यशवंत ने भी पेंशन लेकर वकालत शुरू की थी। न्याय-विभाग के सभी लोगों से उनकी मित्रता थी। उनकी वकालत बहुत जल्द चमक उठी। यशवंत के पास लाखों रुपये थे। उन्हें पेंशन बहुत मिलती थी। वह चाहते, तो घर बैठे आनन्द से अपनी उम्र के बाकी दिल काट देते। देश और जाति की कुछ सेवा करना भी उनके लिए मुश्किल न था। ऐसे ही पुरुषों से निःस्वार्थ सेवा की आशा की जा सकती है। पर यशवन्त ने अपनी सारी उम्र रुपये कमाने में गुजारी थी, और वह अब कोई ऐसा काम न कर सकते थे, जिसका फल रुपयों की सूरत में न मिले।
यों तो सारा सभ्य समाज रमेश से घृणा करता था, लेकिन यशवन्त सबसे बढ़ा हुआ था। कहता, अगर कभी रमेश पर मुकदमा चलेगा, तो मैं बिना फीस लिये सरकार की तरफ से पैरवी करूंगा। खुल्लमखुल्ला रमेश पर छींटे उड़ाया करता- यह आदमी नहीं शैतान है, राक्षस है, ऐसे आदमी का तो मुंह न देखना चाहिए। उफ, इसके हाथों कितने के भले घरों का सर्वनाश हो गया। कितने भले आदमियों के प्राण गये। कितनी स्त्रियाँ विधवा हो गई। कितने बालक अनाथ हो गए। आदमी नहीं पिशाच है। मेरा बस चले, इसे गोली मार दूँ जीता नुचवा दूँ।
सारे शहर में शोर मचा हुआ था-रमेश बाबू पकड़े गए! बात सच्ची थी। रमेश चुपचाप पकड़ा गया था। उसी युवक ने, जो रमेश के सामने कूदकर आगा था, पुलिस के प्रधान से सारा कच्चा चिट्ठा बयान कर दिया था। अपहरण और हत्या का कैसा रोमांचकारी, कैसा पैशाचिक, कैसा पापपूर्ण वृत्तान्त था।
भद्र समुदाय बगलें बजाता था। सेठों के घरों में घी के चिराग जलते थे। उनके सिर पर एक नंगी तलवार लटकी रहती थी, आज वह हट गई। अब वे मीठी नींद सो सकते थे।
अखबारों में रमेश के हथकंडे छपने लगे। वे बातें, जो अब तक मारे भय के किसी की जबान पर न आती थीं, अब अखबारों में छपने लगी। उनको पढ़कर पता चलता था कि रमेश ने कितना अंधेर मचा रखा था। कितने ही राजे और रईस उसे माहवार टैक्स दिया करते थे। उसका पुरजा पहुँचता, फलां तारीख को इतने रुपये भेज दो । फिर किसी की मजाल थी कि उसका हुक्म टाल सके? वह जनता के हित के लिए जो काम करता, उसके लिए भी अमीरों से चंदे लिये जाते थे। रकम लिखना रमेश का काम था। अमीर को बिना कान-पूंछ हिलाए यह रकम दे देनी पड़ती थी।
लेकिन भद्र समुदाय जितना ही प्रसन्न था, जनता उतनी ही दुखी थी। अब कौन पुलिस वालों के अत्याचार से उनकी रक्षा करेगा, कौन सेठों के जुल्म से उन्हें बचाएगा, कौन उनके लड़कों के लिए कला-कौशल के मदरसे खोलेगा? वे अब किसके बल कूदेंगे? यही उनका अवलम्ब था। वे अब किसका मुँह ताकेंगे? किसको अपनी फरियाद सुनाएँगे?
पुलिस शहादतें जमा कर रही थी। सरकारी वकील जोरों से मुकदमा चलाने की तैयारियाँ कर रहा था। लेकिन रमेश की तरफ से कोई वकील न खड़ा होता था। जिले भर में एक ही आदमी था, जो उसे कानून के पंजे से छुड़ा सकता था। वह था यशवन्त। लेकिन यशवन्त, जिसके नाम से कानों पर उँगली रखता था, क्या उसकी वकालत करने को खड़ा होगा? असम्भव।
रात के नौ बजे थे। यशवन्त के कमरे में एक स्त्री ने प्रवेश किया। यशवन्त अखबार पढ़ रहा था। बोला- क्या चाहती हो?
स्त्री- अपने पति के लिए एक वकील।
यशवन्त- तुम्हारा पति कौन है?
स्त्री- वही जो आपके साथ पढ़ता था, और जिस पर डाके का झूठा अभियोग चलाया जानेवाला है।
यशवन्त ने चौंक कर पूछा- तुम रमेश की स्त्री हो?
स्त्री- हाँ।
यशवन्त- मैं उनकी वकालत नहीं कर सकता।
स्त्री- आपको अख्तियार है। आप अपने जिले के आदमी हैं और मेरे पति के मित्र भी रह चुके हैं। इसलिए सोचा था, क्यों बाहर वालों को बुलाऊँ? मगर अब इलाहाबाद या कलकत्ते से ही किसी को बुलाऊंगी।
यशवन्त- मेहनताना दे सकोगी?
स्त्री ने अभिमान के साथ कहा- बड़े-बड़े वकील का मेहनताना क्या होता है?
यशवन्त- तीन हजार रुपये रोज।
स्त्री-बस! आप इस मुकदमे को ले लें, मैं आपको तीन हजार रुपए रोज दूंगी।
थशवन्त- तीन हजार रुपए रोज।
स्त्री- हाँ और यदि आपने उन्हें छुड़ा लिया, तो पचास हजार रुपये आपको इनाम के तौर पर और दूंगी।
यशवन्त के मुँह में पानी भर आया। अगर मुकदमा दो महीने भी चला, तो कम-से-कम एक लाख रुपए सीधे हो जाएँगे, पुरस्कार ऊपर से। पूरे दो लाख की गोटी है। इतना धन तो जिंदगी-भर में भी जमा न कर पाए थे। मगर दुनिया क्या कहेगी? अपनी आत्मा भी तो नहीं गवाही देती। ऐसे आदमी को कानून के पंजे से बचाना असंख्य प्राणियों की हत्या करना है। लेकिन गोटी दो लाख की है। कुछ रमेश के फंस जाने से इस जत्थे का अन्त तो हुआ नहीं जाता। उसके चेले-चपाटे तो रहेंगे ही। शायद वे अब और भी उपद्रव मचाएं। फिर मैं दो लाख की गोटी क्यों जाने दूँ? लेकिन मुझे कहीं मुँह दिखाने की जगह न रहेगी। न सही। जिसका जी चाहे खुश हो, जिसका जी चाहे नाराज। ये दो लाख तो नहीं छोड़े जाते। कुछ मैं किसी का गला तो दबाता नहीं, चोरी तो करता नहीं? अपराधियों की रक्षा करना तो मेरा काम ही है।
सहसा स्त्री ने पूछा- आप क्या जवाब देते हैं?
यशवन्त-मैं कल जवाब दूँगा। जरा सोच लूँ?
स्त्री- नहीं, मुझे इतनी फुरसत नहीं है। अगर आपको कुछ उलझन हो तो साफ-साफ कह दीजिए, मैं और प्रबंध करूँ?
यशवन्त को और विचार करने का अवसर न मिला। जल्दी का फैसला स्वार्थ ही की ओर झुकता है। यहाँ हानि की सम्भावना नहीं रहती।
यशवन्त- आप कुछ रुपए पेशगी दे सकती हैं?
स्त्री- रुपयों की मुझसे बार-बार चर्चा न कीजिए। उनकी जान के सामने रुपयों की हस्ती क्या है। आप जितनी रकम चाहें, मुझसे ले लें। आप चाहे उन्हें छुड़ा न सके, लेकिन सरकार के दाँत जरूर खट्टे कर दें।
यशवन्त- खैर, मैं ही वकील हो जाऊंगा। कुछ पुरानी दोस्ती का निर्वाह भी तो करना चाहिए।
पुलिस ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया, सैकड़ों शहादतें पेश कीं। मुखबिर ने तो पूरी गाथा ही सुना दी, लेकिन यशवन्त ने कुछ ऐसी दलीलें की, शहादतों को कुछ इस तरह झूठा सिद्ध किया और मुखबिर की कुछ ऐसी खबर ली कि रमेश बेदाग छूट गए। उन पर कोई अपराध न सिद्ध हो सका। यशवन्त जैसे संयत और विचारशील वकील का उनके पक्ष में खड़े हो जाना ही इसका प्रमाण था कि सरकार ने गलती की।
संध्या का समय था। रमेश के द्वार पर शामियाना तना हुआ था। गरीबों को भोजन कराया जा रहा था। मित्रों की दावत हो रही थी। यह रमेश के छूटने का समय था। यशवन्त को चारों ओर से धन्यवाद मिल रहे थे। रमेश को बधाइयाँ दी जा रही थीं। यशवन्त बार-बार रमेश से बोलना चाहता, लेकिन रमेश उसकी ओर से मुंह फेर लेते थे। अब तक उन दोनों में एक बात भी न हुई थी।
आखिर यशवन्त ने एक बार झुँझलाकर कहा- तुम तो मुझसे इस तरह ऐंठे हुए हो, मानो मैंने तुम्हारे साथ कोई बुराई की है।
रमेश- और आप क्या समझते हैं कि मेरे साथ भलाई की है? पहले आपने मेरे इस लोक का सर्वनाश किया था, अब की परलोक का किया। पहले न्याय किया होता, तो मेरी जिन्दगी सुधर जाती और अब जेल जाने देते, तो आकबत बन जाती।
यशवन्त- यह तो न कहोगे कि मुझे इस मामले में कितने साहस से काम लेना पड़ा।
रमेश- आपने साहस से काम नहीं लिया, स्वार्थ से काम लिया। आप स्वार्थ के भक्त हैं। मैं तो आपको ‘भाड़े का टट्टू समझता हूँ। मैंने अपने जीवन का बहुत दुरुपयोग किया, लेकिन उसे आपके जीवन से बदलने को किसी दशा में भी तैयार नहीं हूँ। आप मुझसे धन्यवाद की आशा न रखें।
□□□
