Posted inमुंशी प्रेमचंद की कहानियां, हिंदी कहानियाँ

मर्यादा की वेदी – मुंशी प्रेमचंद

यह वह समय था जब चित्तौड़ में मृदुभाषिणी मीरा प्यासी आत्माओं को ईश्वर-प्रेम के प्याले पिलाती थी। रणछोड़जी के मंदिर में जब भक्ति से विह्वल होकर वह अपने मधुर स्वरों में अपने पियूषपूरित पदों को गाती, तो श्रोतागण प्रेमानुराग से उन्मत्त हो जाते। प्रतिदिन यह स्वर्गीय आनन्द उठने के लिए सारे चित्तौड़ के लोग ऐसे […]

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शाप – मुंशी प्रेमचंद

बर्लिन नगर का निवासी हूँ। मेरे पूज्य पिता भौतिक विज्ञान के सुविख्यात ज्ञाता थे। भौगोलिक अन्वेषण का शौक मुझे भी बाल्यावस्था ही से था। उनके स्वर्गवास के बाद मुझे यह धुन सवार हुई कि पैदल पृथ्वी के समस्त देश-देशान्तरों की सैर करूँ। मैं विपुल धन का स्वामी था। वे सब रुपये एक बैंक में जमा […]

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रानी सारंधा – मुंशी प्रेमचंद

अंधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुम-घुम करती हुई चक्कियां। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है, जिसको जंगली वृक्षों ने घेर रखा है। टीले के पूर्व की ओर छोटा-सा गांव है। यह गढ़ी और […]

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त्यागी का प्रेम – मुंशी प्रेमचंद

लाला गोपीनाथ को युवावस्था में ही दर्शन से एम हो गया था। अभी वह इंटरमीडिएट क्लास में थे, कि मिल और वर्कले के वैज्ञानिक विचार उनको कंठस्थ हो गये थे। उन्हें किसी प्रकार के विनोद-प्रमोद से रुचि न थी। यहां तक कि कॉलेज के क्रिकेट-मैचों से भी उनको उत्साह न होता था। हास-परिहास से कोसों […]

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राजा हरदौल – मुंशी प्रेमचंद

बुंदेलखंड में ओरछा पुराना राज्य है। इसके राजा बुंदेले हैं। इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है। एक समय ओरछे के राजा जुझारसिंह थे। ये बड़े साहसी और बुद्धिमान थे। शाहजहां उस समय दिल्ली के बादशाह थे, जब लोदी ने बलवा किया और वह शाही मुल्क को लूटता-पिटता ओरछे की ओर […]

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यह मेरी मातृभूमि है – मुंशी प्रेमचंद

आज पूरे 60 वर्ष के बाद मुझे मातृभूमि-प्यारी मातृभूमि के दर्शन प्राप्त हुए हैं। जिस समय मैं अपने प्यारे देश से विदा हुआ था और भाग्य मुझे पश्चिम की ओर ले चला था, उस समय मैं पूर्ण युवा था। मेरी नसों में नवीन रक्त संचालित हो रहा था। हृदय उमंगों और बड़ी-बड़ी आशाओं से भरा […]

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इस्तीफा – मुंशी प्रेमचंद

दफ्तर का बाबू एक बेजुबान जीव है। मजदूरों को आंखें दिखाओ तो वह त्यौरियां बदलकर खड़ा हो जायेगा। कुली को एक डांट बताओ, तो सिर से बोझ फेंककर अपनी राह लेगा। किसी भिखारी को दुत्कारो, तो तुम्हारी ओर गुस्से की निगाह से देखकर चला जायेगा। यहां तक कि गधा भी कभी-कभी तकलीफ पाकर दुलत्ती झाड़ने […]

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कप्तान साहब – मुंशी प्रेमचंद

जगत सिंह को स्कूल जाना कुनैन खाने या मछली का तेल पीने से कम अप्रिय न था। वह सैलानी, आवारा, घुमक्कड़ युवक थां कभी अमरूद के बागों की ओर निकल जाता और अमरूदों के साथ माली की गालियॉँ बड़े शौक से खाता। कभी दरिया की सैर करता और मल्लाहों को डोंगियों में बैठकर उस पार […]

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प्रायश्चित्त – मुंशी प्रेमचंद

दफ्तर में जरा देर से आना अफसरों की शान है। जितना ही बड़ा अधिकारी होता है, उतनी ही देर में आता है, और उतने ही सबेरे जाता भी है। चपरासी की हाजिरी चौबीसों घंटे की। वह छुट्टी पर भी नहीं जा सकता। अपना एवज देना पड़ता है। खैर, जब बरेली जिला-बोर्ड के हेड क्लर्क बाबू […]

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मंत्र – 2 – मुंशी प्रेमचंद

संध्या का समय था। डॉक्टर चड्ढा गोल्फ खेलने के लिए तैयार हो रहे थे। मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखाई दिए। डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था। डोली औषधालय के सामने आकर रुक गई। बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर द्वार पर पड़ी हुई चिक […]

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