kissa oodhamee bhaaloo ka moral story
kissa oodhamee bhaaloo ka moral story

किसी जंगल में एक से बढ़कर एक अजूबे थे। इन्हीं अजूबों में एक था गुड़ियाघर। जंगल के बीचोंबीच पंपा सरोवर के सामने था गुड़ियाघर। उसमें देश-देश की सुंदर गुड़ियाँ थीं, रंग-बिरंगे खिलौने भी।

जंगल के जानवर जब पंपा सरोवर में पानी पीने आते, तो अंदर जाकर गुड़ियाघर को देखना भी न भूलते।

भला इस घने जंगल में वह अनोखा गुड़ियाघर किसने बनवाया, यह तो नहीं पता। पर गुड़ियाघर तो गुड़ियाघर था। और गुड़ियाघर में जो खुशियाँ थीं, जो सपने थे, जो रंग और ढंग थे, उनका तो वर्णन ही क्या किया जाए! बस समझो कि धरती पर जो सबसे अच्छी और प्यारी जगह हो सकती है, वह गुड़ियाघर ही थी। लिहाजा जंगल में भी उसने खुशियाँ ही खुशियाँ बिखेर दी थीं।

इस गुड़ियाघर में किस्म-किस्म के रंग-बिरंगे और अजब-गजब खिलौने थे। मगर वहाँ सबसे ज्यादा तो थीं गुड़ियाँ, देश-देश की गुड़ियाँ। कोई गुड़ियाँ जापानी थी तो कोई चीनी। कुछ गुड़ियाँ इंग्लैंड से आई थीं, कुछ फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और रूस से। वहाँ गुड़ियाँ थीं तो किस्म-किस्म के गुड्डे भी थे। फिर गुड़ियाँ-गुड्डे के एक से एक सुंदर, छोटे-छोटे घर भी थे। साथ ही गुड्डे-गुड़ियों की उस दुनिया में भालू भी थे, बंदर भी, लूमड़ भी और शेर भी। तोते-कबूतर और किस्म-किस्म की चिड़ियाँ भी थीं। इतने सारे प्राणी मिलकर वहाँ खूब गप्पें लगाया करते। खूब किस्से सुनाते और खूब खेल-कूद और धमाचौकड़ी होती रहती थी गुड़ियाघर में। मगर एक चीज कभी नहीं होती थी—झगड़ा! गुड़ियाघर में सभी खिलौने बड़े प्यार से रहते थे।

फिर गुड़ियाघर में आया एक ऊधमी भालू डूडू। खूब बड़ा सा, लंबा-चौड़ा शरारती भालू। खूब गर्वीला! कहाँ से आया, यह तो नहीं पता। पर गुड़ियाघर में तो हर नए खिलौने का स्वागत होता था। इसलिए डूडू वहाँ आया, तो सब गुड्डे-गुड़ियों ने मिलकर स्वागत में हाथ लहराते हुए कहा, ”आइए जनाब!”

मगर ऊधमी भालू डूडू ने अपना ऐसा प्यारा स्वागत देखा, तो उसका दिमाग आसमान पर चढ़ गया। वह तो पहले ही ऊधमी था। अब तो उसका दिमाग हो गया शैतान का दिमाग। सोचने लगा, ”ये सारे तो पिद्दी हैं। इनको मेरी जी-हजूरी करनी चाहिए।’

इसलिए ऊधमी भालू डूडू ने आते ही खूब शरारतें करनी शुरू कर दीं। कुछ को छेड़ा, कुछ को मारा। चीनी गुड्डे का उसने चश्मा तोड़ दिया और अमरीकी गुड्डे की नाक। कुछ गुड़ियों के बाल भी खींचे।

उस ऊधमी भालू डूडू ने फ्रांस की गुड़ियाँ का हैट छीना तो दुखी होकर वह बहाने लगी टप-टप-टप आँसू। इस पर सारे गुड़ियाघर के खिलौने दुखी हो गए। आपस में बात करने लगे, ”भई, इस दुष्ट भालू ने तो आफत मचा दी है।”

गुड़ियाघर के पुराने खिलौनों में भी एक भालू था। बड़ा ही प्यारा और शरीफ भालू। उसे लोग बब्बू कहा करते थे। बब्बू भी बड़ी देर से ऊधमी भालू की शरारतें देख रहा था। जब रहा नहीं गया तो वह ताल ठोंककर बीच में आ गया। ऊधमी भालू डूडू को ललकारते हुए कहा, ”तेरा दिमाग कुछ ठीक ठिकाने नहीं है। कितनों को तूने आते ही परेशान कर दिया। अब मैं तुझे छोड़ूँगा नहीं।” इस पर गुड़ियाघर के बाकी गुड्डे-गुड़ियों ने उसे बड़ी मुश्किल से सँभाला।

ऊधमी भालू डूडू ने देखा कि ऐसे तो काम नहीं चलेगा। मगर उसका दिमाग था शैतान का दिमाग। उसने एक नया तरीका सोच लिया। उसने सोचा, ”मैं गुड़ियाघर के कुछ बलवान जानवरों को अपनी ओर मिला लूँगा। फिर हम सब मिलकर पुराने भालू बब्बू को मारेंगे। बस, बब्बू के पिटते ही हर कोई मुझसे डरकर रहेगा। पूरे गुड़ियाघर का मैं राजा हो जाऊँगा।’

डूडू जब अपनी इस तरह की ओछी हरकतों पर उतर आया, तो जापानी गुड्डे राजकुमार को बहुत गुस्सा आया। वह इतना प्यारा और भला था कि पूरे गुड़ियाघर में उसे हर कोई गुड्डा नहीं, ‘राजकुमार’ कहकर ही बुलाता था। राजकुमार सबके भले की बात सोचता था। सबको अच्छी सलाह देता था। इसलिए गुड़ियाघर के सभी जानवर उसे बेहद प्यार करते थे।

ऊधमी भालू ने जब कुछ जानवरों को डरा-धमकाकर और लालच देकर अपनी ओर मिलाने की कोशिश की और गुड़ियाघर के खिलौनों में फूट डालने की कोशिशें कीं, तो उन सबने आकर झटपट राजकुमार को सारी बात कह दी।

राजकुमार को बहुत गुस्सा आया। चेहरा एकदम लाल हो गया। उसने झटपट गुड़ियाघर के खिलौनों की मीटिंग बुलवाई। उसमें बताया कि ऊधमी भालू ने क्या-क्या गुल खिलाए हैं! जिन जानवरों को उसने डराया-धमकाया था, या लालच दिया था, उन्होंने भी अपनी बातें कहीं।

अब तो गुड़ियाघर के खिलौनों ने तय कर लिया कि कुछ-न-कुछ करना ही होगा। मामला हद से ज्यादा बढ़ गया है।

अगले दिन ऊधमी भालू डूडू अकड़ता हुआ आया और राजकुमार से झगड़ने लगा। इस पर गुड़ियाघर के जितने भी खिलौने थे, सब वहीं आकर इकट्ठे हो गए। किसी ने उस ऊधमी भालू की टाँग पकड़ी, किसी ने हाथ, किसी ने उसका पेट पकड़ा, किसी ने सिर। सबसे उसे पूरे जोर से ऊपर उछाला और फिर छोड़ दिया।

ड्डू जमीन पर आ गिरा तो जगह-जगह उसे चोट लगी। वह फूट-फूटकर रोने लगा।

गुड़ियाघर के खिलौनों ने उसे घेरकर कहा, ”बोलो, अब तुम शराफत से रहोगे या तुम्हें और भी मजा चखाया जाए?”

इस पर ऊधमी भालू ने कान पकड़कर माफी माँगी। उसने वादा किया, अब वह गुड़ियाघर के किसी खिलौने को तंग नहीं करेगा।

गुड़ियाघर में खूब बड़ा सा वह भालू डूडू आज भी है। लेकिन उस दिन के बाद उसने किसी को आज तक तंग नहीं किया। अब वह बिल्कुल शरीफ और भला बन चुका है।

और गुड़ियाघर के सभी जानवर उस दिन से आराम से रहने लगे हैं।

जंगल के पशु-पक्षी भी गुड़ियाघर की अशांति से दुखी थे। वहाँ फिर से पहले जैसा प्यार और शांति नजर आई, तो उनके चेहरे पर भी खुशी की चमक नजर आने लगी।