bhaade ka tattoo by munshi praimchhand
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यशवन्त अब बड़े संकट में पड़ा। उसने छुट्टी लेनी चाही, लेकिन मंजूर न हुई। सिविल सर्जन अंग्रेज था। इस वजह से उसकी सनद लेने की हिम्मत न पड़ी। बला सिर पर आ पड़ी थी और उससे बचने का उपाय न सूझता था।

भाग्य की कुटिल क्रीड़ा देखिए। साथ खेले और साथ पढ़े हुए दो मित्र एक दूसरे के सम्मुख खड़े थे, केवल एक कटघरे का अन्तर था। पर एक की जान दूसरे की मुट्ठी में थी। दोनों की आँखें कभी चार न होतीं। दोनों सिर नीचा किए रहते थे। यद्यपि यशवन्त न्याय के पद पर था और रमेश मुलजिम, लेकिन यथार्थ में दशा इसके प्रतिकूल थी। यशवन्त की आत्मा लज्जा, ग्लानि और मानसिक पीड़ा से तड़पती थी, और रमेश का मुख निर्दोषिता प्रकाश से चमकता रहता था।

दोनों मित्रों में कितना अन्तर था। एक कितना उदार था, दूसरा कितना स्वार्थी। रमेश चाहता, तो भरी अदालत में उस रात की बात कह देता। लेकिन यशवन्त जानता था, रमेश फाँसी से बचने के लिए भी उस प्रमाण का आश्रय न लेगा, जिसे मैं गुप्त रखना चाहता हूँ।

जब तक मुकदमे की पेशियाँ होती रहीं, तब तक यशवन्त को असह्य मर्म- वेदना होती रही। उसकी आत्मा और स्वार्थ में नित्य संग्राम होता रहता था, पर फैसले के दिन तो उसकी वही दशा हो रही थी, जो किसी खून के अपराधी की हो। इजलास पर जाने की हिम्मत न पड़ती थी। वह तीन बजे कचहरी पहुँचा। मुलजिम अपना भाग्य-निर्णय सुनने को तैयार खड़े थे। रमेश भी आज रोज से ज्यादा उदास था। उसके जीवन-संग्राम में वह अवसर आ गया था, जब उसका सिर तलवार की धार के नीचे होगा। अब तक भय सूक्ष्म रूप में था, आज उसने स्थूल रूप धारण कर लिया था।

यशवन्त ने दृढ़ स्वर में फैसला सुनाया। जब उसके मुख से ये शब्द निकले कि रमेशचन्द्र को सात वर्ष का कठोर कारावास, तो उसका गला बँध गया, उसने तजवीज मेज़ पर रख दी। कुर्सी पर बैठकर पसीना पोंछने के बहाने आंखों में उमड़े हुए आँसुओं को पोंछा इसके आगे तजवीज उससे न पड़ी गई।

रमेश जेल से निकलकर पक्का क्रान्तिकारी बन गया। जेल की अँधेरी कोठरी में दिल-भर के कठिन परिश्रम के बाद वह दीनों के उपकार और सुधार के मनसूबे बाँधा करता था। सोचा, मनुष्य क्यों पाप करता है? इसलिए न कि संसार में इतनी विषमता है। कोई तो विशाल भवनों में रहता है और किसी को पेड़ की छाँह भी मयस्सर नहीं। कोई रेशम और रत्नों से मढ़ा हुआ है, किसी को फटा वस्त्र भी नहीं। ऐसे न्याय-विहीन संसार में यदि चोरी, हत्या और अधर्म है, तो यह किसका दोष है? वह एक ऐसी समिति खोलने का स्वप्न देखा करता जिसका काम संसार से इस विषमता को मिटा देना हो।

संसार सबके लिए है और उसमें सबके सुख भोगने का समान अधिकार है। न डाका, डाका है, न चोरी, चोरी। धनी अगर अपना धन खुशी से नहीं बाँट देता, तो उसकी इच्छा के विरुद्ध बाँट लेने में क्या पाप! धनी उसे पाप कहता है, तो कहे। उनका बनाया हुआ कानून अगर दंड देना चाहता है, तो दे। हमारी अदालत भी अलग होगी। उसके सामने ये सभी मनुष्य अपराधी होंगे, जिनके पास जरूरत से ज्यादा सुख-भोग की सामग्रियाँ हैं। हम भी उन्हें दंड देंगे, हम भी उनसे कड़ी मेहनत लेंगे ।

जेल से निकलते ही उसने इस सामाजिक क्रान्ति की घोषणा कर दी। गुप्त सभा, बनने लगीं, शस्त्र जमा किए जाने लगे और थोड़े ही दिनों में डाकों का बाजार गरम हो गया। पुलिस ने उनका पता लगाना शुरू किया। उधर क्रान्तिकारियों ने पुलिस पर भी हाथ साफ करना शुरू किया। उनकी शक्ति दिन-दिन बढ़ने लगी। काम इतनी चतुराई से होता था कि किसी को अपराधियों का कुछ सुराग न मिलता।

रमेश कहीं गरीबों के लिए दवाखाने खोलता, कहीं बैंक। डाके के रुपयों से उसने इलाके खरीदना शुरू किया। जहाँ कोई इलाका नीलाम होता, वह उसे खरीद लेता। थोड़े ही दिनों में उसके अधीन एक बड़ी जायदाद हो गई। इसका नफा गरीबों के उपकार में खर्च होता था। तुर्रा यह कि सभी जानते थे, यह रमेश की करामात है, पर किसी को मुँह खोलने की हिम्मत न होती थी। सभ्य समाज की दृष्टि में रमेश से ज्यादा घृणित और कोई प्राणी संसार में न था। लोग उसका नाम सुनकर कानों पर हाथ रख लेते थे। शायद उसे प्यासे मरता देखकर कोई एक बूंद पानी भी उसके मुँह में न डालता। लेकिन किसी की मजाल न थी कि उस पर आक्षेप कर सके।

इस तरह कई साल गुजर गए। सरकार ने डाकुओं का पता लगाने के लिए बड़े-बड़े इनाम रखे। यूरोप से गुप्त पुलिस के सिद्धहस्त आदमियों को बुलाकर इस काम पर नियुक्त किया गया। लेकिन गजब के डकैत थे, जिनकी हिकमत के आगे किसी की कुछ न चलती थी।

पर रमेश खुद अपने सिद्धान्तों का पालन न कर सका। ज्यों-ज्यों दिन गुजरते थे, उसे अनुभव होता था कि मेरे अनुयायियों में असंतोष बढ़ता जाता है। उनमें भी जो ज्यादा चतुर और साहसी थे, वे दूसरों पर रोब जमाते और लुट के माल में बराबर हिस्सा न लेते थे। यहाँ तक कि रमेश से कुछ लोग जलने लगे । वह अब राजसी ठाट से रहता था। लोग कहते, उसे हमारी कमाई को यों उड़ाने का क्या अधिकार है? नतीजा यह हुआ कि आपस में फूट पड़ गई।

रात का वक्त था, काली घटा छाई थी। आज डाक गाड़ी में डाका पड़ने वाला था। प्रोग्राम पहले से तैयार कर लिया गया था। पाँच साहसी युवक इस काम के लिए चुने गए थे।

सहसा एक युवक ने खड़े होकर, कहा-बार-बार मुझे ही क्यों चुनते हैं? हिस्सा लेने वाले तो सब हैं, मैं ही क्यों बार-जार अपनी जान जोखिम में डालूं? रमेश ने दृढ़ता से कहा- इसका निश्चय करना मेरा काम है कि किसे कहाँ भेजा जाए। तुम्हारा काम केवल मेरी आज्ञा का पालन है।

युवक- अगर मुझसे काम ज्यादा लिया जाता है, तो हिस्सा क्यों नहीं ज्यादा दिया जाता?

रमेश ने उसकी त्यौरियां देखीं और चुपके से पिस्तौल हाथ में लेकर बोले- इसका फैसला वहाँ से लौटने के बाद होगा।

युवक- मैं जाने से पहले इसका फैसला करना चाहता हूँ।

रमेश ने इसका जवाब न दिया। वह पिस्तौल से उसका काम तमाम कर देना ही चाहते थे कि युवक खिड़की से नीचे कूद पड़ा और भागा। कूदने-फांदने में उसका जोड़ न था। चलती रेलगाड़ी से फाँद पड़ना उसके बाएँ हाथ का खेल था।

वह यहाँ से सीधा गुप्त पुलिस के प्रधान के पास पहुँचा।