मृदुला तीव्र कंठ से बोली – ‘बहन, प्रजा की तो हर तरह से मरण है। अगर दस-बीस आदमी जमा हो जाते, तो पुलिस कहती, हमसे लड़ने आये हैं। डंडे चलाना शुरू करती और अगर कोई आदमी क्रोध में आकर एकाध कंकड़ फेंक देता तो पुलिस गोलियां चला देती। दस-बीस आदमी भून जाते। इसलिए लोग जमा नहीं होते लेकिन जब वह किसान मर गया तो गांव वालों को तैश आ गया, लाठियां ले लेकर दौड़ पड़े और कांस्टेबलों को घेर लिया। सम्भव है, दो चार आदमियों ने लाठियां चलायी भी हों। कांस्टेबलों ने गोलियां चलाना शुरू कीं। दो-तीन सिपाहियों के हल्की चोटें आयीं। उसके बदले में बारह आदमियों की जानें ले ली गईं और कितनों ही के अंग-भंग कर दिये गए। इन छोटे आदमियों को इसलिए तो इतने अधिकार दिए गए हैं कि उनका दुरुपयोग करें। आधे गांव का कत्लेआम करके पुलिस विजय का नगाड़ा बजाती हुई लौट गई। गांव वालों की फरियाद कौन सुनता। गरीब हैं, बेबस हैं, जितने आदमियों को चाहो, मार डालो। अदालत और हाकिमों से तो उन्होंने न्याय की आशा करना ही छोड़ दिया। आखिर सरकार ही ने तो कांस्टेबलों को यह मुहिम सर करने के लिए भेजा था। वह किसान की फरियाद क्यों सुनने लगी? मगर आदमी का दिल, फरियाद किये बगैर नहीं मानता। गांव वालों ने अपने शहर के भाइयों से फरियाद करने का निश्चय किया। जनता और कुछ नहीं कर सकती, हमदर्दी तो करती है। दुख-कथा सुनकर आंसू तो बहाती है। दुखियारों को हमदर्दी के आंसू भी कम प्यारे नहीं होते। अगर आस-पास के गांवों के लोग जमा होकर उनके साथ रो लेते तो गरीबों के आंसू पूंछ जाते किन्तु पुलिस ने उस गांव की नाकाबंदी कर रखी थी, चारों सीमाओं पर पहरा बिठा दिए गए थे। यह घाव पर नमक था। मारते भी हो और रोने भी नहीं देते। आखिर लोगों ने लाशें उठायी और शहर वालों को अपनी विपत्ति की क्या सुनाने चले। इस हंगामें की खबर पहले ही शहर में पहुंच गई थी। इन लोगों को देखकर जनता उत्तेजित हो गई और जब पुलिस के अध्यक्ष ने इन लाशों का जुलूस निकालने को अनुमति न दी, तो लोग और भी झल्लाए। बहुत बड़ा जमाव हो गया। मेरे बाबूजी भी इसी दल में थे। और मैंने उन्हें रोका – मत जाओ, आज का रंग अच्छा नहीं है। तो कहने लगे – मैं किसी से लड़ने थोड़े ही जाता हूं। जब सरकार की आशा के विरुद्ध जनाजा चला तो पचास हजार आमदनी साथ थे। उधर पांच सौ सशस्त्र पुलिस रास्ता रोके खड़ी थी – सवार, प्यादे, सारजंट – पूरी फौज थी। हम निहत्थों के सामने इन नामर्दों को तलवार चमकाते झंकारते शर्म भी नहीं आती। जब बार-बार पुलिस की धमकियों पर भी लोग नहीं भागे, तो गोलियां चलाने का हुक्म हो गया। घंटे भर बराबर फैर होते रहो पूरे घंटे भर तक। कितने मरे, कितने घायल हुए, कौन जानता है। मेरा मकान सड़क पर है। मैं छज्जे पर खड़ी, दोनों हाथों से दिल थामे, कांपती थी।
पहली बाढ़ चलते ही भगदड़ पड़ गई। हजारों आदमी बदहवास भागे चले आ रहे थे। बहन! वह दृश्य अभी तक आंखों के सामने है। कितना भीषण, कितना रोमांचकारी और कितना लज्जास्पद! ऐसा जान पड़ता था कि लोगों के प्राण आंखों से निकल पड़ते हैं, मगर इन भागने वालों के पीछे वीर व्रतधारियों का दल था, जो पर्वत की भांति अटल खड़ा, छातियों पर गोलियां खा रहा था और पीछे हटने का नाम न लेता था। बंदूकों की आवाजें साफ सुनाई देती थी और हरेक धांय-धांय के बाद हजारों गलों से जय की गहरी गगन-भेदी ध्वनि निकलती थी। उस ध्वनि में कितनी उत्तेजना थी, कितना आकर्षण, कितना उन्माद! बस यही जी चाहता था कि जाकर गोलियों के सामने खड़ी हो जाऊं और हंसते-हंसते मर जाऊं। उस समय ऐसा आज होता था कि मर जाना कोई खेल है। अम्मा जी कमरे में भान को लिये मुझे बार-बार भीतर बुला रही थी। जब मैं न गयी, तो वह भान को लिए हुए छज्जे पर आ गईं। उसी वक्त, दस-बारह आदमी एक स्ट्रेचर पर हृदयेश की लाश लिए हुए द्वार पर आए। अम्मा की उन पर नजर पड़ी। समझ गई। मुझे जैसे सकता-सा हो गया। अम्मा ने जाकर एक बार बेटे को देखा, उसे छाती से लगाया, चूमा और आशीर्वाद दिया और उन्मत्त दशा में चौरस्ते की तरफ चली, जहां से अब भी धांय और जय की ध्वनि बारी-बारी से आ रही थी। मैं हतबुद्धि-सी खड़ी कभी स्वामी की लाश को देखती थी, कभी अम्मा को। न कुछ बोली, न जगह से हिली, न रोयी, न घबरायी। मुझमें जैसे स्पंदन ही न था। चेतना जैसे लुप्त हो गई हो।
क्षमा – ‘तो क्या अम्मा भी गोलियों के स्थान पर पहुंच गई?’
मृदुला -‘ हां, यही तो विचित्रता है बहन! बंदूक की आवाजें सुनकर कानों पर हाथ रख लेती थी। खून देखकर मूर्च्छित हो जाती थी। वही अम्मा वीर सत्याग्रहियों की सफों को चीरती हुई खड़ी हो गई और एक ही क्षण में उनकी लाश भी जमीन पर गिर पड़ी। उनके गिरते ही योद्धाओं का धैर्य टूट गया, व्रत का बंधन टूट गया। सभी के सिरों पर खून-सा सवार हो गया। निहत्थे, अशक्त थे, पर हर एक अपने अंदर अपार-शक्ति का अनुभव कर रहा था। पुलिस पर धावा कर दिया। सिपाहियों ने इस बाढ़ को आते देखा तो होश जाते रहे। जानें लेकर भागे मगर भागते हुए भी गोलियां चलाते जाते थे। भान छज्जे पर खड़ा था, न जाने किधर से एक गोली आकर उसकी छाती में लगी। मेरा लाल वहीं पर गिर पड़ा, सांस तक न ली, मगर मेरी आंखों में अब भी आंसू न थे। मैंने प्यारे भान को गोद में उठा लिया। उसकी छाती से खून के फव्वारे निकल रहे थे। मैंने उसे जो दूध पिलाया था, उसे वह खून से अदा कर रहा था। उसके खून से तर कपड़े पहने हुए मुझे वह नशा हो रहा था, जो शायद उसके विवाह में गुलाल से तर रेशमी कपड़े पहनकर भी न होता। लड़कपन, जवानी और मौत, तीनों मंजिलें एक ही हिचकी में तमाम हो गई। मैंने बेटे को बाप की गोद में लेटा दिया। इतने में कई स्वयं सेवक अम्माजी को भी लाये। मालूम होता था, लेटी हुई मुस्करा रही हैं। मुझे तो रोकती रहती थी और खुद इस तरह जाकर आग में कूद पड़ी मानो वह स्वर्ग का मार्ग हो। बेटे ही के लिए जीती थी। बेटे को अकेले कैसे छोड़ती।
जब नदी के किनारे तीनों लाशें एक ही चिता में रखी गई, तब मेरा सकता टूटा, होश आया। एक बार जी में आया चिता में जा बैठूं सारा कुनबा एक साथ ईश्वर के दरबार में जा पहुंचे। लेकिन फिर सोचा – तूने अभी ऐसा कौन काम किया है, जिसका इतना ऊंचा पुरस्कार मिले? बहन! चिता की लपटें में मुझे ऐसा मालूम हो रहा था कि अम्माजी सचमुच भान को गोद में लिए बैठी मुस्करा रही हैं और स्वामीजी खड़े मुझसे कह रहे हैं, तुम जाओ और निश्चित होकर काम करो। मुख पर कितना तेज था! रक्त और अग्नि ही में तो देवता बसते हैं।
मैंने सिर उठा कर देखा। नदी के किनारे न जाने कितनी चिताएं जल रही थी। दूर से यह चितावली ऐसी मालूम होती थी, मानो देवता ने भारत का भाग्य गढ़ने के लिए भट्ठियां जलाई हों।
जब चिंताएं राख हो गई, तो हम लोग लौटे लेकिन उस घर में जाने की हिम्मत न पड़ी। मेरे लिए अब वह घर-घर न था! मेरा घर तो अब यह है, जहां बैठी हूं या फिर वही चिता। मैंने घर का द्वार भी नहीं खोला। महिला-आश्रम में चली गई। कल की गोलियों से कांग्रेस-कमेटी का सफाया हो गया था। यह संध्या बागी बना डाली गई थी। उसके दफ्तर पर पुलिस ने छपा मारा और उस पर अपना ताला डाल दिया। महिला-आश्रम पर भी हमला हुआ। इस पर अपना ताला डाल दिया। हमने एक वृक्ष की छांह में अपना नया दफ्तर बनाया और स्वच्छंदता के साथ काम करते रहे। यहां दीवारें हमें कैद न कर सकती थी। हम भी वायु के समान मुक्त थे।
संध्या समय हमने एक जुलूस निकालने का फैसला किया। कल के रक्तपात की स्मृति, हर्ष और मुबारकबाद में जुलूस निकालना आवश्यक था। लोग कहते हैं, जुलूस निकालने से क्या होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं और मैदान से हटे नहीं हैं। हमें अपने हार न मानने वाले आत्माभिमान का प्रमाण देना था। हमें यह दिखाना था कि हम गालियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं और हम उस व्यवस्था का अंत करके लेंगे, जिसका आधार स्वार्थपरता और खून पर है। उधर पुलिस ने जुलूस को रोककर अपनी शक्ति और विजय का प्रमाण देना आवश्यक समझा। शायद जनता को धोखा हो गया कि कल की घटना ने नौकरशाही का नैतिक ज्ञान जागृत कर दिया है। इस धोखे को दूर करना उसने अपना कर्त्तव्य समझा। वह यह दिखा देना चाहती थी कि हम तुम्हारे ऊपर शासन करने आये हैं और शासन करेंगे। तुम्हारी खुशी या नाराजी की हमें परवाह नहीं है। जुलूस निकालने की मनाही हो गई। जनता को चेतावनी दे दी गई कि खबरदार। जुलूस में न आना, वही दुर्गति होगी। इसका जनता ने वह जवाब दिया, जिसने अधिकारियों की आंखें खोल दी होंगी। संध्या समय पचास हजार आदमी जमा हो गए। आज का नेतृत्व मुझे सौंपा गया था। मैं अपने लय में एक विचित्र बल और उत्साह का अनुभव कर रही थी।
एक अबला स्त्री जिसे संसार का कुछ ज्ञान नहीं, जिसने कभी घर से बाहर पांव नहीं निकाला, आज अपने प्यारों के उत्सर्ग की बदौलत उस महान् पद पर पहुंच गई थी, जो बड़े-बड़े अफसरों को भी, बड़े-बड़े महाराजा को भी प्राप्त नहीं – मैं इस समग्र जनता के हृदय पर राज कर रही थी। पुलिस अधिकारियों की इसीलिए गुलामी करती है कि उसे वेतन मिलता है। पेट की गुलामी उससे सब कुछ करवा लेती है।
महाराजा का हुक्म लोग इसीलिए मानते हैं कि उससे उपकार की आशा या हानि का भय होता है। यह अपार जन-समूह क्या मुझसे किसी फायदे की आशा रखता था, उसे मुझसे किसी हानि का भय था? कदापि नहीं। फिर भी वह मेरे कड़े-से-कड़े हुक्म को मानने के लिए तैयार था। इसीलिए कि जनता मेरे बलिदानों का आदर करती थी इसीलिए कि उनके दिलों में स्वाधीनता की जो तड़प थी, गुलामी की जंजीरों को तोड़ देने की जो बेचैनी थी, मैं उस तड़प और बेचैनी की सजीव मूर्ति समझी जा रही थी।
निश्चित समय पर जुलूस ने प्रस्थान किया। उसी वक्त पुलिस ने मेरी गिरफ्तारी का वारंट दिखाया। वारंट देखते ही तुम्हारी याद आई। पहले तुम्हें मेरी जरूरत थी। उस वक्त तुम मेरी हमदर्दी की भूखी थी। अब मैं सहानुभूति की भिक्षा मांग रही हूं। मगर मुझमें अब लेश-मात्र भी दुर्बलता नहीं। मैं चिंताओं से मुक्त हूं। मजिस्ट्रेट जो कठोर-से-कठोर दंड प्रदान करे उसका स्वागत करूंगी। अब मैं पुलिस के किसी आक्षेप या असत्य आरोपण का प्रतिवाद न करूंगी क्योंकि मैं जानती हूं मैं जेल के बाहर रहकर जो कुछ कर सकती हूं जेल के अन्दर रहकर उससे कहीं ज्यादा कर सकती हूं। जेलों के बाहर भूलों की सम्भावना है, बहकने का भय है, समझौते का प्रलोभन है, स्पर्धा की चिन्ता है, जेल सम्मान और भक्ति की एक रेखा है, जिसके भीतर शैतान कदम नहीं रख सकता। मैदान में जलता हुआ अलाव वायु में अपनी उष्णता को खो देता है लेकिन-इंजिन में बन्द होकर वहीं आग संचालन शक्ति का अखंड भंडार बन जाती है।
अन्य देवियां भी आ पहुंची और मृदुला सबके गले मिलने लगी। फिर भारत की जय ध्वनि जेल की दीवारों को चीरती हुई आकाश में जा पहुंची।
