patnee se pati by munshi premchand
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उस पुरुष ने तुरंत कहा – ‘पचास रुपये।’

हजारों आंखें गोदावरी की ओर उठ गई, मानो कह रही हों, अब आप ही हमारी लाज रखिए।

गोदावरी ने उस आदमी की ओर देखकर धमकी से मिले हुए स्वर में कहा – ‘सौ रुपये।’

धनी आदमी ने भी तुरंत कहा – ‘एक सौ बीस रुपये।’

लोगों के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। समझ गए, इसी के हाथ विजय रही। निराश आंखों से गोदावरी की ओर ताकने लगे, मगर ज्यों ही गोदावरी के मुंह से निकला डेढ़ सौ, कि चारों तरफ से तालियां पड़ने लगी, मानो किसी दंगल के दर्शक अपने पहलवान की विजय पर मतवाले हो गए हों।

उस आदमी ने फिर कहा – ‘पौने दो सौ।’

‘दो सौ।’

फिर चारों तरफ से तालियां पड़ी। प्रतिद्वन्द्वी ने अब मैदान से हट जाने ही में अपनी कुशल समझी।

गोदावरी विजय के गर्व पर नम्रता का पर्दा डाले हुए खड़ी थी और हजारों शुभ कामनाएं उस पर फूलों की तरह बरस रही थी।

जब लोगों को मालूम हुआ कि यह देवी मिस्टर सेठ की बीवी हैं, तो उन्हें एक ईर्ष्यामेव आनंद के साथ उस पर दया भी आयी।

मिस्टर सेठ अभी फ्लावर शो में ही थे कि एक पुलिस अफसर ने उन्हें यह घातक संवाद सुनाया। मिस्टर सेठ सकते में पड़ गए, मानो सारी देह शून्य पड़ गई हो। फिर दोनों मुट्ठियां बांध ली। दांत पीसे, ओठ चबाये और उसी वक्त घर चले। उनकी मोटर-साइकिल कभी इतनी तेज न चली थी।

घर में कदम रखते ही उन्होंने चिनगारियां-भरी आंखों से देखते हुए कहा – ‘क्या तुम मेरे मुंह में कालिख पुतवाना चाहती हो?’

गोदावरी ने शांत भाव से कहा – ‘कुछ मुंह से तो कहो या गालियां ही दिए जाओगे? तुम्हारे मुंह में कालिख लगेगी, तो क्या मेरे मुंह में न लगेगी? तुम्हारी जड़ झुकेगी, तो मेरे लिए दूसरा कौन-सा सहारा है?’

मिस्टर सेठ – ‘सारे शहर में तूफान मचा हुआ है। तुमने मेरे रुपये लिये क्यों?’

गोदावरी ने उसी शांत भाव से कहा – ‘इसलिए कि मैं उसे अपना ही रुपया समझती हूं।’

मिस्टर सेठ दांत किटकिटाकर बोले – ‘हरगिज नहीं, तुम्हें मेरा रुपया खर्च करने का कोई हक नहीं है।’

गोदावरी – ‘बिलकुल गलत, तुम्हारे रुपये खर्च करने का तुम्हें जितना अख्तियार है उतना ही मुझको भी है। हां, जब तलाक का कानून पास करा लोगे और तलाक दे दोगे, तब न रहेगा।’

मिस्टर सेठ ने अपना हैट इतने जोर से मेज़ पर फेंका कि वह लुढ़कता हुआ जमीन पर गिर पड़ा और बोले, ‘मुझे तुम्हारी अक्ल पर अफसोस आता है। जानती हो, तुम्हारी इस उद्दंडता का क्या नतीजा होगा? मुझसे जवाब तलब हो जायेगा। बतलाओ, क्या जवाब दूंगा? जब यह जाहिर है कि कांग्रेस सरकार से दुश्मनी कर रही है तो कांग्रेस की मदद करना सरकार के साथ दुश्मनी करना है।’

‘तुमने तो नहीं की कांग्रेस की मदद।’

‘तुमने तो की।’

‘इसकी सजा मुझे मिलेगी या तुम्हें? अगर मैं चोरी करूं, तो क्या तुम जेल जाओगे?’

‘चोरी की बात और है, यह बात और है।’

‘तो क्या कांग्रेस की मदद करना चोरी या डाके से भी कहीं बुरा है।’

‘हां, सरकारी नौकर के लिए चोरी या डाके से भी कहीं बुरा है।’

‘मैंने यह नहीं समझा था।’

‘अगर तुमने यह नहीं समझा था, तो तुम्हारी ही बुद्धि का भ्रम था। रोज अखबारों में देखती हो, फिर भी मुझसे पूछती हो। एक कांग्रेस का आदमी प्लेटफार्म पर बोलने खड़ा होता है, तो बीसियों सादे कपड़े वाले पुलिस अफसर उसकी रिपोर्ट लेने बैठे हैं। कांग्रेस के सरगनाओं के पीछे कई-कई मुखबिर लगा दिए जाते हैं, जिनका काम यही है कि उन पर कड़ी निगाह रखें। चोरों के साथ तो इतनी सख्ती कभी नहीं की जाती। इसलिए हजारों चोरियां, डाके और खून रोज होते रहते हैं, किसी का कुछ पता नहीं चलता, न पुलिस इसकी परवाह करती है। अगर पुलिस को जिस मामले में राजनीति की गंध भी आ जाती है, फिर देखो पुलिस की मुस्तैदी। इंस्पेक्टर जनरल से लेकर कांस्टेबल तक एड़ियों तक का जोर लगाते है। सरकार को चोरों से भय नहीं। चोर सरकार पर चोट नहीं करता। कांग्रेस सरकार के अख्तियार पर हमला करती है, इसलिए सरकार भी अपनी रक्षा के लिए अपने अख्तियार से काम लेती है। यह तो प्रकृति का नियम है।’

मिस्टर सेठ आज दफ्तर चले, तो उनके कदम पीछे रहे जाते थे! न जाने आज वहां क्या हाल हो। रोज की तरह दफ्तर पहुंचकर उन्होंने चपरासियों को डांट नहीं, क्लर्कों पर रोब नहीं जमाया, चुपके से जाकर कुर्सी पर बैठ गए। ऐसा मालूम होता था, कोई तलवार सिर पर लटक रही है। साहब की मोटर की आवाज सुनते ही उनके प्राण सूख गए। रोज वह कमरे में बैठे रहते थे। जब साहब आकर बैठ जाते थे, तब आधा घंटे के बाद फाइलें लेकर पहुंचते थे। आज वह बरामदे में खड़े थे, साहब उतरे तो झुककर उन्होंने सलाम किया। मगर साहब ने मुंह फेर लिया।

लेकिन वह हिम्मत नहीं हारे। आगे बढ़कर पर्दा हटा दिया। साहब कमरे में गए तो सेठ साहब ने पंखा खोल दिया, मगर जान सूखी जाती थी कि देखें, कब सिर पर तलवार गिरती है। साहब ज्यों ही कुर्सी पर बैठे, सेठ ने लपक कर सिगार केस और दियासलाई मेज़ पर रख दी।

एकाएक ऐसा मालूम हुआ, मानो आसमान फट गया हो। साहब गरज रहे थे – ‘तुम दगाबाज आदमी है।’

सेठ ने इस तरह साहब की ओर देखा, जैसे उनका मतलब नहीं समझे।

साहब ने फिर गरज कर कहा – ‘तुम दगाबाज आदमी है।’

मिस्टर सेठ का खून गर्म हो उठा, बोले – ‘मेरा तो ख्याल है कि मुझसे बड़ा राजभक्त इस देश में न होगा।’

साहब – ‘तुम नमक-हराम आदमी है।’

मिस्टर सेठ के चेहरे पर सुर्खी आई – ‘आप मेरी बेइज्जती कर रहे हैं। ऐसी बातें सुनने की मुझे आदत नहीं है।’

साहब – ‘चुप रहो, यू ब्लड़ी। तुमको सरकार पांच सौ रुपये इसलिए नहीं देता कि तुम अपने वाइफ के हाथ से कांग्रेस को चंदा दिलाओ। तुमको इसलिए सरकार रुपया नहीं देता।’

मिस्टर सेठ को अब अपनी सफाई देने का अवसर मिला। बोले – ‘मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मेरी वाइफ ने सरासर मेरी मर्जी के खिलाफ रुपये दिए हैं। मैं तो उस वक्त शो देखने गया था, जहां मिस फ्राक का गुलदस्ता पांच रुपये में लिया। वहां से लौटा, तो मुझे यह खबर मिली।’

साहब – ‘ओ तुम हमको बेवकूफ बनाता है?’

यह बात अग्नि-शिखा की भांति ज्यों ही साहब के मस्तिष्क में घुसी, उनके मिज़ाज पर पारा उबाल के दर्जे तक पहुंच गया। किसी हिंदुस्तानी की इतनी मजाल कि उन्हें बेवकूफ बनाए। वह जो हिंदुस्तान के बादशाह हैं, जिनके पास बड़े-बड़े ताल्लुकेदार सलाम करने आते हैं, जिनके नौकरों को बड़े-बड़े रईस नजराना देते है, उन्हीं को कोई बेवकूफ बनाए। उसके लिए वह असह्य था। रूल उठकर दौड़ा।

लेकिन मिस्टर सेठ भी मजबूत आदमी थे। यों वह हर तरह की खुशामद किया करते थे, लेकिन यह अपमान स्वीकार न कर सके। उन्होंने रूल को तो हाथ पर लिया और एक डग आगे बढ़कर ऐसा घूंसा साहब के मुंह पर रसीद किया कि साहब की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। वह इस मुष्ठप्रहार के लिए तैयार न थे। उन्हें कई बार इसका अनुभव हो चुका था कि नेटिव बहुत शांत, दब्बू और गमखोर है। विशेषकर साहबों के सामने तो उसकी जबान तक नहीं खुलती। कुर्सी पर बैठकर नाक का खून पोंछने लगा। फिर मिस्टर सेठ से उलझने की उसकी हिम्मत न पड़ी, मगर दिल में सोच रहा था, इसे कैसे नीचा दिखाऊं।

मिस्टर सेठ भी अपने कमरे में आकर इस परिस्थिति पर विचार करने लगे। उन्हें बिलकुल खेद न था बल्कि वह अपने साहस पर प्रसन्न थे। इसकी बदमाशी तो देखो कि मुझ पर रूल चला दिया। जितना दबता था, उतना ही दबाए जाता था। मेम यारों को लिए घूमा करती है, उससे बोलने की हिम्मत नहीं पड़ती। मुझसे शेर बन गया। अब दौड़ेगा कमिश्नर के पास। मुझे बर्खास्त कराए बगैर न छोड़ेगा। यह सब कुछ गोदावरी के कारण हो रहा है। बेइज्जती तो हो ही गई। अब रोटियों को भी मोहताज होना पड़ा। मुझसे तो कोई पूछेगा भी नहीं, बरखास्तगी का परवाना आ जाएगा। अपील कहां होगी। सेक्रेट्री हैं हिंदुस्तानी, मगर अंग्रेजों से भी ज्यादा अंग्रेज। होम मेम्बर भी हिंदुस्तानी है, मगर अंग्रेजों के गुलाम। गोदावरी के चंदे का हाल सुनते ही उन्हें जुड़ी चढ़ आएगी। न्याय की किसी से आशा नहीं, अब यहां से निकल जाने में ही कुशल है।

उन्होंने तुरंत एक इस्तीफा लिखा और साहब के पास भेज दिया। साहब ने उस पर लिख दिया, ‘बरखास्त’।