kissa-croreimal-ka moral story
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पुराने समय की बात है, जुगनीपुर में एक बड़ा धनी सेठ रहता था। उसका नाम था करोड़ीमल। जुगनीपुर का वह नामी-गिरामी सेठ था, पर था बड़ा कंजूस। कंजूस तो क्या, मक्खीचूस कहो। उसकी हालत यह थी कि जान जाए, पर दमड़ी न जाए। भिखारी को एक पैसा देने में भी उसकी जान निकलती थी। किसी की मदद करना तो दूर, वह किसी गरीब या दीन-हीन आदमी को अपनी दुकान के आगे खड़ा भी नहीं होने देता था, जिससे कहीं कुछ देना न पड़ जाए!

करोड़ीमल खुद तो मामूली कपड़े पहनता ही था, उसकी घरवाली और बच्चे भी अच्छे कपड़ों के लिए तरस जाते। हर बात का करोड़ीमल के पास एक ही जवाब था, ”पैसा है तो सब कुछ है! पैसा खर्च कर दूँगा, तो मुझे सेठ कौन कहेगा?”

शहर में सभी को करोड़ीमल की यह आदत पता थी। इसलिए इतना बड़ा सेठ होने के बावजूद कोई उससे ढंग से बात न करता था। सामने कोई कुछ कहे न कहे, पीठ-पीछे सब हँसते थे।

करोड़ीमल को सुबह रोजाना मंदिर जाने की आदत थी। वह मंदिर में जाकर एक पैसा चढ़ाता था। फिर कुछ देर चुपचाप पूजा करके, घर वापस आ जाता था। वहाँ भी कोई उससे कुछ खास बोलता नहीं था।

करोड़ीमल को इस बात का भारी दुख था कि मैं इतना बड़ा सेठ हूँ, फिर भी कोई मुझसे ढंग से नहीं बोलता। इसकी बजाय जो धन-दौलत में उससे बहुत नीचे थे, उन्हें भी सब लोग आदर से ‘आइए सेठ जी!’ कहकर बुलाते थे। करोड़ीमल मन ही मन इस बारे में सोचता और अकुलाता रहता था।

एक दिन की बात, जन्माष्टमी का त्योहार आने वाला था। पुजारी ने कहा, ”आप सब लोग जन्माष्टमी के लिए थोड़ा-थोड़ा चंदा दें, तो मंदिर की अच्छी सजावट हो जाएगी। श्रीकृष्ण की कुछ सुंदर और अनूठी झाँकियाँ भी सजाई जा सकती हैं। ”

इस पर सभी ने थोड़ा-थोड़ा चंदा दिया। करोड़ीमल सबसे पीछे बैठा था। उसके पास पाँच हजार रुपए की थैली थी। वह थैली पुजारी की ओर बढ़ाते हुए उसने कहा, ”लीजिए पुजारी जी, इन रुपयों से आप मंदिर की खूब अच्छी सजावट करवाइए। कम पड़ेंगे तो मैं और दे दूँगा।”

इस पर वहाँ बैठे सभी लोगों के मुँह खुले के खुले रह गए। जो लोग कभी करोड़ीमल से सीधे मुँह बात नहीं करते थे, उन्होंने भी कहा, ”आइए सेठ जी, यहाँ बैठिए मेरे पास।”

करोड़ीमल को बहुत अच्छा लगा। जब वह मंदिर से लौटा, तो उसके साथ दो-चार और भी लोग थे। करोड़ीमल ने मुसकराते हुए कहा, ”देखो, पैसे के कारण आज मेरी कितनी इज्जत हो रही है!”

यह सुनकर उसके साथ चलने वाले एक भक्त ने कहा, ”नहीं सेठ जी, आप भूल कर रहे हैं। यह इज्जत पैसे के कारण नहीं, पैसे के दान के कारण है। पैसा तो आपके पास पहले भी खूब था। पर आज आपने कुछ ही पैसे का दान किया, तो सबकी नजरों में ऊपर उठ गए। यह महिमा धन की नहीं, दान की है।’

करोड़ीमल को अपनी भूल पता चली। उस दिन के बाद से उसका व्यवहार बदल गया। उसकी कंजूसी खत्म हो गई और जरूरतमंद लोगों की मदद करने में उसे सुख मिलने लगा।