी आंखें उसकी तरफ उठ गई। सबको कुतूहल हो रहा था कि अंधे ने क्या दिया? कहीं एक आधा पैसा मिल गया होगा। दिन भर गला फाड़ता है, तब भी तो उस बेचारे को रोटी नहीं मिलती। अगर यही गाना पिश्वाज और साज के साथ किसी महफिल में होता तो रुपये बरसते, लेकिन सड़क पर गाने वाले अंधे की कौन परवाह करता है।
झोली में पैसा डालकर अंधा वहां से चल दिया और कुछ दूर जाकर गाने लगा –
‘वतन की देखिए तकदीर कब बदलती है।’
सभापति ने कहा – ‘मित्रों देखिए, यह वह पैसा है, जो एक गरीब अंधा लड़का इस झोली में डाल गया है। मेरी आंखों में इस एक पैसे की कीमत किसी अमीर के एक हजार रुपये से कम नहीं। शायद यही इस गरीब की सारी बिसात होगी। जब ऐसे गरीबों की सहानुभूति हमारे साथ है, तो मुझे सत्य की विजय में कोई संदेह नहीं मालूम होता। हमारे यहां क्यों इतने फकीर दिखाई देते हैं? या तो इसलिए कि समाज में इनके लिए कोई काम नहीं रह गया कि कुछ काम करें या भिक्षा-वृत्ति ने इनमें सामर्थ्य ही नहीं छोड़ी। स्वराज्य के सिवा इन गरीबों का अब उद्धार कौन कर सकता है? देखिए, वह गा रहा है’ –
‘वतन की देखिए तकदीर कब बदलती।’
इस पीड़ित हृदय में कितना उत्सर्ग है! क्या अब भी कोई संदेह कर सकता है कि यह किसकी आवाज है? (पैसा ऊपर उठाकर) आपमें कौन इस रत्न को खरीद सकता है?
गोदावरी के मन में जिज्ञासा हुई, कहीं वह वही पैसा तो नहीं है, जो रात मैंने उसे दिया था? क्या उसने सचमुच रात को कुछ नहीं खाया?
उसने जाकर समीप से पैसे को देखा, जो मेज़ पर रख दिया गया था। उसका हृदय धक से हो गया। यह वही घिसा हुआ पैसा था।
उस अंधे की दशा, उसके त्याग का स्मरण करके गोदावरी अनुरक्त हो उठी। कांपते हुए स्वर में बोली – ‘मुझे आप यह पैसा दे दीजिए, मैं पांच रुपये दूंगी।’
सभापति ने कहा – ‘एक बहन इस पैसे के दाम पांच रुपये दे रही हैं।’
दूसरी आवाज आयी – ‘दस रुपये।’
तीसरी आवाज आयी – ‘बीस रुपये।’
गोदावरी ने इस अंतिम व्यक्ति की ओर देखा। उसके मुख पर आत्माभिमान झलक रहा था, मानो कह रहा हो कि यहां कौन है, जो मेरी बराबरी कर सके! गोदावरी के मन में स्पर्धा का भाव जाग उठा। चाहे कुछ हो जाये, इसके हाथ में यह पैसा न जाये समझता है, इसने बीस रुपये क्या कह दिए, सारे संसार को मोल ले लिया।
गोदावरी ने कहा – ‘चालीस रुपये।’
