Women Struggle Story: हर साल रिजल्ट आने पर जब हम न्यूज़ में लड़कियों को खुशी से उछलते देखते हैं तो ये बड़ी लुभावनी सी तस्वीर लगती है, लेकिन सच्चाई ये है कि लड़कियों की शिक्षा के सामने चुनौतियां कल भी कम नहीं थीं और आज भी कम नहीं हैं। एक नज़र इसी पर-
शायद ही कोई हो, जो ये बात न जानता हो कि जब कोई एक पुरुष पढ़ता है तो केवल एक व्यक्ति ही शिक्षित होता है, लेकिन जब कोई स्त्री पढ़ती है तो एक पूरा परिवार पढ़ता है, एक पूरी पीढ़ी संवरती है, एक पूरा समाज विकसित होता है। हमेशा से इस बात को कहा गया, सुना गया, लेकिन सुनकर कितनी आसानी से अनसुना भी कर दिया गया, इसका ठोस सबूत ये है कि आज भी भारत में महिलाओं की शिक्षा का अनुपात पुरुषों के मुकाबले बहुत ही पिछड़ा हुआ है। यहां पर शिक्षा की वर्तमान विकास दर के आधार पर जो अनुमान लगाया जाता है, उसके अनुसार, भारत वर्ष 2060 में जाकर सार्वभौमिक शिक्षा के लक्ष्य तक पहुंच पाएगा। उसमें भी महिलाओं की शिक्षा के प्रति सामाजिक उदासीनता अभी तक समाप्त नहीं हुई है। बड़े शहरों में स्थिति भले ही उम्मीद जगाती हो, लेकिन छोटे शहर और गांव-देहात अभी तक इस विषय में पूर्वाग्रहों से भरे हुए हैं।
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बेटों के मोह का शिकार बेटियां
कई परिवार में लड़कियों की शिक्षा को गैर ज़रूरी मान लिया जाता रहा है और यदि जागरुकता के अनथक प्रयासों के चलते इस पर ध्यान दिया भी गया तो ये धारणा भी उसके साथ चलती रही कि लड़कियों को ‘ज़रूरत लायकÓ पढ़ा दिया जाना ही काफी है, क्योंकि शादी के बाद तो वे अपने घर चली जाएंगी, बेटों की तरह माता-पिता का भरण-पोषण तो करेंगी नहीं। फिर उनके लिए ज्यादा महंगे स्कूल या उच्च शिक्षा पैसे की बर्बादी ही है।
एक से बढ़कर एक मिसाल पेश कर रही हैं बेटियां, लेकिन आज भी सामाजिक तौर पर यही माना जाता है कि बुढ़ापे का सहारा तो बेटा ही होता है। वही बुढ़ापे में रोटी भी खिलाएगा और मोक्ष भी दिलाएगा। कितना अजीब लग रहा है न ये सब जानना, लेकिन यही सच है। हमारा देश आज भी बेटों के मोह से उबर नहीं पाया है और ये $फर्क महिलाओं की शिक्षा पर भी सा$फ नज़र आता है।
शिक्षा दिलाती है सम्मान-समानता
किसी भी समाज का विकास तभी होता है, जब उसके नागरिक शिक्षित हों। वे अपने अधिकार भी जानते हों और कर्तव्य भी। इसी के आधार पर वे विकास में अहम भूमिका निभाने में जनसंख्या नियंत्रण के महत्त्व को समझ और अपना पाते हैं। शिक्षा के महत्त्व को समझकर अपने सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा-संस्कार और नैतिकता के गुण सिखाते हैं। सामाजिक विकास की अहमियत समझकर उसके प्रति $खुद भी जागरूक होते हैं और व्यस्था को भी जवाबदेह बनाते हैं। संसाधनों के प्रति संवेदनशील रहते हैं। इसके उलट एक निरक्षर स्त्री की जि़ंदगी आधी-अधूरी सामाजिक सहभागिता और सम्मान के साथ सिर्फ़ सांस लेने का दूसरा नाम होती है। वह या तो अपनी दशा और दिशा के प्रति जागरूक होती ही नहीं और अगर होती भी है तो अपने अधिकार को पाने से कोसों दूर होती है।
आज भी इस देश की महिलाओं का एक बड़ा वर्ग अपने जीवन का लक्ष्य सिर्फ़ अपने परिवार को ही मानता है। अपने विकास, खान-पान, स्वास्थ्य, शिक्षा-दीक्षा को वह इतना महत्त्व नहीं देता। परिवार की धुरी की भूमिका में वे कब पैदा होती हैं, कब मर जाती हैं, किसी को ये $फर्क नहीं पड़ता, स्वयं उन्हें भी नहीं। यही वजह है कि अपने बच्चों की परवरिश के समय भी वे शिक्षा के महत्त्व के प्रति उपेक्षित रहती हैं। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर न तो वे ज़्यादा ध्यान दे पाती हैं, न ये समझ पाती हैं कि उनकी रुचि, विकास और भविष्य के हिसाब से उनके लिए क्या और कैसे पढ़ना चाहिए। वे सिर्फ़ इसी बात को ही का$फी मान लेती हैं कि उनके बच्चे स्कूल जाते हैं।
समाधान से ज़्यादा हैं समस्याएं
एक स्त्री के लिए शिक्षा के संबंध में समस्या सिर्फ़ यही नहीं है कि वे स्कूल तक नहीं पहुंच पाती हैं। अगर वे स्कूल जाती भी हैं तो ये ‘जाता रहना भी कम मुश्किल काम नहीं है। पूरे देश का हाल तो छोड़िए, अगर सिर्फ़ उत्तर प्रदेश जैसे एक राज्य को ही ले लिया जाए तो वहां आज भी लगभग 54 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में ज़रूरी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, जैसे कि पीने का पानी, लड़कियों के लिए अलग सा$फ टॉयलेट्स का होना, स्कूलों में महिला टीचर का होना, स्कूल का घर के पास होना, व$गैरह। शायद मैट्रो सिटिज़ में बैठे लोगों को ये इतनी बड़ी बात न लगे, लेकिन यही वे बड़े कारण हैं, जिनके चलते आज भी एक लड़की की पढ़ाई छूट जाना आम बात है।
इसके अलावा अधिकांश परिवारों में लड़कियों पर घरेलू कामों में हाथ बंटाने की जि़म्मेदारी बहुत कमउम्र में आ जाती है। खुद बच्ची होने के बावजूद वे अपने से छोटे भाई-बहनों को गोद में उठाए मिल जाती हैं। मां के साथ घरेलू कामों में हाथ बंटाना एक लड़की के लिए बेहद ज़रूरी समझा जाता है, क्योंकि यह आम धारणा है कि चाहे जितना मज़ीर् पढ़-लिख लें, चलाना तो उन्हें घर ही है। सो उनके पांव ज़मीन पर लगे नहीं कि जि़म्मेदारियां पहले ही किसी न किसी रूप में उनके कंधों पर आ जाती हैं।
अपने ही अस्तित्व से अनजानी

जब बात साक्षरता के लेवल से ही ऊपर नहीं उठ पा रही हो तो स्त्रियों की उच्चशिक्षा की बात करना मज़ाक जैसा ही लगता है। उस पर दुखद ये है कि अपनी उच्चशिक्षा के प्रति $खुद लड़कियां भी ज़्यादा गंभीर नहीं होती हैं। यहां तक कि वे अगर किसी जागरुकता के चलते उच्चशिक्षा के लिए कदम बढ़ाती भी हैं तो या तो उसे गंभीरतापूर्वक पूरा नहीं करती हैं या शुरू करने के कुछ ही समय बाद अथवा शादी के बाद बीच में छोड़ देती हैं। नौकरी और करियर के बीच का अंतर आज भी लिए कुछ $खास नहीं है। उनके लिए अच्छी शिक्षा, अच्छी सैलरी दिलाने वाली नौकरी से ज़्यादा नहीं होती है। इसके साथ उनका संपूर्ण विकास, उनका अस्तित्व जुड़ा है, ये बात कम ही लड़कियों के जीवन में उतर पाई है। यही वजह है कि एक स्त्री के रूप में उनका अस्तित्व और सुरक्षा कल भी सवालों के घेरे में थे और आज भी उसी घेरे में हैं, क्योंकि ये दायरे उन्होंने $खुद ही $खुद के लिए बनाए हुए हैं। जिन स्त्रियों ने अलग-अलग कारणों के चलते शिक्षा के महत्त्व को पहचाना है और अपनी बेटियों की जि़ंदगी में इसका उजाला भरा है, वही समाज का भी अंधकार मिटाने लायक बन पाई हैं। आज जिन मु भर स्त्रियों के दम पर समाज ने बेटियों की शिकषा के महत्त्व को पहचाना है, उन्होंने हर समस्या के समाधान के तौर पर शिक्षा को अपनाया है। ये उजाला अभी दूर तक जाना बाकी है, क्योंकि इन मुी भर सितारों की रोशनी अभी पूरे आसमान का अंधेरा मिटाने के लिए का$फी नहीं है।
यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट के आधार पर ये जानना आज भी दुखद है कि भारत दुनिया के सबसे अशिक्षित देशों की सूची में आज भी बहुत ऊपर है। यहां पर सार्वभौमिक शिक्षा का न्यूनतम लक्ष्य भी वर्ष 2050 तक जाकर पूरा होने पाने का अनुमान है। माध्यमिक शिक्षा 2060 तक के लक्ष्य के साथ चल रही है और उच्च शिक्षा तो और आगे के वर्षों तक भी जाकर पूर्ण लक्ष्य पा ले, ये एक सपना ही
कहा जा सकता है।
एक अन्य अनुमान के अनुसार, पुरुषों की साक्षरता दर जहां 82.14 प्रतिशत के आसपास है, वहीं महिला साक्षरता दर 65.46 पर ही सीमित है। शिक्षा के मामले में केरल पिछले लगभग तीन दशक से पूरे देश के लिए एक बड़ी प्रेरणा का काम करता आया है। यूनेस्को के नियमों के अनुसार यदि किसी देश या राज्य की 90 प्रतिशत जनसंख्या साक्षर हो तो उसे ‘पूर्ण साक्षरÓ मान लिया जाता है और इसके अनुसार केरल को यह दर्जा वर्ष 1991 में ही मिल चुका है। वर्ष 2001 में केरल की साक्षरता दर 90.86 फीसदी थी, जोकि 2011 में बढ़कर 94 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, लेकिन ऊंची शिक्षा दर और स्कूल ड्रॉपआउट रेट बेहद कम होने के बावजूद केरल में लगभग 18 लाख लोग निरक्षर हैं, इसलिए सरकार ने इस दिशा में ‘अक्षरलक्ष्यÓ साक्षरता योजना के नाम से नई शुरुआत कर दी है, जिसका लक्ष्य 100 प्रतिशत साक्षरता है। यदि राज्यों के विकास पर भी नज़र डाली जाए तो केरल की स्थिति दूसरे राज्यों के लिए एक आदर्श क्यों मानी जाती है, इसे आसानी से यहां के शिक्षित समाज से जोड़कर देखा जा सकता है।
