Hindi Kahani: “अरे!” गाड़ी रुकते ही ज्यों दुकान की ओर निगाह डाली तो आँखों पर विश्वास न कर पाई ।
गद्दी पर बड़े भैया को बैठे देखकर मधुरा की आँखों में ख़ुशी मिश्रित आश्चर्य तैर गया।
बरसों से बढ़ाई गई दाढ़ी नदारद थी ,साफ सुथरा कुर्ता पायजामा पहने ,बचपन वाले भैया के चेहरे में उसे वो लापरवाह अजय ढूँढने से भी नहीं मिल रहा था |
पर उसी पल उदासी के घने बादल भी उसके मुखड़े पर छा गए,बस पानी आँखों से बरसा था।
काश …आज बाबूजी होते तो, उनका जी भर जाता ,पर अब कितनी देर हो चुकी है, उसने निराशा से विचार किया।
दीवार में लगी रामदयाल जी की तस्वीर भी उनके हताशा से कहे गए शब्द,दोहरा रही थी,
“देखना अजय बदलेगा ,लेकिन ,तब जब हम नहीं रहेंगे,पूरी उम्र इसने मुझे निराश करने में निकाल दी।
मधुरा को समझ में नहीं आ रहा था उस दिन , वह क्या प्रतिक्रिया दे, उनकी तकलीफ़ पर दुःखी हो या भाई के बर्ताव को उसका प्रतिशोध माने।
दुकान में पहले वाली बात अब न बची थी पर चाचा का एक नया शोरूम और बढ़ गया था,जगह थी बड़े भैया की दुकान।
दशकों से परिवार और बड़े बेटे के बीच अबोला था,वह कब आता कब जाता किसी को भनक न लगती।
बड़े भैया के होठों पर चिपकी ख़ामोशी हवा में ऐसे पसर जाती थी,जैसे रात को आँगन की नीम की महक।
उसके ब्याह ,विदाई में भी भैया के होंठ नपा तुला बोले,बेटा गोद मे लेकर जब ससुराल से लौटी तो खामोश आँखों से ही खिलाते रहे दूर से।
बाद में बच्चे भी बड़े मामा के नाम से ही दूरी बनाने लगे साया तो दूर की कौड़ी था
मथुराप्रसाद एन्ड सन्स की धाक थी,पूरे जिले में,स्टेशन से आये अजनबी को लोग घर तक छोड़ जाते थे।
उस घर ने सबको अपनाया ,बस अछूता रहा तो उसी घर का बड़ा बेटा ,जो आज एक असफ़ल पत्रकार नाक़ाम इन्सान बनकर घूम रहा था,जिससे न परिवार ख़ुश था ,न बाजार।
पर वो शुरू से ऐसे न थे,अपनी किशोरावस्था से ही बड़े चैतन्य व्यक्तित्व के मालिक थे।
बाहर घूमने जाते तो नये फैशन की कपड़े सबसे पहले उनके प्रतिष्ठान की शोभा बनते।
व्यापार की बारीकियों में जवानी का जोश और रामदयाल के अनुभव का होश उसे दिन दूना रात चौगुना बढ़ा रहा था ।
कभी बहुत छोटे से व्यापार से हुई शुरुआत ने मेन मार्केट में चार-चार शोरूम वाली दुकानों की शक्ल अख्तियार कर ली थी।
रामदयाल जी ने अपने तीन छोटे भाइयों को भी अपने खड़े किये गये व्यापार में हिस्सेदार बनाया ,क्योंकि उनकी माँ तो बचपन में ही परलोक सिधार गईं थीं।
पिता को मरते समय दिये गये वचन के चलते वो भाई की भूमिका निभाते निभाते पति और पिता की भूमिका से ईमानदार न रह पाये।
अजय भैया और छोटे चाचा की उम्र में बहुत ज्यादा फ़र्क़ न था। सो उनका दुगना लिहाज़ करना होता था।
अम्मा बताती थी,” जब वो ब्याह कर आई थीं तो सोने से लदी थीं,और जैसे जैसे चाचा लोग ब्याहते गये।अम्मा के ज़ेवर हल्के होते गए।”
छोटी चाची ने शुरू से ही, फर्क़ बनाये रखा,पर अम्मा किसी से न कर सकीं ,|
क्योंकि रिश्ते में चाची उनकी अनाथ भतीजी थी,जो सौतेली माँ से दुःखी भी थीं।
उनके बच्चों के लिये घर में अम्मा ने अपने बच्चों में फ़र्क़ किया,तो दुकानों में बाबू ने भी दोहरा रवैया अपनाए रखा।
अजय ख़ुद को साबित करने में , बाज़ार सँभालता रहा और चाचा गुल्लक।
एक रात कोट बदलने पर उसे भीतर चल रही धांधली की भनक लगी थी।
ग़रीब घर की चाची के भाई उसके व्यापार में सेंधमारी करते रहे और चोरी का इल्जाम आया युवा होते अजय के सिर।
बाबू ने रस्सियों से पूरे घर के सामने पहली बार मारा ,उसे बचाने आई अम्मा को भी ,चाचा ढीठ बने अपनी जीत पर मुस्कुराते रहे।
चाचा की चुगली की सँख्या बढ़ती गयी और अजय पर रामदयाल की सख़्ती,जब तक उनकी आँखें खुलतीं देर हो चुकी थी।
अजय भैया ने पहली बार भाभी को एक सोने की अँगूठी दी थी ,अपनी बचत से और चाचा ने चाची के साथ मिलकर बड़ा हंगामा किया।
बाबू ने बहू को उसी रात घर फोड़ने के आरोप में मायके भिजवा दिया,और अजय को दुकान से उतर कर मार लगाई।
युवा मन यह सार्वजनिक अपमान न सह पाया और होंठ सी लिये पर हफ़्ते भर के बाद , एक रात में सारे काले और कच्चे चिट्ठे बाबू के कमरे में रख घर छोड़कर चला गया।
गरीब घर की चाची …कई खेतों और बड़ी कोठी की मालकिन थी ,परिवार का एका नदारद था।रामदयालजी ख़ुद को छला हुआ महसूस कर हताश हो गये।
जिन भाइयों को उन्होंने योग्यता न होने पर भी सीने से लगाये रखा ,परिवारिक एकता के नाम पर जो पट्टी बाँध रखी थी वह आँसुओं से जर्जर हो चुकी थी।
उन्होंने पहली बार अजय का नाम पूरी पीड़ा से पुकारा और फूट फूटकर रो दिये,अखबारों में ख़बर ,टीवी पर विज्ञापन के बाद भी अजय उस शहर में दिखाई न दिया।
महीनों बाद दिखाई पड़ा तो तब, जब रामदयाल जी को उनके भाइयों ने उनकी ही कमाई से बेदखल करने की कोशिश की ।
उनके भतीजे भी पहली बार लाठी डण्डे लेकर अपने ताऊ के विरुद्ध उन्हें घेरकर खड़े थे,रामदयाल जी ने अपने जीवन की आशा छोड़ ही दी थी कि बाज़ार के लोग आननफानन उन्हें घेरकर खड़े हो गये।
अर्से बाद उनके पीछे खड़ा था सूनी आँखे लिये बेहाल हालत में अजय जवान बेटे के सहारे ने उनमें नई हिम्मत भर दी।
उस दिन उन्हें सही अर्थों में बेटे का मतलब पता चला,कानून और पुलिस की सहायता से वो अपने हिस्से का कुछ व्यापार बचाने में सफ़ल हो गये।
पर अजय की आँखों मे पहले वाला अपने लिये विश्वास न देख सके,अजय अब एक पत्रकार बन चुका था ,जो अन्याय के ख़िलाफ़ लिखता था,पर ख़ुद के लिये कभी खड़ा न हुआ।
बाबू से उसकी जंग जारी रही वो उनका सामना करने से बचता रहा ,पर फ़र्ज़ में कटौती न कर पाया।
मधुरा पिता के जाने के बाद, पहली बार मायके आई थी,अजय के सीने से लिपटकर रो पड़ी।
भैया…बाबू ने भरोसे में इसबार सही निवेश किया।
और दोनों मुस्कुरा उठे।
निवेश—गृहलक्ष्मी की कहानियां
