विष्णुपुर के हत्या-कांड पर समाचार पत्रों में आलोचना होने लगी। सभी पत्र एक स्वर से राय साहब को ही लांछित करने और गवर्नमेंट को राजा साहब से अनुचित पक्षपात करने का दोष लगाते थे, लेकिन इसके साथ यह भी लिख देते थे कि अभी यह अभियोग विचाराधीन है, इसलिए इस पर टीका नहीं की जा सकती।
मिर्जा नईम ने अपनी खोज को सत्य का रूप देखे के लिए पूरा एक महीना व्यतीत किया। अब जबकि रिपोर्ट प्रकाशित हुई, तो राजनैतिक क्षेत्र में विप्लव मच गया। जनता के सन्देह की पुष्टि हो गई।
कैलास के सामने अब एक जटिल समस्या उपस्थित हुई। अभी तक उसने इस विषय पर एकमात्र मौन धारण कर रखा था। वह यह निश्चय न कर सकता था कि क्या लिखूं। गवर्नमेंट का पक्ष लेना अपनी अन्तरात्मा को पददलित करना था, आत्म-स्वातंत्र्य का बलिदान करना था। पर मौन रहना और भी अपमानजनक था। अंत को जब सहयोगियों में दो-चार ने उसके ऊपर सांकेतिक रूप से आक्षेप करा शुरू किया कि उसका मौन निरर्थक नहीं है, तब उसके लिए तटस्थ रहना असह्य हो गया। उसके वैयक्तिक तथा जातीय कर्तव्य में घोर संगम होने लगा। उस मैत्री को, जिसके अंकुर पच्चीस वर्ष पहले हृदय में अंकुरित हो गये थे, और अब जो एक सघन, विशाल वृक्ष का रूप धारण कर चुकी हृदय से निकालना, हृदय को चीरना था। यह मित्र, जो उसके दुःख में दुखी और सुख में सुखी होता था, जिसका उदार हृदय नित्य उसकी सहायता के लिए तत्पर रहता था, जिसके घर में जाकर वह अपनी चिंताओं को भूल जाता था, जिसके प्रेमालिंगन में वह अपने कष्टों को विसर्जित कर दिया करता था, जिसके दर्शन मात्र ही से उसे आश्वासन, दृढ़ता तथा मनोबल प्राप्त होता था, उसी मित्र की जड़ खोदनी पड़ेगी। यह बुरी साइत थी, जब मैंने सम्पादकीय क्षेत्र में पदार्पण किया, नहीं तो आज इस धर्म-संकट में क्यों पड़ता। कितना घोर विश्वासघात होगा। विश्वास मैत्री का मुख्य अंग है। नईम ने मुझे अपना विश्वासपात्र बनाया है, मुझसे कभी परदा नहीं रखा। उसके उन गुप्त रहस्यों को प्रकाश में लाना उसके प्रति कितना घोर अन्याय होगा। नहीं, मैं मैत्री को कलंकित न करूंगा, उसकी निर्मल कीर्ति पर धब्बा न लगाऊंगा, मैत्री पर वज्राघात न करूंगा। ईश्वर वह दिन न लाए कि मेरे हाथों नईम का अहित हो। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि मुझ पर कोई संकट पड़े, तो नईम मेरे लिए प्राण तक दे देने को तैयार हो जाएगा। उसी मित्र को मैं संसार के सामने अपमानित करूं, उसकी गर्दन पर कुठार चलाऊँ। भगवान, मुझे वह दिन न दिखाना
लेकिन जातीय कर्तव्य का पक्ष भी निरस्त्र न था। पत्र का सम्पादक परंपरागत नियमों के अनुसार जाति का सेवक है। वह जो कुछ देखता है, जाति की विराट दृष्टि से देखता है। वह जो कुछ विचार करता है, उस पर भी जातीयता की छाप लगी होती है। नित्य जाति के विस्तृत विचार-क्षेत्र में विचरण करते रहने से व्यक्ति का महत्त्व उसकी दृष्टि में अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है, वह व्यक्ति को क्षुद्र, तुच्छ, नगण्य कहने लगता है। व्यक्ति की जाति पर बलि देना उसकी नीति का प्रथम अंग है। यहां तक कि यह बहुधा अपने स्वार्थ को भी जाति पर वार देता है। उसके जीवन का लक्ष्य महान आत्माओं का अनुगामी होता है, जिन्होंने राष्ट्रों का निर्माण किया है, उनकी कीर्ति अमर हो गई है, जो दलित राष्ट्रों की उद्धारक हो गई है। यह यथाशक्ति कोई काम ऐसा नहीं कर सकता, जिससे उसके पूर्वजों की उज्ज्वल विरदावली में कालिमा लगने का भय हो। कैलास राजनीतिक क्षेत्र में बहुत कुछ यश और गौरव प्राप्त कर चुका था। उसकी सम्मति आदर की दृष्टि से देखी जाती थी। उसके निर्भीक विचारों ने, उसकी निष्पक्ष टीकाओं ने उसे संपादक-मंडली का प्रमुख नेता बना दिया था। अतएव इस अवसर पर मैत्री का निर्वाह केवल उसकी नीति और आदर्श के विरुद्ध नहीं, उसके मनोगत भावों के भी विरुद्ध था। इसमें उसका अपमान था, आत्मपतन था, भीरुता थी। यह कर्त्तव्य-पथ से विमुख होना और राजनीतिक क्षेत्र से सदैव के लिए बहिष्कृत हो जाना था। एक व्यक्ति की, चाहे वह मेरा कितना ही आत्मीय क्यों न हो, राष्ट्र के सामने क्या हस्ती। नईम के बनने या बिगड़े से राष्ट्र पर कोई असर न पड़ेगा। लेकिन शासन की निरंकुशता और अत्याचार पर परदा डालना राष्ट्र के लिए भयंकर सिद्ध हो सकता है। उसे इसकी परवाह न थी कि मेरी आलोचना का प्रत्यक्ष कोई असर होगा या नहीं। संपादक की दृष्टि में अपनी सम्मति सिंहनाद के समान प्रतीत होती है कि मेरी लेखनी शासन को कम्पायन कर देगी, विश्व को हिला देगी। शायद सारा संसार मेरी कलम की सरसराहट से थर्रा उठे, मेरे विचार प्रकट होते ही युगान्तर उपस्थित कर देंगे। नईम मेरा मित्र है, किन्तु राष्ट्र मेरा हित है। मित्र के पद की रक्षा के लिए क्या अपने इष्ट पर प्राणघातक आघात करूँ?
कई दिनों तक कैलास के व्यक्तिगत और सम्पादक के कर्तव्यों में संघर्ष होता रहा। अंत को जाति ने व्यक्ति को परास्त कर दिया। उसने निश्चय किया कि मैं इस रहस्य का यथार्थ स्वरूप दिखा दूंगा। शासन के अनुत्तरदायित्व को जनता के सामने खोलकर रख दूंगा। शासन-विभाग के कर्मचारियों की स्वार्थ-लोलुपता का नमूना दिखा दूंगा, दुनिया को दिखा दूँगा कि सरकार किनकी आंख से देखती है, किनके कानों से सुनती है। उसकी अक्षमता, उसकी अयोग्यता और उसकी दुर्बलता को प्रमाणित करने का इससे बढ़कर और कौन-सा उदाहरण मिल सकता है? नईम मेरा मित्र है, तो हो, जाति के सामने यह कोई चीज नहीं है। उसकी हानि के भय से मैं राष्ट्रीय कर्तव्य से क्यों मुँह फेर लूं, अपनी आत्मा के क्यों दूषित करूँ, अपनी स्वाधीनता को क्यों कलंकित करूँ? आह, प्राणों से प्रिय नईम मुझे क्षमा करना, आज तुम जैसे मित्ररत्न को मैं अपने कर्तव्य की बलि-वेदी पर भेंट करता हूँ। मगर तुम्हारी जगह अगर मेरा पुत्र होता, तो उसे भी कर्तव्य की बलि-वेदी पर भेंट कर देता।
दूसरे दिन कैलास ने इस घटना की मीमांसा शुरू की। जो कुछ उसने नईम से सुना था, यह सब एक लेखमाला के रूप में प्रकाशित करने लगा। घर का भेदी लंका ढाहे। अन्य सम्पादकों को जहाँ अनुमान, तर्क और युक्ति के आधार पर अपना मन स्थिर करना पड़ता था, और इसलिए वे कितनी ही अनर्गल अपवाद-पूर्ण बातें लिख डालते थे, यहाँ कैलास की टिप्पणियाँ प्रत्यक्ष प्रमाणों से युक्त होती थीं। वह पते-पते की बातें कहता था और उस निर्भीकता के साथ, जो दिव्य अनुभव का निर्देश करती थीं। उसके लेखों में विस्तार कम, पर सार अधिक होता था। उसने नईम को भी न छोड़ा, उसकी स्वार्थ-लिप्सा का खूब खाका उड़ाया। यहाँ तक कि वह धन की संख्या भी लिख दी, जो इस कुत्सित व्यापार पर परदा डालने के लिए उसे दी गई थी। सबसे मजे की बात यह थी कि उसने नईम से एक राष्ट्रीय गुप्तचर की मुलाकात का भी उल्लेख किया, जिसने नईम को रुपये लेते हुए देखा था। अन्त में गवर्नमेंट को भी चैलेंज किया कि जो इसमें साहस हो, तो मेरे प्रमाणों को झूठा साबित कर दे। इतना ही नहीं, उसने वह वार्तालाप भी अक्षरशः प्रकाशित कर दिया, जो उसके और नईम के बीच हुआ था। रानी का नईम के पास आना, उसके पैरों पर गिरना, कुंवर साहब का नईम के पास नाना प्रकार के तोहफे लेकर आना, इन सभी प्रसंगों ने उसके लेखों में एक जासूसी उपन्यास का मजा पैदा कर दिया था ।
इन लेखों ने राजनीतिक क्षेत्र में हलचल मचा दी। पत्र-संपादक को अधिकारियों पर निशाने लगाने के ऐसे अवसर बड़े सौभाग्य से मिलते हैं। जगह-जगह शासन की इस करतूत की निन्दा करने के लिए सभाएं होने लगीं। कई सदस्यों ने व्यवस्थापक सभा में इस विषय पर प्रश्न करने की घोषणा की। शासकों को कभी ऐसी मुंह की न खानी पड़ी थी। आखिर उन्हें अपनी मानरक्षा के लिए इसके सिवा और कोई उपाय न सूझा कि वे मिर्जा नईम को कैलास पर मानहानि का अभियोग चलाने के लिए विवश करें।
कैलास पर इस्तगासा दायर हुआ। मिर्जा नईम की ओर से सरकार पैरवी करती थी। कैलास स्वयं अपनी पैरवी कर रहा था। न्याय के प्रमुख संरक्षकों (वकील- बैरिस्टरों) ने किसी अज्ञात कारण से उसकी पैरवी करना अस्वीकार किया। न्यायाधीश को, हारकर कैलास को कानून की सनद न रखते हुए भी, अपने मुकदमे की पैरवी करने की आज्ञा देनी पड़ी। महीनों अभियोग चलता रहा। जनता में सनसनी फैल गई। रोज हजारों आदमी अदालत में एकत्र होते थे। बाजारों में अभियोग की रिपोर्ट पढ़ने के लिए समाचार पत्रों की लूट होती थी। चतुर पाठक पढ़े हुए पत्रों से घड़ी रात खाते-जाते दोगुना पैसे खड़े कर लेते थे, क्योंकि उस समय तक पत्र- विक्रेताओं के पास कोई पत्र न बचने पाता था। जिन बातों का आज पहले गिने- गिनाए पत्र-ग्राहकों को था, उन पर अब जनता की टिप्पणियाँ होने लगीं।
नईम की मिट्टी कभी इतनी खराब न हुई थी, गली-गली, घर-घर उसी की चर्चा थी। जनता का क्रोध उसी पर केन्द्रित हो गया था । वह दिन भी स्मरणीय रहेगा, जब दोनों सच्चे, एक दूसरे पर प्राण देने वाले मित्र अदालत में आमने-सामने खड़े हुए और कैलास ने मिर्जा नईम से जिरह करनी शुरू की। कैलास को ऐसा मानसिक कष्ट हो रहा था, मानो वह नईम- की गर्दन पर तलवार चलाने जा रहा है। और नईम के लिए तो अग्नि-परीक्षा थी। दोनों के मुख उदास थे, एक का आत्मग्लानि से, दूसरे का भय से। नईम प्रसन्न रहने की चेष्टा करता था, कभी- कभी सूखी हँसी भी हँसता था, लेकिन कैलास-आह, उस गरीब के दिल पर जो गुजर रही थी, उसे कौन जान सकता।
कैलास ने पूछा- आप और मैं साथ पढ़ते थे, इसे आप स्वीकार करते हैं?
नईम- अवश्य स्वीकार करता हूँ।
कैलास- हम दोनों में इतनी घनिष्ठता थी कि हम आपस में कोई परदा न रखते थे, इसे आप स्वीकार करते हैं?
नईम- अवश्य स्वीकार करता हूँ।
कैलास- जिन दिनों आप इस मामले की जाँच कर रहे थे, मैं आपसे मिलने गया था, इसे भी आप स्वीकार करते हैं?
नईम- अवश्य स्वीकार करते हैं।
कैलास- क्या उस समय आपने मुझसे यह नहीं कहा था कि कुँवर साहब की प्रेरणा से यह हत्या हुई है?
नईम- कदापि नहीं।
कैलास- आपके मुख से ये शब्द नहीं निकले थे कि बीस हजार रुपये की थैली है?
नईम जरा भी न झिझका, जरा भी संकुचित न हुआ। उसकी जबान में लेशमात्र भी लुकनत न हुई, वाणी में जरा भी थरथराहट न आई। उसके मुख पर अशान्ति, अस्थिरता या असमंजस का कोई भी चिह्न न दिखाई दिया। वह अविचल खड़ा रहा। कैलास ने बहुत डरते-डरते यह प्रश्न किया था। उसको भय था कि नईम इसका कुछ जवाब न दे सकेगा। कदाचित् रोने लगेगा। लेकिन नईम ने निश्शंक भाव से कहा- सम्भव है। आपने स्वप्न में मुझसे ये बातें सुनी हों।
कैलास एक क्षण के लिए दंग हो गया। फिर उसने विस्मय से नईम की ओर नजर डालकर कहा- क्या आपने यह नहीं बताया कि मैंने दो-चार अवसरों पर मुसलमानों के साथ पक्षपात किया है, और इसलिए मुझे हिन्दू-विरोधी समझकर अनुसंधान का भार सौंपा गया है?
नईम जरा भी न झिझका। अविचल, स्थिर और शान्त भाव से बोला-आपकी कल्पना-शक्ति वास्तव में आश्चर्यजनक है। बरसों तक आपके साथ रहने पर भी मुझे यह विदित न हुआ था कि आपमें घटनाओं का आविष्कार करने की ऐसी चमत्कारपूर्ण शक्ति है।
कैलास ने और कोई प्रश्न नहीं किया। उसे अपने पराभव का दुःख न था, दुःख था नईम की आत्मा के पतन का। वह कल्पना भी न कर सकता था कि कोई मनुष्य अपने मुंह से निकली हुई बात को इतनी ढिठाई से अस्वीकार कर सकता है, और वह भी उसी आदमी के मुँह पर, जिससे वह बात कही गई हो। यह मानवी दुर्बलता की पराकाष्ठा है। वह नईम, जिसका अंदर और बाहर एक था, जिसके विचार और व्यवहार में भेद न था, जिसकी वाणी आंतरिक भावों का दर्पण थी, यह सरल, आत्माभिमानी, सत्यभक्त नईम इतना धूर्त, ऐसा मक्कार हो सकता है। क्या दासता के सांचे में ढलकर मनुष्य अपना मनुष्यत्व खो बैठा है? क्या यह दिव्य गुणों के रूपान्तरित करने का यंत्र है?
अदालत ने नईम को 20 हजार रुपयों की डिक्री दे दी। कैलास पर वज्रपात हो गया।
