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Kheldili-Balman ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

सातवीं कक्षा के छात्र इकट्ठे हुए है। उसकी एक टीम बनानी है। किसकी टीम? तैराक की ही तो!

दो महीने के बाद दिपावली की छुट्टियाँ होंगी। उस वक्त सभी किस्म की खेलस्पर्धा होगी। हुतुतुतु, खो-खो, लंबी ऊंची कूद, लंगड़ा खेल, गिल्ली डंडा, गेंद फेंकना और तालाब में तैरने की भी स्पर्धा होगी।

स्पर्धा के बाद पुरस्कार भी रखे हैं। अखबार में आया है कि शहर के मेयर अपने हाथों से इस स्पर्धा के विजेताओं को पुरस्कार देने वाले हैं।

अलग-अलग उम्र के तैराकों के लिए अलग-अलग विभाग रखे हैं।

विनय मंदिर के नोटिस बोर्ड पर सूचना लिख दी गई है। अलग-अलग वर्ग के छात्र अपनी-अपनी सात-सात टीम तय करें। अगले सप्ताह से तैरने का प्रशिक्षण शुरू होगा। इसलिए सातवीं कक्षा के छात्र इकट्ठे हुए हैं।

इस टीम का नायक गिरीश है। एक के बाद एक छात्र को पूछा है: “रमेश, तुम टीम में जुड़ोगे?”

रमेश ने कहाः “जरूर, मुझे थोड़ा तैरना आता है। मैं जल्द ही तैरना सिख जाऊंगा।”

चलो, एक तैराक निश्चित हो गया।

नीलकांत भी तैयार हो गया।

मोहन गांव में से ही आता है, उसे तैरना अच्छा आता है। इस तरह तीन हुए।

रश्मिन ने बोला, वह तो बड़े शहर में ही पला है। उसे तैरना नहीं आता है।

त्रिलोक को तो तैरने में रुचि ही नहीं है। उसको ऐसी स्पर्धाएं अच्छी नहीं लगती है। ठीक है भैया, तुम किताबें पढ़ा करो। दूसरों को शरीर मजबूत बनाने दो। शरीर मजबूत तो मन मजबूत।

फिर धीमंत और अरुण भी तैयार हुए। गिरीश तो टीम में ही था। अब एक सदस्य चाहिए।

“अब कौन तैयार होता है?” गिरीश ने पूछा।

जवाब में सुकेतु खड़ा हुआः “मेरी टीम में रहने की इच्छा है। हालांकि मुझे तैरना नहीं आता है। तुम सिखाओगे?

गिरीश कह रहा थाः “हां, हां जरूर…”

पर उसकी बातें बीच में ही रोककर धीमंत बोल उठाः “वाह रे वाह! तुझे टीम में लेगा ही कौन लंगूजी!” ऐसा कहकर धीमंत लड़खड़ाता हुआ नाटकीय अदा से थोड़े कदम चला और सारे लड़के हंस पड़े। एक-दो ने तो ‘लंगूजी’ नाम की आवाज भी दी।

बात यह थी कि सुकेतु का बायाँ पैर थोड़ा लड़खड़ाता था। इसलिए वह धीमंत का मजाक सुनकर शर्मिंदा हो गया। विनती करता हुआ वह धीमे-से बोलाः “मैं जरूर अच्छा तैरना सीख जाऊंगा। मुझे सिखा दोगे न गिरीश भाई?”

अब धीमंत जोर से हंसने लगाः “अबे जा, जा तैमूरलंग! हमें अभी से ही स्पर्धा में हारकर बैठ नहीं जाना है। लो, आए शहंशाह! तैरने जाना है! तेरा मुंह तो देख।”

अब गिरीश से रहा न गया, उसने कहाः “धीमंत, सभी के बीच किसी का ऐसा मजाक नहीं करना चाहिए।”

“क्यों नहीं? मैं तो रोज इस लंगडु शाह का मजाक करता हूँ। लंगूजी, लंगूजी! हजार बार लंगूजी!” धीमंत बोला।

बेचारा सुकेतु तो रोने जैसा हो गया। बेंच पर बैठते हुए उसने कहाः “रहने दो, गिरीश भाई, कोई दूसरे को टीम में ले लो।”

गिरीश ने कहाः “नहीं ऐसा नहीं होगा। सबसे पहले तुमने नाम दिया था। इसलिए तुम्हें तो टीम में लेना ही है।”

धीमंत ने चिल्लाकर कहाः “मैं कहता हूँ उस लंगडे को लेना नहीं है।”

“और मैं कहता हूँ लेना है।”

“और मैं कहता हूँ नहीं लेना है। बोल, तू क्या कर लेगा? लड़ना है?”

“देख, धीमंत तू ताकतवर है, यह सबको पता है। पर यहां लड़ाई का कोई काम नहीं है। सुकेतु का पैर चलने में लड़खड़ाता है पर तैरने में उसे कोई दिक्कत नहीं होगी।”

“यह जो भी हो, मैं कहता हूँ, उसे लेना नहीं है।”

“ऐसा बोलना अच्छा नहीं है। कल ही हमने पाठ सिखा। जिसमें थॉमस एडिसन के बारे में आया था। आठ वर्ष की उम्र में वह बहरा हो गया था। पर उसने कितनी खोजें की थी। बिजली का लैम्प, ग्रामोफोन, फिल्म ओर न जाने क्या-क्या नहीं खोजा?”

पर धीमंत माने तो न! वह था दादा। बात-बात में मारपीट पर उतर जाता था।

पर गिरीश भी ऐसे ही नहीं मानने वाला था।

आखिर उसने टीम के दूसरे सदस्यों से पूछा “बोलो, तुम चारों का क्या कहना है?”

रमेश ने कहाः “मुझे कोई एतराज नहीं है।”

नीलकांत ने कहाः “सुकेतु तैरना सिख जाए तो क्या हर्ज है?”

मोहन ने कहाः “हम सब सुकेतु को तैरना सिखाएंगे।

अब धीमंत अकेला हो गया।

उसके हाथ पिटाई करने के लिए उतावले हो रहे थे। यह देखकर मोहन ने कहाः “धीमंत, यहां तेरी दादागिरी चलने वाली नहीं है। तू शांति से बात कर, वरना टीम में से निकल जा।”

धीमंत ने घमंड में कहा, “मेरे बिना तुम्हारी टीम हार जाएगी।”

“हार-जीत के लिए हम स्पर्धा में उतरते नहीं है।”

“तो मैं अभी से निकल जाता हूँ।”

धीमंत बड़बड़ाता हुआ बाहर चला गया।

उसके बाद प्रशिक्षण शुरू हुआ। सुकेतु को सच में तैरना आ गया। उसका शरीर भारी नहीं था और हाथ भी लंबे थे इसलिए वह तेजी से तैरने लगा।

पर धीमंत तो सबसे कहता फिरता था कि टीम की जीत नहीं होगी। लंगड़े को टीम में थोड़ी रखा जाता है?

ऐसे में दिवाली की छुट्टियाँ आ गई। स्पर्धाएं शुरू हो गई। ग्यारह से पंद्रह बरस के तैराकों की अलग-अलग स्पर्धा सोमवार को थी।

धीमंत सुबह से ही तालाब पहुंच गया था। वह तैरने की पोशाक पहन के आया था।

एक के बाद एक टीम तैरने लगी। प्रत्येक तैराक का समय नोट किया जाता था।

सातों तैराक के साथ धीमंत ने भी पानी में छलांग लगा दी। वह साबित करना चाहता था कि वह सबसे पहले तैरकर जा सकता है। पर सातों की टीम में सुकेतु सबसे आगे था। उसके पैर भले ही क्षतिग्रस्त थे लेकिन उसका शरीर हल्का होने से वह तेजी से जा रहा था।

ऐसे तैरते वह तालाब के बीच पहुँचा तो सुकेतु ने देखा कि आगे तैरता हुआ छात्र रूक गया है। उसके मुंह में पानी है। हाथ पैर को जोर लगाने के बावजूद वह आगे नहीं जा सकता है, शायद वह डूब जाएगा।

सुकेतु को पता नहीं था कि वह धीमंत है। उसने माना कि टीम का कोई सदस्य है। थोडी देर सोचा कि क्या करे क्या न करे पर सोचने का वक्त नहीं था।

इस छात्र को बचाने में पुरस्कार गंवाने का डर था पर इस वक्त उसकी कोई कीमत नहीं है। कीमत तो है मनुष्य के प्राणों की।

सुकेतु ने उसका एक हाथ अपने बाएं हाथ में लिया। दाहिने हाथ से पानी चीरना शुरू किया।

अब उसका दिमाग तेजी से चलने लगा। उसको लगा, मैं शायद पीछे रह गया हूँ। मेरी वजह से टीम हार जाएगी। अब धीमंत को क्या मुंह दिखाएंगे? वह तो कहेगा कि मैं तो कहता था कि जिस टीम में लंगडुशा हो उसकी जीत कैसे हो सकती है?

लंगडुशा शब्द दिमाग में आने से सुकेतु पागल की तरह एक हाथ और दो पैर का उपयोग करके पानी चीरने लगा। उसके हाथ में से उस साथीदार का हाथ छिपाकर कोई ले गया, उसका उसे पता ही नहीं चला। वह बेहोश हो गया।

जब होश में आया तब सुकेतु बिस्तर पर लेटा था। बगल में उसके पिताजी, माता, गिरीश, रमेश, नीलकांत वगैरह टीम के साथीदार खड़े थे।

मां ने कहाः “कैसा है भाई, अब तुझे?”

“मुझे कुछ नही हुआ था मां।”

गिरीश ने कहाः “सुकेतु, आचार्य एवं मेयर ने तुझे खास अभिनंदन के संदेश भेजे हैं। तुमने धीमंत के प्राण बचाएं हैं। इतना ही नहीं, टीम को जिताया भी है।

सुकेतु कुछ समझा नहीं। गिरीश ने उसे सारी बात बताई। अपनी उम्र के सभी छात्रों में तुम सबसे कम समय में तालाब तैर गए हो। और धीमंत को खींचते इतनी तेजी-से कितना अच्छा तैरा।

सुकेतु की आंखों में आनंद के आंसू आ गए। उन आंसू के बीच-से उसने देखा कि धीमंत भी सामने खड़ा है और उसकी आंखों में भी आंसू हैं पछतावे के।

नए साल में इनाम बांटने का आयोजन किया गया।

सुकेतु को मेयर ने दूसरे इनामों के साथ खेल-भावना का विशेष इनाम दिया।

26 जनवरी के दिन अधिक खुशी की बात यह हुई कि अपनी जान खतरे में डालकर दूसरे के प्राण बचाने के लिए राष्ट्रपति ने भी सुकेतु को विशेष इनाम दिया।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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