Hitopadesh ki Kahani : मालव देश में पद्मगर्भ नाम का एक सरोवर है । उस सरोवर के समीप एक वृद्ध बगुला रहता था । सामर्थ्यहीन होने से उसको अपने आहार की सदा चिन्ता रहती थी। इस कारण वह अनमना सा वहां बैठा रहता था । उसको नित्य इस प्रकार बैठे देखकर एक केकड़े को एक दिन जिज्ञासा हुई तो उसने उससे पूछ लिया, “क्यों मामा! आप खाना- पीना छोड़कर इस प्रकार क्यों बैठे रहते हैं ? “
बगुला कहने लगा, “क्या करूं, बड़ी चिन्ता में पड़ गया हूं। मछलियां ही तो मेरा भोजन है । और अब सुनने में आया है कि जल्दी ही कुछ मछुए आकर यहां जाल डालकर उन्हें पकड़ कर ले जाने वाले हैं। इससे तो मेरे जीवन का आधार ही नष्ट हो जायेगा । उस दशा में मेरा मरना तो निश्चित है। तब मैंने अभी से आहार त्याग दिया है। “
केकड़े ने यह बात मछलियों से कही। उनको यह सुनकर चिन्ता होने लगी। वे सोचने लगीं कि यह बगुला तो बड़ा उपकारी लगता है, चलो इसी से पूछते हैं.
उसके पास पहुंच कर मछलियों ने कहा, “मामा ! मछुआरों की जो बात आप बता रहे हैं, उससे बचने का भी कोई उपाय है हमारे लिए?”
बगुला बोला, “उसका एक ही उपाय है कि तुम लोग यह सरोवर छोड़कर किसी अन्य सरोवर में चली जाओ।”
“किन्तु हम जायेंगी कैसे ?”
“यदि तुम कहो तो मैं तुमको एक-एक कर किसी अन्य तालाब में पहुंचा देता हूं।” मछलियों को मार्ग मिल गया। उन्होंने स्वीकार कर लिया।
इसी प्रकार नित्य बगुला वहां से एक-एक मछली ले जाता और मार्ग में एक स्थान पर उसको एक शिला पर पटकता और मार कर खा जाता।
इस प्रकार दिन बीतने लगे। एक दिन केकड़े ने कहा, “मामा ! आज मुझे भी ले चलें । ” बगुला सोचने लगा, मछली का भोजन करते हुए दिन बीत गए हैं। चलो आज यह परिवर्तन अच्छा रहेगा। यह विचार कर वह उस दिन केकड़े को ले गया। उसने उसको भी उसी स्थान पर रख दिया जहां उसने मछलियों को मारा था । केकड़े ने जो मछलियों के कंकालों का ढेर देखा तो वह मन ही मन सोचने लगा, आज मैं मारा गया।
केकड़े के धैर्य ने उसका साथ नहीं छोड़ा। उसने निश्चय कर लिया कि वह बगुले को मार कर रहेगा। इसलिए अवसर पाकर उसने बगुले की गर्दन दबोच ही ली। उससे वह तुरन्त मर गया।
यह कथा सुनकर चित्रवर्ण ने कहा, “देखो मैंने विचार किया है कि यदि मेघवर्ण कर्पूरद्वीप का राजा बन जायेगा तो यहां की जितनी उत्तम वस्तुयें हैं वह सब हमें सौंप देगा। इससे हम अपने देश में बड़े सुख से रहेंगे।”
मन्त्री बोला “महाराज! आने वाली बात को सोचकर जो व्यक्ति प्रसन्न होता है वह उस ब्राह्मण की भांति तिरस्कृत होता है जिसका बर्तन फूट गया था । “
राजा ने पूछा । “यह कैसे ?”
मन्त्री ने कहा, “सुनाता हूं, सुनिये। “
