उनके नाम उसकी जिह्वा पर उसी तरह आते थे जिस तरह अपने तीनों बच्चों के। कोई चौबीसों था, बाइसों था, कोई नाले वाला, कोई तलैया वाला। इन नामों के स्मरण होते ही खेतों का चित्र उसकी आंखों के सामने खिंच जाता था। वह इन खेतों की चर्चा इस तरह करता मानों वे सजीव हैं। आगे उसके भले-बुरे के साथी हैं। उसके जीवन की सारी आशाएं, सारी इच्छाएं, सारे मनसूबे, सारी मन की मिठाइयां, सारे हवाई किले इन्हीं खेतों पर अवलम्बित थे। इनके बिना वह जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकता था। और वे ही अब हाथ से निकले जाते हैं। वह घबराकर घर से निकल जाता और घंटों उन्हीं खेतों के मेड़ों पर बैठ हुआ रोता, मानों उनसे विदा हो रहा हो। इस तरह एक सप्ताह बीत गया और गिरधारी रुपये का कोई बन्दोबस्त न कर सका। आंखें दिन उसे मालूम हुआ कि कालिकादीन ने 100 रु. के नजराने देकर 10 रुपये बीघे पर खेत ले लिए। गिरधारी ने एक ठंडी सांस ली। एक क्षण के बाद वह अपने दादा का नाम लेकर बिलख-बिलख रोने लगा। उस दिन घर में चूल्हा नहीं जला। ऐसा मालूम होता था मानो हरखू आज ही मरा।
लेकिन सुभागी यों चुपचाप बैठने वाली स्त्री न थी। वह क्रोध से भरी हुई कालिकादिन के घर गयी और उसकी स्त्री को खूब लताड़ा – कल का बानी आज का सेठ, खेत जोतने चले हैं। देखें, कौन मेरे खेत में हल ले जाता है? अपना और उसका लहू एक न कर दूं। पड़ोसियों ने उसका पक्ष किया, सब तो हैं, आपस में यह चढ़ा-ऊपरी नहीं करना चाहिए। नारायण वे धन दिया है, तो क्या गरीबों को कुचलते फिरेंगे। सुभागी ने समझा, मैंने मैदान मार लिया। उसका चित्त शांत हो गया। किंतु वही वायु जो पानी में लहरें पैदा करती है, वृक्षों को जड़ से उखाड़ डालती है। सुभागी तो पड़ोसियों की पंचायत में अपने दुखड़े रोती और कालिकादीन की स्त्री से छेड़-छाड़ लड़ती। इधर गिरधारी अपने द्वार पर बैठा हुआ सोचता, अब मेरा क्या हाल होगा? अब यह जीवन कैसे कटेगा? ये लड़के किसके द्वार पर जायेंगे? मजदूरी का विचार करते ही उसका हृदय व्याकुल हो जाता। इतने दिनों तक स्वाधीनता और सम्मान का सुख भोगने के बाद अधम चाकरी की शरण लेने के बदले वह मरना अच्छा समझता था। वह अब तक गृहस्थ था, उसकी गणना गांव के भले आदमियों में थी, उसे गांव के मामले में बोलने का अधिकार था। उसके घर में धन न था, पर मान था। नाई, बढ़ई, कुम्हार, पुरोहित, भाट, चौकीदार ये सब उसका मुंह ताकते थे। अब यह मर्यादा कहां! अब कौन उसकी बात पूछेगा। कौन उसके द्वार पर जावेगा? अब उसे पेट के लिए दूसरों की गुलामी करनी पड़ेगी। अब पहर रात रहे कौन बैलों को नांद में लगायेगा। वह दिन अब कहां, जब गीत गा-गाकर हल चलाता था। चोटी का पसीना एड़ी तक आता था, पर जरा भी थकावट न आती थी। अपने लहलहाते हुए खेतों को देखकर फूला न समाता था। खलिहान में अनाज का ढेर सामने रखे अपने को राजा समझता था। अब अनाज के टोकरे भर-भरकर कौन लायेगा?
अब खत्ते कहां? बखार कहां? यही सोचते-सोचते गिरधारी की आंखों से आंसू की झड़ी लग जाती थी। गांव के दो-चार सज्जन, जो कालिकादीन से जलते थे, कभी-कभी गिरधारी को तसल्ली देने आया करते थे, पर वह उनसे भी खुल कर न बोलता। उसे मालूम होता था कि मैं सबकी नजर में गिर गया हूं।
अगर कोई समझाता कि तुमने क्रिया-कर्म में व्यर्थ इतने रुपये उड़ा दिए, तो उसे बहुत दुःख होता। वह अपने उस काम पर जरा भी न पछताया। मेरे भाग्य में जो लिखा है वह होगा, पर दादा के ऋण से उऋण हो गया। उन्होंने अपनी जिंदगी में चार बार खिलाकर खाया, क्या मरने के पीछे उन्हें पिंड पानी को तरसाता।
इस प्रकार तीन मास बीत गए और अषाढ़ आ पहुंचा। आकाश में घटाएं आयी, पानी गिरा, किसान हल-जुए ठीक करने लगे। बढ़ई हलों की मरम्मत करने लगा। गिरधारी पागल की तरह कभी घर के भीतर जाता, कभी बाहर आता, अपने हलों को निकाल-निकाल देखता। इसकी मुठिया टूट गयी है, इसकी फाल ढीली हो गयी है, जुए में सैला नहीं है। यह देखते-देखते वह एक क्षण अपने को भूल गया। दौड़ा हुआ बढ़ई के यहां गया और बोला – रज्जू, मेरे हल भी बिगड़े हुए हैं, चलो बना दो। रज्जू ने उसकी ओर करुणाभाव से देखा और अपना काम करने लगा। गिरधारी को होश आ गया, नींद से चौक पड़ा, ग्लानि से उसका सिर झुक गया, आंखें भर आयीं। चुपचाप घर चला आया।
गांव के चारों ओर हलचल मची हुई थी। कोई सन के बीज खोजता फिरता था, कोई जमींदार के चौपाल से धान के बीज लिए आता था, कहीं सलाह होती थी, किस खेत में क्या बोना चाहिए, कहीं चर्चा होती थी कि पानी बहुत बरस गया, दो-चार दिन ठहर कर बोना चाहिए। गिरधारी ये बातें सुनता और जलहीन मछली की तरह तड़पता था।
एक दिन संध्या समय गिरधारी खड़ा अपने बैलों को खुजला रहा था कि मंगलसिंह आये और इधर-उधर की बातें करके बोले – गोई को बांधकर कब तक खिलाओगे? निकाल क्यों नहीं देते? गिरधारी ने मलिन भाव से कहा – हां, कोई गाहक आवे तो निकाल दूं।
मंगलसिंह – एक गाहक तो हमीं है, हमीं को दे दो।
गिरधारी – अभी कुछ उत्तर न देने पाया था कि तुलसी बनिया आया और गरज कर बोला – गिरधर, तुम्हें रुपये देने है कि नहीं, वैसा कहो। तीन महीने से हीला-हवाला करते चले आते हो। अब कौन खेती करते हो कि तुम्हारी फसल को अगोरे बैठे रहें।
गिरधारी ने दीनता से कहा – साह, जैसे इतने दिनों माने हो आज और मान जाओ। कल तुम्हारी एक-एक कौड़ी चुका दूंगा।
मंगल और तुलसी ने इशारे से बातें की और तुलसी भुनभुनाता हुआ चला गया। तब गिरधारी मंगलसिंह से बोला – तुम इन्हें ले लो तो घर के घर ही में रह जाए । कभी-कभी आंख से देख तो लिया करूंगा।
मंगल – मुझे अभी तो ऐसा कोई काम वहीं है, लेकिन घर पर सलाह करूंगा।
गिरधारी – मुझे तुलसी के रुपये देने हैं, नहीं तो खिलाने को तो भूसा है।
मंगल – यह बड़ा बदमाश है, -कहीं नालिया न कर दे।
सरल हृदय गिरधारी धमकी में आ गया। कार्य-कुशल मंगलसिंह को सस्ता सौदा करने का यह अच्छा सुअवसर मिला 80 रुपये की जोड़ी 60 रु. में ठीक कर ली।
गिरधारी ने अब तक बैलों को न जाने किस आशा से बांधकर खिलाया था। आज आशा का यह कल्पित सूत्र भी छिन गया। मंगलसिंह गिरधारी की खाट पर बैठे रुपये गिन रहे थे और गिरधारी बैलों के पास विषादमय नेत्रों से उनके मुंह की ओर ताक रहा था। आह! यह मेरे खेतों के कमाने वाले, मेरे जीवन के आधार, मेरे अन्नदाता, मेरी मान-मर्यादा की रक्षा करने वाले, जिनके लिए पहरी रात से उठकर छांटी काटता था, जिनके खली-दाने की चिन्ता अपने खाने से ज्यादा रहती थी, जिनके सिर सारा घर दिन भर हरियाली उखाड़ा करता था, ये मेरी आशा की दो आंखें, मेरे इरादे के दो तारे, मेरे अच्छे दिनों के दो चिह्न, मेरे दो हाथ, अब मुझसे विदा हो रहे हैं।
अब मंगलसिंह ने रुपये गिनकर रख दिए और बैलों को ले चले। तब गिरधारी उनके कंधों पर सिर रखकर खूब छूट-छूकर रोया जैसे कन्या मायके से विदा होते समय मां-बाप के पैरों को नहीं छोड़ती, उसी तरह गिरधारी इन बैलों को न छेड़ता था। सुभागी भी दालान में खड़ी हो रही थी। और छोटा लड़का मंगलसिंह को एक बांस की छड़ी से मार रहा था।
रात को गिरधारी ने कुछ नहीं खाया। चारपाई पर पड़ा रहा। प्रातःकाल सुभागी चिलम भरके ले गयी तो वह चारपाई पर न था। उसने समझा, कही गये होंगे। लेकिन जब दो-तीन घड़ी दिन चढ़ आया और वह न लौटा तो उसने रोना-धोना शुरू कर किया। गांव के लोग जमा हो गए, चारों और खोज होने लगी, पर गिरधारी का पता न चला।
संध्या हो गई। अंधेरा छा रहा था। सुभागी ने दिया जलाकर, गिरधारी के सिरहाने रख दिया था और बैठी द्वार की ओर ताक रही थी कि सहसा उसे पैरों की आहट मालूम हुई। सुभागी का हृदय धड़क उठा। वह दौड़कर बाहर आयी, और इधर-उधर ताकने लगी। उसने देखा कि गिरधारी बैलों की नाद के पास सिर झुकाए खड़ा है।
सुभागी बोल उठी – घर आओ, वहां खड़े क्या कर रहे हो। आज सारे दिन कहां रहे? यह कहते हुए वह गिरधारी की ओर चली। गिरधारी ने कुछ उत्तर न दिया। वह पीछे हटने लगा और थोड़ी दूर जाकर गायब हो गया। सुभागी चिल्लायी और मूर्छित होकर गिर पड़ी।
दूसरे दिन कालिकादीन हल लेकर खेत पर पहुंचे, अभी कुछ अंधेरा था। बैलों को हल में लगा रहे थे कि यकायक उन्होंने देखा कि गिरधारी खेत की मेंड़ पर खड़ा है, वहीं मिर्जई, वही पगड़ी, वही सोंटा।
कालिकादीन ने कहा – अरे गिरधारी, मरदे आदमी, तुम यहां खड़े हो, और बेचारी सुभागी हैरान हो रही है। कहां से आ रहे हो? यह कहते हुए बैलों को छोड़कर गिरधारी की ओर चले, गिरधारी पीछे हटने लगा और पीछे वाले कुएं में कूद पड़ा। कालिकादीन ने चीख मारी और हल-बैल वहाँ छोड़कर भागा। सारे गांव में शोर मच गया, और लोग नाना प्रकार की कल्पनाएं करने लगे। कालिकादीन को गिरधारी वाले खेतों में जाने की हिम्मत न पड़ी। 6 महीने बीत चुके हैं। उसका बड़ा लड़का अब एक ईंट के भट्ठे पर काम करता है और 20. रु महीना घर लाता है। अब वह कमीज और अंग्रेजी जूता पहनता है, घर में दोनों जून तरकारी पकती है और जौ के बदले गेहूं खाया जाता है, लेकिन गांव में उसका कुछ भी आदर नहीं। वह अब मजूरा है। सुभागी अब पराये गांव में आये हुए कुत्ते की भांति दबकती फिरती है। अब पंचायत में नहीं बैठती। वह अब मजूर की मां है। कालिकादीन ने गिरधारी के खेतों से इस्तीफा दे दिया है, क्योंकि गिरधारी अभी तक अपने खेतों के चारों तरफ मंडराया करता है। अंधेरा होते ही वह मेंड़ पर आकर बैठ जाता है और कभी-कभी रात को उधर से उसके रोने की आवाज सुनाई देती है। वह किसी से बोलता नहीं, किसी को छेड़ता नहीं। उसे केवल अपने खेतों को देखकर सन्तोष होता है। दिया जलने के बाद उधर से रास्ता बंद हो जाता है।
लाला ओंकारनाथ बहुत चाहते हैं कि ये खेत उठ जायें लेकिन गांव के लोग अब उन खेतों का नाम लेते डरते है।
