‘लुटा करके सोने-सा प्यार! यह पद मेरे मर्मस्थल को तीर की भांति छेदता हुआ चला गया। मेरे रोए खड़े हो गए। आंखों से आँसू की झड़ी लग गई। ऐसा मालूम हुआ जैसे कोई प्रियतम को मेरे हृदय से निकाले लिये जाता है। मैं जोर से चिल्ला पड़ी। उसी समय पतिदेव की नींद खुल गई। वह मेरे पास आकर बोले- अभी तुम चिल्लायी थी? अरे, तुम तो रो रही हो? क्या बात है? कोई स्वप्न तो नहीं देखा?
मैंने सिसकते हुए कहा- रोऊँ न, तो क्या हंसू?
स्वामी ने मेरा हाथ पकड़कर कहा- क्यों, रोने का कोई कारण है, या यों ही रोना चाहती हो?
क्या मेरे रोने का कारण तुम नहीं जानते?
मैं तुम्हारे दिल की बात कैसे जान सकता हूँ?
तुमने जानने की कभी चेष्टा की?
मुझे इसका मान-गुमान भी न था कि तुम्हारे रोने का कोई कारण हो सकता है।
तुमने तो बहुत कुछ पढ़ा है, क्या तुम भी ऐसी बात कह सकते हो? स्वामी ने विस्मय में पड़कर कहा- तुम तो पहेलियां बुझवाती हो?
क्यों, क्या तुम कभी नहीं रोते?
मैं क्यों रोने लगा?
तुम्हें अब कोई अभिलाषा नहीं है?
मेरी सबसे बड़ी अभिलाषा पूरी हो गई। अब मैं और कुछ नहीं चाहता। यह कहते हुए पतिदेव मुस्कराए और मुझे गले से लिपटा लेने को बढ़े। उनकी यह हृदयहीनता इस समय मुझे बहुत बुरी लगी। मैंने उन्हें हाथों से पीछे हटाकर कहा- मैं इस स्वाँग को प्रेम नहीं समझती। जो कभी रो नहीं सकता, वह प्रेम नहीं कर सकता। रुदन और प्रेम, दोनों एक ही स्त्रोत से निकलते हैं।
अनोखे-से नेही के त्याग
निराले पीड़ा के संसार।
कहाँ होते हो अंतर्धान?
लुटा करके सोने-सा प्यार!
पतिदेव के मुख की वह मुस्कुराहट लुप्त हो गई। उन्हें एक बार काँपते देखा। ऐसा जान पड़ा, उन्हें रोमांच हो रहा है। सहसा उनका दाहिना हाथ उठकर उनकी छाती तक गया। उन्होंने लंबी साँस ली और उनकी आंखों से आंसू की बूंदें निकलकर गालों पर आ गई। तुरन्त मैंने रोते हुए उनकी छाती पर सिर रख दिया और उस परम सुख का अनुभव किया, जिसके लिए कितने दिनों से मेरा हृदय तड़प रहा था। आज फिर मुझे पतिदेव का हृदय धड़कता हुआ सुनाई दिया, आज उनके स्पर्श में फिर स्फूर्ति का ज्ञान हुआ। अभी तक उस पद के शब्द मेरे हृदय में गूँज रहे थे-
कहाँ होते हो अंतर्धान
लुटा करके सोने-सा प्यार*
- महादेवी वर्मा की कविता का एक पद
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