dikree ke rupaye by munshi premchand
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नईम- उनकी हमेशा से यही आदत है। आपसे कह रखा होगा, मेरे पास कौड़ी नहीं है। लेकिन मैंने चुटकियों में वसूल कर लिया! आप उठिए, खाने का इन्तजाम कीजिए।

उमा- रुपये भला क्या दिये होंगे मुझे एतबार नहीं आता।

नईम- आप सरल हैं और वह एक ही काईयाँ। उसे तो मैं ही खूब जानता हूँ। अपनी दरिद्रता के दुखड़े गा-गाकर आपको चकमा दिया करता होगा।

कैलास मुस्कराते हुए कमरे में आये और बोले- अच्छा, अब निकलिए बाहर। यहाँ भी अपनी शैतानी से बाज न आये?

नईम- रुपयों की रसीद तो लिख दूँ?

उमा- तुमने रुपये दे दिये? कहां मिले?

कैलास- फिर कभी बतला दूंगा। उठिए हजरत!

उमा- बताते क्यों नहीं, कहाँ मिले? मिर्जा जी से कौन परदा है?

कैलास- नईम, तुम उमा के सामने मेरी तौहीन करना चाहते हो?

नईम-तुमने सारी दुनिया के सामने मेरी तौहीन नहीं की?

कैलास-तुम्हारी तौहीन की, तो उसके लिए 20 हजार रु. नहीं देने पड़े?

नईम- मैं भी उसी टकसाल के रु. दे दूंगा। उमा, मैं रु. पा गया। इन बेचारे का परदा ढका रहने दो।

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