Gila by Munshi Premchand
Gila by Munshi Premchand

तुमने डाँटा तो नहीं, हां, आंसू पोंछ दिये।

तुमने मेरी डाँट सुनी नहीं?

क्या कहना है, आपकी डाँट का! लोगों के कान बहरे हो गये। लाओ, तुम्हारा गला सहला दूं।

आपने एक नया सिद्धांत निकाला है कि दंड देने से लड़के खराब हो जाते हैं। आपके विचार से लड़कों को आजाद रहना चाहिए। उन पर किसी तरह का बंधन, शासन या दबाव न होना चाहिए। आपके मत से शासन बालकों के मानसिक विकास में बाधक होता है। इसी का यह फल है कि लड़के बिना नकेल के ऊंट बने हुए हैं। कोई एक मिनट भी किताब खोलकर नहीं बैठता। कभी गुल्ली-डंडा है, कभी गोलियों, कभी कनकौवे। श्रीमान् भी लड़कों के साथ खेलते हैं। चालीस साल की उम्र और लड़कपन इतना। मेरे पिताजी के सामने मजाल थी कि कोई लड़का कनकौआ उड़ा ले या गुल्ली-डंडा खेल सके। खून ही पी जाते। प्रातःकाल से लड़कों को लेकर बैठ जाते थे। स्कूल से ज्यों ही लड़के आते, फिर ले बैठते थे। बस, संध्या समय आधा घंटे की छुट्टी देते थे। रात को फिर जोत देते। यह नहीं कि आप तो अखबार पढ़ा करें और लड़के गली-गली भटकते फिरें। कभी- कभी आप सींग काटकर बछड़े बन जाते हैं। लड़कों के साथ ताश खेलने बैठा करते हैं। ऐसे बाप का भला, लड़कों पर क्या रौब हो सकता है? पिताजी के सामने मेरे भाई सीधे ताक नहीं सकते थे। उनकी आवाज सुनते ही तहलका मच जाता था। उन्होंने घर में कदम रखा और शांति का साम्राज्य हुआ। उनके सम्मुख जाते लड़कों के प्राण सूखते थे। उसी शासन की यह बरकत है कि सभी लड़के अच्छे-अच्छे पदों पर पहुँच गये। हां, स्वास्थ्य किसी का अच्छा नहीं है। तो पिताजी ही का स्वास्थ्य कौन बड़ा अच्छा था। बेचारे हमेशा किसी-न-किसी औषधि का सेवन करते रहते थे। और क्या कहूँ एक दिन तो हद ही हो गयी! श्रीमानजी लड़कों को कनकौआ उड़ाने की शिक्षा दे रहे थे- यों घुमाओ, यों गोता दो, यों खींचो, यों ढील दो। ऐसा तन-मन से सिखा रहे थे, मानो गुरु-मंत्र दे रहे हों। उस दिन मैंने इनकी ऐसी खबर ली कि याद करते होंगे- तुम कौन होते हो, मेरे बच्चों को बिगाड़ने वाले। तुम्हें घर से कोई मतलब नहीं है, न हो, लेकिन मेरे बच्चों को खराब न कीजिए। बुरी- बुरी आदतें न सिखाइए। आप उन्हें सुधार नहीं सकते, तो कम-से-कम बिगाड़िए मत। लगे बगलें झाँकने। मैं चाहती हूँ एक बार यह भी गरज पड़ें, तो अपना चंडी रूप दिखाऊं, पर यह इतना जल्द दब जाते हैं कि मैं हार जाती हूँ। पिताजी किसी लड़के को मेले-तमाशे न ले जाते थे। लड़का सिर पीटकर मर जाय, मगर जरा भी न पसीजते थे। और इन महात्माजी का यह हाल है कि एक-एक से पूछकर मेले ले जाते हैं- चलो, चलो, वहां बड़ी बहार है, खूब आतिशबाजियाँ छूटेगी, गुब्बारे उड़ेंगे, विलायती चर्खियाँ भी हैं। उन पर मजे से बैठना। और-तो-और, आप लड़कों को हाकी खेलने से भी नहीं रोकते। यह अंग्रेजी खेल भी कितने जानलेवा हैं- क्रिकेट, फुटबाल, हाकी-एक-से-एक घातक। गेंद लग जाय तो जान लेकर ही छोड़े, पर आपको इन सभी खेलों से प्रेम है। कोई लड़का मैच जीतकर आ जाता है, तो ऐसे फूल उठते हैं, मानो किला फतह कर आया हो। आपको इसकी जरा परवाह नहीं कि चोट-चपेट आ गयी तो क्या होगा! हाथ-पाँव फूल गये तो बेचारों की जिन्दगी कैसे पार लगेगी।

पिछले साल कन्या का विवाह था। आपकी जिद थी कि दहेज के नाम कानी कौड़ी भी न देंगे.. चाहे कन्या आजीवन कुंवारी रहे। यहाँ भी आपका आदर्शवाद आ कूदा। समाज के नेताओं का छल-प्रपंच आये-दिन देखते रहते हैं, फिर भी आपकी आंखें नहीं खुलती। जब तक समाज की यह व्यवस्था कायम है और युवती कन्या का अविवाहित रहना निंदास्पद है, तब तक यह प्रथा मिटने की नहीं। दो-चार ऐसे व्यक्ति भले ही निकल आये, जो दहेज के लिए हाथ न फैलाए, लेकिन इनका परिस्थिति पर कोई असर नहीं पड़ता और कुप्रथा ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। पैसों की कमी नहीं, दहेज की बुराइयों पर लेक्चर दे सकते हैं, लेकिन मिलते हुए दहेज को छोड़ देने वाला मैंने आज तक न देखा। जब लड़कों की तरह लड़कियों को शिक्षा और जीविका की सुविधाएँ निकल आयेंगी, तो यह प्रथा भी विदा हो जायेगी, उसके पहले सम्भव नहीं। मैंने जहाँ-जहाँ संदेशा भेजा, दहेज का प्रश्न उठ खड़ा हुआ और आपने प्रत्येक अवसर पर टाँग अड़ायी। जब इस तरह पूरा साल गुजर गया और कन्या का सत्रहवां लग गया, तो मैंने एक जगह बात पक्की कर ली। आपने भी स्वीकार कर लिया, क्योंकि वर-पक्ष ने लेन-देन का प्रश्न उठाया ही नहीं, हालांकि अन्तःकरण में उन लोगों को विश्वास था कि अच्छी रकम मिलेगी और मैंने भी तय कर लिया था कि यथाशक्ति कोई बात उठा न रखूंगी। विवाह के सकुशल होने में कोई सन्देह नहीं था, लेकिन इन महाशय के आगे मेरी एक न चली- यह प्रथा निंद्य है, यह रस्म निरर्थक है, यहाँ रुपये की क्या जरूरत? यहाँ गीतों का क्या काम? नाक में दम था। यह क्यों, यह क्यों, यह तो साफ दहेज है, तुमने मुँह में कालिख लगा दी । मेरी आबरू मिटा दी। जरा सोचिए, इस परिस्थिति को कि बारात द्वार पर पड़ी हुई है और यहाँ बात-बात पर शास्त्रार्थ हो रहा है। विवाह का मुहूर्त आधी रात के बाद था। प्रथा अनुसार मैंने व्रत रखा, किन्तु आपकी टेक थी कि व्रत की कोई जरूरत नहीं। जब लड़के के माता-पिता व्रत नहीं रखते, जब लड़का तक व्रत नहीं रखता, तो कन्या-पक्ष वाले ही व्रत क्यों रखें! मैं और सारा खानदान मना करता रहा, लेकिन आपने नाश्ता किया। खैर, कन्यादान का मुहूर्त आया। आप सदैव से इस प्रथा के विरोधी हैं। आप इसे निषिद्ध समझते हैं। कन्या क्या दान की वस्तु है? दान रुपये-पैसे, जगह-जमीन का होता है। पशु-दान भी होता है, लेकिन लड़की का दान। एक लचर-सी बात है। कितना समझाती हूँ पुरानी प्रथा है वेद-काल से होती चली आयी है, शास्त्रों में इसकी व्यवस्था है। सम्बन्धी समझा रहे हैं, पंडित समझा रहे हैं, पर आप हैं कि कान पर जूँ नहीं रेंगती। हाथ जोड़ती पैर पड़ती हूँ गिड़गिड़ाती हूँ लेकिन आप मंडप के नीचे न गये। और मजा यह है कि आपने ही तो यह अनर्थ किया और आप ही मुझसे रूठ गये। विवाह के पश्चात् महीनों बोलचाल न रही। झख मारकर मुझी को मनाना पड़ा। किन्तु सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि इन सारे दुर्गुणों के होते हुए भी मैं इनसे एक दिन भी पृथक् नहीं रह सकती-एक क्षण का वियोग नहीं सह सकती। इन सारे दोषों पर भी मुझे इनसे प्रगाढ़ प्रेम है। इनमें यह कौन सा गुण है जिस पर मैं मुग्ध हूँ, मैं खुद नहीं जानती, पर इनमें कोई बात ऐसी है, जो मुझे इनकी चेली बनाये हुए है। यह जरा मामूली-सी देर से घर आते हैं, तो प्राण नहों में समा जाते हैं। आज यदि विधाता इनके बदले मुझे कोई विद्या और बुद्धि का पुतला- रूप और धन का देवता भी दे, तो मैं उसकी ओर आँखें उठाकर न देखूँ। यह धर्म की बेड़ी है, कदापि नहीं। प्रथागत पातिव्रत भी नहीं, बल्कि हम दोनों की प्रकृति में कुछ ऐसी क्षमताएँ कुछ ऐसी व्यवस्था उत्पन्न हो गयी हैं मानो किसी मशीन के कल-पुरजे घिस-घिसाकर फिट हो गये हों, और एक पुरजे की जगह दूसरा पुरजा काम न दे सके, चाहे वह पहले से कितना ही सुडौल, नया और सुदृढ़ क्यों न हो। जाने हुए रास्ते से हम निःशंक आंखें बंद किये चले जाते हैं, उसके ऊँच- नीच मोड़ और घुमाव, सब हमारी आंखों में समाये हैं। अनजान रास्ते पर चलना कितना कष्टप्रद होगा। शायद आज मैं इनके दोषों को गुणों से बदलने पर भी तैयार न हूँगी।