Hindi Katha: पाताल में प्रह्लाद ने सैकड़ों वर्षों तक शासन किया। आयु के अंतिम चरण में उसने विरोचन के पुत्र बली को पाताल का राज्य सौंपा और स्वयं तपस्या करने के लिए हिमालय पर्वत पर चला गया । प्रह्लाद जहाँ देवताओं का मित्र था, वहीं राज्य पाते ही दैत्यराज बली देवताओं का विरोधी हो गया । इस विरोध के फलस्वरूप दैत्यों और देवताओं में भयंकर युद्ध छिड़ गया । यह युद्ध अनेक वर्षों तक चला। इस युद्ध में भगवान् विष्णु ने भी देवताओं की सहायता की। अंत में दैत्यों की पराजय हुई।
पराजित दैत्य प्राण बचाकर दैत्यगुरु शुक्राचार्य की शरण में गए और बोले” हे ऋषिवर ! आप सृष्टि में हमारे सबसे बड़े हितैषी हैं। आप एक प्रतापी ऋषि हैं। भगवन् ! आप मंत्रों के प्रकाण्ड विद्वान हैं। आप हमारे सहायक न हुए तो भूलोक में हम जीवित नहीं बचेंगे। हमें विवश होकर पाताल लोक में भागना पड़ेगा। हमारी रक्षा करें, भगवन्।’
शुक्राचार्य एक दयालु पुरुष थे। दैत्यों को उन्होंने दिलासा दिया और कहा ” पुत्रो ! भय न करो। मैं अपने तेज से यहाँ तुम्हारे रहने की उचित व्यवस्था करूँगा। मंत्रों और औषधियों से निरंतर तुम्हारी सहायता करूँगा। तुम मन में उत्साह बनाए रखो और निश्चित हो जाओ। “
शुक्राचार्य का सहारा और सहयोग पाकर दैत्य निर्भय हो गए। शीघ्र ही यह समाचार देवताओं तक पहुँचा। सभी देवता मंत्रणा करने लगे। शुक्राचार्य के मंत्रों की शक्ति से देवताओं के मन में भय उत्पन्न हो गया। वे इस निर्णय पर पहुँचे कि मंत्रों का बल पाकर दैत्य उनकी शक्ति को ललकारें, उससे पहले ही वे युद्ध करके उन्हें समाप्त कर देना चाहिए। यह निश्चय करके देवताओं ने शस्त्र उठा लिए और दैत्यों पर आक्रमण कर दिया। इन्द्र की आज्ञा पाकर देवता दैत्यों को ढूँढ़- ढूँढ़कर मारने लगे। इससे दैत्य आतंकित हो गए और पुनः शुक्राचार्य की शरण में जाकर रक्षा की प्रार्थना करने लगे।
उनकी दुर्दशा देखकर शुक्राचार्य ने कहा – ” दैत्यो ! भयभीत मत होओ। यदि देवता यहाँ आए तो मैं मंत्र – शक्ति से भस्म कर दूँगा । ” शुक्राचार्य की यह बात देवताओं तक पहुँची। वे शुक्राचार्य की शक्ति से भली-भाँति परिचित थे। इसलिए वे स्वर्ग लौट गए।
देवताओं के जाने पर शुक्राचार्य ने दैत्यों से कहा ” हे पुत्रो ! पूर्व समय में ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि भगवान् विष्णु दैत्यों का वध करने के लिए सदा सतर्क रहते हैं। उन्होंने जिस प्रकार वाराह रूप धारण करके हिरण्याक्ष को मारा था नृसिंहावतार लेकर हिरण्यकशिपु की जीवन लीला समाप्त की, वैसे ही अब वे विभिन्न अवतार लेकर सभी दानवों को मार डालेंगे। इसलिए हे दैत्यो ! मैं कुछ विशेष मंत्र पाने के लिए भगवान् शिव के पास जा रहा हूँ। वहाँ से लौटकर फिर हम देवताओं से डटकर मुकाबला कर सकेंगे।
दैत्यों को समझाकर ऋषिवर शुक्राचार्य मंत्र प्राप्त करने के लिए भगवान् शंकर के पास चल गए। उनके जाने के बाद सभी दैत्य देवताओं के पास गए और हाथ जोड़कर विनीत स्वर में बोले – “हे देवो ! हमने अपने सभी अस्त्र-शस्त्रों का परित्याग कर दिया है। हमारी युद्ध करने की इच्छा भी समाप्त हो चुकी है। हमारे मन में किसी भी प्रकार का लोभ अथवा द्वेष शेष नहीं है। अब हम वृक्षों की छाल पहनकर और कंद-मूल खाकर तपस्वी – जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। ” फिर दैत्यों ने देवताओं के समक्ष ही अपने अस्त्र-शस्त्रों का त्याग कर दिया।
दैत्यों के इस व्यवहार को देख देवताओं ने यह मान लिया कि दैत्य अब उन पर आक्रमण नहीं करेंगे और वे निश्चित हो गए। इस प्रकार दैत्यों ने कुटिलतापूर्वक देवताओं को भ्रमित कर दिया।
