bhaade ka tattoo by munshi praimchhand
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दस साल गुजर गए। यशवन्त दिलोजान से काम करता था और उसके अफसर उससे बहुत प्रसन्न थे। पर अफसर जितने प्रसन्न थे, मातहत उतने ही अप्रसन्न रहते थे। वह खुद जितनी मेहनत करता था, मातहतों से भी उतनी ही मेहनत लेना चाहता था, खुद जितना बेलौस था, मातहतों को भी उतना ही बेलौस बनाना चाहता था। ऐसे आदमी बड़े कारगुजार समझे जाते हैं। यशवन्त की कारगुजारी का अफसरों पर सिक्का जमता जाता था। पाँच वर्षों में ही वह जिले का जज बना दिया गया।

रमेश इतना भाग्यशाली न था। वह जिस इजलास में वकालत करने जाता, वहीं असफल रहता। हाकिम को नियत समय पर आने में देर हो जाती, तो खुद भी चल देता और फिर बुलाने से भी न आता। कहता-अगर हाकिम वक्त की पाबंदी नहीं करता, तो मैं क्यों करूँ? क्या गरज पड़ी है कि घंटों उनके इजलास पर खड़ा उनकी राह देखा करूँ? बहस इतनी निर्भीकता से करता कि खुशामद के आदी हुक्काम की निगाहों में उसकी निर्भीकता गुस्ताख़ी मालूम होती। सहनशीलता उसे छू नहीं गई थी। हाकिम को या दूसरे पक्ष का वकील जो उसके मुँह लगता, उसकी खबर लेता था। यहाँ तक कि एक बार वह जिला-जज ही से लड़ बैठा। फल यह हुआ कि उसकी सनद छीन ली गई। किन्तु मुवक्किल के हृदय में उसका सम्मान ज्यों-का-त्यों रहा।

तब उसने आगरा-कॉलेज में शिक्षक का पद प्राप्त कर लिया। किन्तु यहाँ भी दुर्भाग्य ने साथ न छोड़ा। प्रिंसिपल से पहले ही दिन खटपट हो गयी। प्रिंसिपल का सिद्धान्त यह था कि विद्यार्थियों को राजनीति से अलग रहना चाहिए। वह अपने कॉलेज के किसी छात्र को भी किसी राजनीतिक जलसे में शरीक न होने देते। रमेश पहले ही दिन से इस आज्ञा का खुल्लमखुल्ला विरोध करने लगा। उसका कथन था कि अगर किसी को राजनीतिक जलसों में शामिल होना चाहिए, तो विद्यार्थी को, यह भी उसकी शिक्षा का एक अंग है। अन्य देशों में छात्रों ने युगान्तर उपस्थित कर दिया है, तो इस देश में क्यों उनकी जबान बंद की जाती है? इसका फल यह हुआ कि साल खतम होने के पहले ही रमेश को इस्तीफा देना पड़ा। किन्तु विद्यार्थियों पर उसका दबाव तिल-भर भी कम न हुआ।

इस भांति कुछ तो अपने स्वभाव और कुछ परिस्थितियों ने रमेश को मार-मारकर हकीम बना दिया। पहले मुवक्किलों का पक्ष लेकर अदालत से लड़ा, फिर छात्रों का पक्ष लेकर प्रिंसिपल से रार मोल ली और अब प्रजा का पक्ष लेकर सरकार को चुनौती दी। वह स्वभाव से ही निर्भीक, आदर्शवादी, सत्यभक्त तथा आत्माभिमानी था। ऐसे प्राणी के लिए प्रजा-सेवक बनने के सिवा और उपाय ही क्या था! समाचार पत्रों में वर्तमान परिस्थिति पर उसके लेख निकलने लगे। उसकी आलोचनाएँ इतनी स्पष्ट, इतनी व्यापक और इतनी मार्मिक होती थी कि शीघ्र ही उसकी कीर्ति फैल गई। लोग मान गए कि इस क्षेत्र में एक नई शक्ति का उदय हुआ है। अधिकारी लोग उसके लेख पढ़कर तिलमिला उठते थे। उसका निशानाबा इतना ठीक बैठता था कि उससे बच निकलना असम्भव था। अतिशयोक्ति तो उनके सिरों पर से सनसनाती हुई निकल जाती थीं। उनका-वे दूर से तमाशा देख सकते थे, अभिज्ञाताओं की वे उपेक्षा कर सकते थे। ये सब शस्त्र उनके पास तक पहुँचते ही न थे, रास्ते ही में गिर पड़ते थे। पर रमेश के निशाने सिरों पर बैठते और अधिकारियों में हलचल और हाहाकार मचा देते थे।

देश की राजनीतिक स्थिति चिंताजनक हो रही थी। यशवन्त अपने पुराने मित्र के लेखों को पढ़-पढ़कर काँप उठते थे। भय होता, कहीं वह कानून के पंजे में न आ जाए। बार-बार उसे संयत रहने की ताकीद करते, बार-बार मिन्नतें करते कि जरा अपने कलम को और नरम कर दो, जान-बूझकर क्यों विषधर कानून के मुँह में उँगली डालते हो? लेकिन रमेश को नेतृत्व का नशा चढ़ा हुआ था। वह इन पत्रों का जवाब तक न देता था।

पाँचवें साल यशवन्त बदलकर आगरे का जिला-जज हो गया।

देश की राजनीतिक दशा चिन्ताजनक हो रही थी। खुफिया-पुलिस ने एक तूफान खड़ा कर दिया था। उसकी कपोल-कल्पित कथाएँ सुन-सुनकर हुक्कामों की रूह फ़ना हो रही थी। कहीं अखबारों का मुँह बंद किया जाता था, कहीं प्रजा के नेताओं का। खुफिया पुलिस ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए हुक्कामों के कुछ इस तरह कान भरे कि उन्हें हर एक स्वतन्त्र विचार रखने वाला आदमी खूनी और कातिल नजर आता था।

रमेश यह अंधेर देखकर चुप बैठने वाला मनुष्य न था। ज्यों-ज्यों अधिकारियों की निरंकुशता बढ़ती थी, त्यों-त्यों उसका भी जोश बढ़ता जाता था। रोज कहीं-न-कहीं व्याख्यान देता और उसके प्रायः सभी व्याख्यान विद्रोहात्मक भावों से भरे होते थे। स्पष्ट और खरी बातें कहना ही विद्रोह है। अगर किसी का राजनीतिक भाषण विद्रोहात्मक नहीं माना गया, तो समझ लो, उसने अपने आंतरिक भावों को गुप्त रखा है। उसके दिल में जो कुछ है, उसे जबान पर लाने का साहस उसमें नहीं है। रमेश ने मनोभावों को गुप्त रखना सीखा ही न था। प्रजा का नेता बनाकर जेल और फांसी से डरना क्या! जो आफत आनी हो, आये। वह सब कुछ सहने को तैयार बैठा था। अधिकारियों की आँखों में भी यही सबसे ज्यादा गड़ा हुआ था।

एक दिन यशवन्त ने रमेश को अपने यहाँ बुला भेजा। रमेश के जी में तो आया कि कह दे, तुम्हें आते क्या शर्म आती है! आखिर हो तो गुलाम ही! लेकिन फिर कुछ सोचकर कहला भेजा, कल शाम को आऊंगा। दूसरे दिन वह ठीक छह बजे यशवन्त के बंगले पर जा पहुँचा। उसने किसी से इसका जिक्र न किया। कुछ तो यह खयाल था कि लोग कहेंगे, मैं अफसरों की खुशामद करता हूँ और कुछ यह कि शायद इससे यशवन्त को कोई हानि पहुँचे।

वह यशवन्त के बंगले पर पहुँचा, तो चिराग जल चुके थे। यशवन्त ने आकर उसे गले से लगा लिया। आधी रात तक दोनों मित्रों में खूब बातें होती रहीं। यशवन्त ने इतने दिनों में नौकरी के जो अनुभव प्राप्त किए थे, सब बयान किए। रमेश को यह जानकर आश्चर्य हुआ, कि यशवन्त के राजनीतिक विचार कितने विषयों में मेरे विचारों से भी ज्यादा स्वतन्त्र हैं। उसका यह खयाल बिलकुल गलत निकला कि वह बिलकुल बदल गया होगा, वफादारी के राग अलापता होगा।

रमेश ने कहा- भले आदमी, जब इतना जले हुए हो, तो छोड़ क्यों नहीं देते नौकरी? और कुछ न सही, अपनी आत्मा की रक्षा तो कर सकोगे।

यशवन्त- मेरी चिन्ता पीछे करना, इस समय अपनी चिन्ता करो। मैंने तुम्हें सावधान करने को बुलाया है। इस वक्त सरकार की नजर में तुम बेतरह खटक रहे हो। मुझे भय है, कि तुम कहीं पकड़े न जाओ।

रमेश- इसके लिए तो तैयार बैठा हूँ।

यशवन्त- फिर आग में कूदने से लाभ ही क्या?

रमेश- हानि-लाभ देखना मेरा काम नहीं। मेरा काम तो अपने कर्तव्य का पालन करना है।

यशवन्त- हठी तो तुम सदा के हो, मगर मौका नाजुक है, संभले रहना ही अच्छा है। अगर मैं देखता कि जनता में वास्तविक जागृति है, तो तुमसे पहले मैदान में आता। पर जब देखता हूँ कि अपने ही मरे स्वर्ग देखना है, तो आगे कदम रखने की हिम्मत नहीं पड़ती।

दोनों दोस्तों ने देर तक बातें की। कॉलेज के दिन याद आये। सहपाठियों के लिए कॉलेज की पुरानी स्मृतियाँ मनोरंजन और हास्य का अविरल ओत हुआ करती हैं। अध्यापकों पर आलोचनाएँ हुईं, कौन-कौन साथी क्या कर रहा है, इसकी चर्चा हुई। बिलकुल यही मालूम होता था कि दोनों अभी भी कॉलेज के छात्र हैं। गम्भीरता नाम को भी न थी।

रात ज्यादा हो गई। भोजन करते-करते एक बज गया। यशवन्त ने कहा- अब कहीं जाओगे, यहीं सो रहो और बातें हों। तुम तो कभी आते भी कहीं? रमेश तो रमते जोगी थे ही, खाना खाकर बातें करते-करते सो गए। नींद खुली, तो नौ बज गए थे। यशवन्त सामने खड़े मुस्करा रहे थे।

इसी रात को आगरे में भयंकर डाका पड़ गया।

रमेश दस बजे घर पहुँचे, तो देखा, पुलिस ने उनका मकान घेर रखा है। इन्हें देखते ही एक अफसर ने वारंट दिखाया। तुरन्त घर की तलाशी होने लगी। मालूम नहीं, क्यों कर रमेश के मेज़ की दराज में से एक पिस्तौल निकल आयी। फिर क्या था, हाथों में हथकड़ी पड़ गई। अब किसे उनके डाके में शरीक होने से इनकार हो सकता था? और भी कितने ही आदमियों पर आफत आयी। सभी प्रमुख नेता चुन लिए गए मुकदमा चलने लगा।

औरों की बात तो ईश्वर जाने, पर रमेश निरपराध था। इसका उसके पास ऐसा प्रबल प्रमाण था, जिसकी सत्यता से किसी को इनकार न हो सकता था। पर क्या वह इस प्रमाण का उपयोग कर सकता था?

रमेश ने सोचा, यशवन्त स्वयं मेरे वकील द्वारा सफाई के गवाहों में अपना नाम लिखाने का प्रस्ताव करेगा। मुझे निर्दोष जानते हुए वह कभी मुझे जेल न जाने देगा। वह इतना हृदय-शून्य नहीं है। लेकिन दिन गुजरते जाते थे और यशवन्त की ओर से इस प्रकार का कोई प्रस्ताव न होता था, और रमेश खुद संकोचवश उसका नाम लिखाते हुए डरते थे। न-जाने इसमें उसे क्या बाधा हो। अपनी रक्षा के लिए वह उसे संकट में न डालना चाहते थे।

यशवन्त हृदय-शून्य न थे, भाव-शून्य न थे, लेकिन कर्म-शून्य अवश्य थे। उन्हें अपने परम मित्र को निर्दोष मारे जाते देखकर दुःख होता था, कभी-कभी रो पड़ते थे, पर इतना साहस न होता था कि सफाई देकर उसे छुड़ा लें। न जाने अफसरों को क्या खयाल हो। कहीं यह न समझने लगें कि मैं भी षड्यन्त्रकारियों से सहानुभूति रखता हूँ। मेरा भी उनके साथ कुछ सम्पर्क है। यह मेरे हिन्दुस्तानी होने का दंड है। जानकर जहर निगलना पड़ रहा है। पुलिस ने अफसरों पर इतना आतंक जमा दिया है कि चाहे मेरी शहादत से रमेश छूट भी जाए, खुल्लमखुल्ला मुझ पर अविश्वास न किया जाए, पर दिलों से यह सन्देह क्यों कर दूर होगा कि मैंने केवल एक स्वदेश-बन्धु को छुड़ाने के लिए झूठी गवाही दी? और बन्धु भी कौन? जिस पर राज विद्रोह का अभियोग है।

इसी सोच-विचार में एक महीना गुजर गया। उधर मजिस्ट्रेट ने यह मुकदमा यशवन्त ही के इजलास में भेज दिया। डाके में कई खून हो गए थे और मजिस्ट्रेट को उतनी कड़ी सजाएँ देने का अधिकार न था, जितनी उसके विचार में दी जानी चाहिए थीं।