सुमेरपुर की राजकुमारी थी सुगंधा। राजा अनंगदेव की अकेली बेटी। वह बड़ी सुंदर और गर्वीली थी। उसे लगता था, दुनिया में उस जैसा सुंदर कोई और नहीं है। इसलिए सबको अपने से नीचा समझती थी। और जब चाहे किसी का भी अपमान कर देती थी।
राज्य का युवा व्यापारी सोमाली उसे बहुत चाहता था। एक दिन वह दूर देशों में व्यापार के लिए निकला। जाने से पहले राजकुमारी सुगंधा के पास आकर बोला, ”मेरा जहाज यात्रा के लिए तैयार खड़ा है। मैं दौड़ा-दौड़ा आपकी इच्छा जानने के लिए आया हूँ। बताइए, विदेश से आपके लिए क्या लाऊँ!”
सुगंधा मुस्कराई। बोली, ”ला सको तो मेरे लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज लाना।”
सोमाली अपने जहाज में रत्न, हीरे, जवाहरात मेवे और गरम मसाले भरकर चला। एक-एक कर दुनिया के सब देशों में घूमा। उसे समझ में नहीं आया कि वह राजकुमारी सुगंधा के लिए क्या ले जाए? एक जगह उसने अनाज मंडी में इतना अच्छा गेहूँ देखा कि उसे लगा, गेहूँ के दाने सोने की तरह दमक रहे हैं। सोमाली ने सोचा, ‘भला अन्न से कीमती चीज दुनिया में और क्या है? यही लेकर चलता हूँ। सारे सुमेरपुर में इतना अच्छा गेहूँ न मिलेगा। अगर इसे बोया जाए तो पूरे सुमेरपुर में सोना ही सोना बिखर जाएगा।’
सोमाली जहाज लेकर सुमेरपुर के तट पर उतरा, तो राजकुमार सुगंधा भी समुद्र किनारे आ खड़ी हुई। वह देखना चाहती थी भला सोमाली उसके लिए क्या लाया है? पर जब सोमाली ने बताया कि इसमें सोने जैसे दमकते दाने हैं, तो राजकुमार सुगंधा गुस्से से आग-बबूला हो गई। उसने जहाज को पानी में डुबा देने का आदेश दिया।
इससे सोमाली का मन इतना दुखी हुआ कि वह सुमरेपुर छोड़कर चल दिया। पड़ोसी राज्य देवपुर में जाकर उसने अपना व्यापार शुरू कर दिया।
उसी साल सुमरेपुर में इतना भीषण अकाल पड़ा कि लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए। राजा अनंगदेव की मृत्यु हो गई। लोग राजकुमारी सुगंधा को अभागिन कहकर कोसने लगे। प्रजा ने गुस्से में आकर उसके अनाज के भंडार लूट लिए।
एक दिन राजकुमारी सुंगधा अपने रत्न, हीरे, जवाहरात एक जहाज में लादकर सुमेरपुर से भाग निकली। पर रात के समय इतना भयानक तूफान आया कि जहाज समुद्र की लहरों पर थपेड़े खाने और डगमगाने लगा। फिर अचानक जहाज पानी में डूबने लगा। राजकुमारी सुगंधा ने समुद्र में छलाँग लगा दी और पास बहते लकड़ी के एक तख्ते को पकड़ लिया। थोड़ी ही देर में वह बेहोश हो गई। पर लकड़ी के तख्ते के साथ बहते-बहते वह समुद्र किनारे आ लगी।
सुबह राजकुमारी को होश आया, तो उसकी हालत किसी फटेहाल भिखारिन जैसी हो चुकी थी। उसकी सारी संपदा लुट चुकी थी। भूख के मारे वह बेहाल थी। अचानक उसकी नजर पास के खेतों की ओर गई। वहाँ सोने जैसी गेहूँ की फसल लहलहाती दिखाई दी। भूख से परेशान सुगंधा वहीं जा पहुँची और गेहूँ के दाने निकाल-निकालकर खाने लगी।
तभी सोमाली का ध्यान उसकी ओर गया। वही उन खेतों मालिक था और इतनी बुरी हालत में भी सुगंधा को पहचानने में उससे भूल नहीं हुई। उसने बड़े प्यार से कहा, ”आइए राजकुमारी जी, भीतर आइए। आपका स्वागत है!”
राजकुमारी ने भी सोमाली को पहचान लिया। वह शर्म के मारे मानो जमीन में गड़ी जा रही थी। पर सोमाली ने उसे नए वस्त्र देकर नहाने-धोने के लिए कहा।
जब राजकुमारी सुगंधा नहा-धोकर आई, तो दोनों ने मिलकर भोजन किया। सोमाली ने कहा, ”मुझे लगता था, आप कभी न कभी आएँगी। क्या हम लोग विवाह करके नया जीवन शुरू करें?”
राजकुमारी संकोच के मारे सिर नीचा करके बोली, ”कहाँ आप अपार संपत्ति के स्वामी और कहाँ मैं…?”
पर सोमाली ने कहा, ”मेरे लिए तो आप अब भी वही हैं राजकुमारी जी। हाँ, अब आपने भूख देख ली है, तो अब आपका मन पहले से अधिक उदार हो गया है।”
राजकुमारी सुगंधा का सिर लज्जा से झुक गया। उसने ‘हाँ’ कहा और दोनों विवाह करके सुख से रहने लगे।
